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कोरोना ने सिखाया फिर से अपनी पुरातन संस्कृति से जुडना
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चंपावत जिले के दूरस्थ गांव में विवाह समारोह में शामिल छोलिया नृतक।
- फोटो : CHAMPAWAT
चंपावत। कोरोना काल में पुरानी संस्कृति और परंपराओं को भी नया जीवन मिल रहा है। वैश्विक महामारी के संक्रमण से बचाव को लेकर लोग एक बार फिर से पुरातन जीवन शैली और आचार विचार को अपनाने लगे हैं। कोरोना काल में आयोजित किए जा रहे विभिन्न प्रकार के विवाह समारोहों में इसकी बानगी देखने को मिल रही है। कोरोना काल में हाशिए में चले गए छोलिया नर्तकों की पूछ होेने लगी है। इससे लोगों को एक बार फिर से पश्चिमी सभ्यता की बैंडबाजों और डीजे आदि की संस्कृति के स्थान पर अपनी पुरानी कला संस्कृति से रूबरू होने का मौका मिल रहा है।
गौरतलब है कि छोलिया नृत्य उत्तराखंड के लोकनृत्यों में सबसे लोकप्रिय है। यह नृत्य युद्ध के प्रतीक के रूप में प्रयोग किया जाता है। राजशाही समाप्त होने के बाद यह आम लोगों में काफी प्रसिद्ध हुआ और समय के अनुरूप संस्कृति कर्मियों ने इस अमूल्य धरोहर को संजोने के लिए इसे विवाह और शुभ अवसरों में शामिल किए जाने की अनिवार्यता बना दी। हालांकि समृद्ध संस्कृति का परिचायक यह लोकनृत्य वर्तमान में व्यावसायिकता और आधुनिकता के अंधे दौर में कहीं खोता चला जा रहा है। ढोल दमाऊं का स्थान बैंड बाजों ने ले लिया है। वर्तमान में कोरोना संक्रमण के दौर में अपनी संस्कृति को संरक्षित रखने के शौकीन लोग शादी, नामकरण या अन्य तीज त्यौहारों में छोलिया दल को आमंत्रित करने लगे हैं, जो बेहद सुखद स्थिति है। संवाद
क्या होता है छोलिया नृत्य
चंपावत। छोलिया नृत्य में पुरुष प्राचीन सैनिकों जैसी वेशभूषा पहन कर तलवार और ढाल लेकर युद्ध जैसा नृत्य करते हैं, जिसमें लोक वाद्य ढोल, दमाऊं, रणसिंह, तुरही और मसकबीन आदि का प्रयोग किया जाता है। इतिहासकार डॉ.प्रशांत जोशी के अनुसार छल से युद्ध भूमि में दुश्मन को कैसे हराया जाता है, यही इस नृत्य का मुख्य लक्ष्य है। इसी कारण इसे छल नृत्य, छलिया नृत्य और हिंदी में छोलिया नृत्य कहा जाता है। संवाद
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छपेली और चांचरी भी सुनाते हैं छोलिया नर्तक
चंपावत। छोलिया दल का आकार उनकी संख्या के आधार पर निर्धारित होता है। छोलिया दल में आठ से 10 या 14 से 20 लोग शामिल रहते हैं। छोलिया दल सिर्फ नृत्य ही नहीं करता बल्कि एक निश्चित समय के बाद विराम लेकर दल का एक सदस्य छपेली या चांचरी के बोल गाता है और गीत खत्म होते ही पुन: तीव्र गति से ढोल दमाऊं के वादन के साथ नृत्य शुरू होता है। संवाद
सरकार नहीं ले रही छोलिया नर्तकों की सुध
चंपावत। कुमाऊंनी सांस्कृतिक धरोहर को सहेजने के कार्य में जुटे रंगकर्मी जगदीश आगरी का कहना है कि कोरोना संक्रमण के दौर में सरकार की ओर से छोलिया नृतकों की सुध नहीं ली जा रही है। विभिन्न कार्यक्रमों और समारोह में छोलिया नर्तकों और ढोल दमाऊं वादकों की संख्या सीमित रखने से नर्तकों और लोक कलाकारों को आर्थिक दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। संवाद
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गौरतलब है कि छोलिया नृत्य उत्तराखंड के लोकनृत्यों में सबसे लोकप्रिय है। यह नृत्य युद्ध के प्रतीक के रूप में प्रयोग किया जाता है। राजशाही समाप्त होने के बाद यह आम लोगों में काफी प्रसिद्ध हुआ और समय के अनुरूप संस्कृति कर्मियों ने इस अमूल्य धरोहर को संजोने के लिए इसे विवाह और शुभ अवसरों में शामिल किए जाने की अनिवार्यता बना दी। हालांकि समृद्ध संस्कृति का परिचायक यह लोकनृत्य वर्तमान में व्यावसायिकता और आधुनिकता के अंधे दौर में कहीं खोता चला जा रहा है। ढोल दमाऊं का स्थान बैंड बाजों ने ले लिया है। वर्तमान में कोरोना संक्रमण के दौर में अपनी संस्कृति को संरक्षित रखने के शौकीन लोग शादी, नामकरण या अन्य तीज त्यौहारों में छोलिया दल को आमंत्रित करने लगे हैं, जो बेहद सुखद स्थिति है। संवाद
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क्या होता है छोलिया नृत्य
चंपावत। छोलिया नृत्य में पुरुष प्राचीन सैनिकों जैसी वेशभूषा पहन कर तलवार और ढाल लेकर युद्ध जैसा नृत्य करते हैं, जिसमें लोक वाद्य ढोल, दमाऊं, रणसिंह, तुरही और मसकबीन आदि का प्रयोग किया जाता है। इतिहासकार डॉ.प्रशांत जोशी के अनुसार छल से युद्ध भूमि में दुश्मन को कैसे हराया जाता है, यही इस नृत्य का मुख्य लक्ष्य है। इसी कारण इसे छल नृत्य, छलिया नृत्य और हिंदी में छोलिया नृत्य कहा जाता है। संवाद
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छपेली और चांचरी भी सुनाते हैं छोलिया नर्तक
चंपावत। छोलिया दल का आकार उनकी संख्या के आधार पर निर्धारित होता है। छोलिया दल में आठ से 10 या 14 से 20 लोग शामिल रहते हैं। छोलिया दल सिर्फ नृत्य ही नहीं करता बल्कि एक निश्चित समय के बाद विराम लेकर दल का एक सदस्य छपेली या चांचरी के बोल गाता है और गीत खत्म होते ही पुन: तीव्र गति से ढोल दमाऊं के वादन के साथ नृत्य शुरू होता है। संवाद
सरकार नहीं ले रही छोलिया नर्तकों की सुध
चंपावत। कुमाऊंनी सांस्कृतिक धरोहर को सहेजने के कार्य में जुटे रंगकर्मी जगदीश आगरी का कहना है कि कोरोना संक्रमण के दौर में सरकार की ओर से छोलिया नृतकों की सुध नहीं ली जा रही है। विभिन्न कार्यक्रमों और समारोह में छोलिया नर्तकों और ढोल दमाऊं वादकों की संख्या सीमित रखने से नर्तकों और लोक कलाकारों को आर्थिक दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। संवाद