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खेत में ही बर्बाद हो रहे सिटरस फल
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विपणन की व्यवस्था नहीं होने से रौसाल में घर के आंगन में बर्बाद माल्टा।
- फोटो : CHAMPAWAT
चंपावत। नेपाल सीमा के रौसाल क्षेत्र के आसपास के गांव के सिटरस फलों का खास स्वाद है। पहाड़ में उत्पादन भी खूब होता है, लेकिन इन फलों की कीमत पाने को ग्रामीणों को एड़ीचोटी का जोर लगाना पड़ रहा है। नौबत यह कि बाजार में ग्राहकों को 15 से 20 रुपये किलो में मिलने वाला माल्टा खेतों में ही फेंकना पड़ रहा है।
पौने दो साल बाद यानी 2022 तक केंद्र की मोदी सरकार ने किसानों की आय दोगुनी करने का लक्ष्य रखा है, लेकिन यहां किसानों को उपज के उत्पादन के लिए ही तरसना पड़ रहा है। रौसाल के देवी दत्त भट्ट, प्रकाश चंद्र, ममता, मोहन राय, देवेंद्र पाटनी, कैलाश सिंह सहित कई किसान बड़े पैमाने पर संतरे, माल्टा, नींबू की खेती करते हैं, लेकिन बहुतायत में होने वाली इस उपज का उन्हें लाभ नहीं मिल पा रहा है। किसान महज तीन रुपये किलो के हिसाब से माल्टा और बड़ा नींबू बेचने को मजबूर हैं। ऐसे में उनकी लागत तक नहीं निकल पा रही है। नतीजा यह कि कई ग्रामीण इस उपज को फेंकने के लिए मजबूर हैं। किसान कहते हैं इन्हें बेचने से होने वाली आय इतनी कम है कि अब बेचने से इन्हें खेतों में ही पड़े रहने देना कम नुकसानदायक है।
पहाड़ में न मंडी नहीं खाद्य प्रसंस्करण इकाई
चंपावत। कुमाऊं के चारों पर्वतीय जिले में मैदानी क्षेत्र टनकपुर को छोड़ कहीं भी कृषि उत्पादन मंडी सहकारी समिति नहीं है। अल्मोड़ा, बागेश्वर, पिथौरागढ़ जिला तो मंडी शून्य है ही, चंपावत जिले का पहाड़ी हिस्सा भी कृषि बाजार व्यवस्था से कटा है। चंपावत जिले के मैदानी क्षेत्र टनकपुर में मंडी तो है, लेकिन टनकपुर का चंपावत से ही 75 किमी का फासला है। किसानों का कहना है कि मंडी न होने से उन्हें उपज का सही मूल्य मिलना मुश्किल हो रहा है। इसी तरह पहाड़ के जिलों में खाद्य प्रसंस्करण इकाई भी नहीं है। इससे सिटरस फल, टमाटर या आलू लंबे समय तक टिक नहीं पाते हैं। (ब्यूरो)
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उद्यान बिक्री केंद्र में भी नहीं बिका एक भी दाना
चंपावत। माल्टा और बड़े नींबू की खरीद के लिए सरकारी योजना भी फ्लॉप रही। सी ग्रेड (75 मिमी से कम व्यास) के माल्टा की कीमत 700 रुपये और बड़ा नींबू 400 रुपये प्रति क्विंटल निर्धारित की गई, लेकिन खरीद केंद्र दूर होने और भाड़े में अधिक रकम खर्च होने से एक भी किलो खरीद नहीं हुई। वहीं कई किसान सिटरस फल और अन्य पहाड़ी उत्पादों को दोपहिये वाहन से बेचने को मजबूर हैं, लेकिन डीजल-पेट्रोल की कीमत अधिक होने से घर-घर बिक्री के लिए दोपहिये का उपयोग भी फायदेमंद नहीं हो रहा है। (ब्यूरो)
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पौने दो साल बाद यानी 2022 तक केंद्र की मोदी सरकार ने किसानों की आय दोगुनी करने का लक्ष्य रखा है, लेकिन यहां किसानों को उपज के उत्पादन के लिए ही तरसना पड़ रहा है। रौसाल के देवी दत्त भट्ट, प्रकाश चंद्र, ममता, मोहन राय, देवेंद्र पाटनी, कैलाश सिंह सहित कई किसान बड़े पैमाने पर संतरे, माल्टा, नींबू की खेती करते हैं, लेकिन बहुतायत में होने वाली इस उपज का उन्हें लाभ नहीं मिल पा रहा है। किसान महज तीन रुपये किलो के हिसाब से माल्टा और बड़ा नींबू बेचने को मजबूर हैं। ऐसे में उनकी लागत तक नहीं निकल पा रही है। नतीजा यह कि कई ग्रामीण इस उपज को फेंकने के लिए मजबूर हैं। किसान कहते हैं इन्हें बेचने से होने वाली आय इतनी कम है कि अब बेचने से इन्हें खेतों में ही पड़े रहने देना कम नुकसानदायक है।
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पहाड़ में न मंडी नहीं खाद्य प्रसंस्करण इकाई
चंपावत। कुमाऊं के चारों पर्वतीय जिले में मैदानी क्षेत्र टनकपुर को छोड़ कहीं भी कृषि उत्पादन मंडी सहकारी समिति नहीं है। अल्मोड़ा, बागेश्वर, पिथौरागढ़ जिला तो मंडी शून्य है ही, चंपावत जिले का पहाड़ी हिस्सा भी कृषि बाजार व्यवस्था से कटा है। चंपावत जिले के मैदानी क्षेत्र टनकपुर में मंडी तो है, लेकिन टनकपुर का चंपावत से ही 75 किमी का फासला है। किसानों का कहना है कि मंडी न होने से उन्हें उपज का सही मूल्य मिलना मुश्किल हो रहा है। इसी तरह पहाड़ के जिलों में खाद्य प्रसंस्करण इकाई भी नहीं है। इससे सिटरस फल, टमाटर या आलू लंबे समय तक टिक नहीं पाते हैं। (ब्यूरो)
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उद्यान बिक्री केंद्र में भी नहीं बिका एक भी दाना
चंपावत। माल्टा और बड़े नींबू की खरीद के लिए सरकारी योजना भी फ्लॉप रही। सी ग्रेड (75 मिमी से कम व्यास) के माल्टा की कीमत 700 रुपये और बड़ा नींबू 400 रुपये प्रति क्विंटल निर्धारित की गई, लेकिन खरीद केंद्र दूर होने और भाड़े में अधिक रकम खर्च होने से एक भी किलो खरीद नहीं हुई। वहीं कई किसान सिटरस फल और अन्य पहाड़ी उत्पादों को दोपहिये वाहन से बेचने को मजबूर हैं, लेकिन डीजल-पेट्रोल की कीमत अधिक होने से घर-घर बिक्री के लिए दोपहिये का उपयोग भी फायदेमंद नहीं हो रहा है। (ब्यूरो)