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अमर उजाला शिक्षा अभियान : मोहल्ला कक्षाएं चलाकर संवारा छात्रों का भविष्य

Fri, 01 Apr 2022 12:30 AM IST
हल्द्वानी ब्यूरो अमर उजाला ब्यूरो, चंपावत
अमर उजाला ब्यूरो, चंपावत Published by: हल्द्वानी ब्यूरो Updated Fri, 01 Apr 2022 12:30 AM IST
सार

कोरोना महामारी के दौर में बच्चों की पढाई बाधित न हो इसके लिए विद्यालयों द्वारा ऑनलाइन कक्षाओं का संचालन किया गया। लेकिन आर्थिक दिक्कत और मोबाइल नेटवर्क के चलते कई बच्चों को ऑनलाइन कक्षाओं का लाभ नहीं मिल पा रहा है।

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Amar Ujala Shiksha Abhiyan: helped students by running mohalla classes
Amar Ujala Shiksha Abhiyan: helped students by running mohalla classes

विस्तार

कोरोना काल में खेल और स्कूली गतिविधियां बंद होने से परेशान बच्चों को उबारने के लिए कुछ व्यक्तिगत प्रयास भी किए गए। और ये पहल खुद शिक्षकों ने की। ऐसे प्रयासों से बच्चों की न केवल पढ़ाई बाधित होने से बची, बल्कि उनके आत्मविश्वास में भी इजाफा हुआ। किसी ने गांव-गांव जाकर तो किसी शिक्षक ने मोहल्ला कक्षाएं चलाकर छात्रों का भविष्य संवारा।

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कोरोना महामारी के दौर में बच्चों की पढाई बाधित न हो इसके लिए विद्यालयों द्वारा ऑनलाइन कक्षाओं का संचालन किया गया। लेकिन आर्थिक दिक्कत और मोबाइल नेटवर्क के चलते कई बच्चों को ऑनलाइन कक्षाओं का लाभ नहीं मिल पा रहा है। इसे देखते हुए बिसारी के शिक्षक रवीश पचौली ने चलो गांव की ओर अभियान चलाकर बच्चों को घर-घर जाकर पढ़ाने का कार्य शुरू कर दिया। उन्होंने वकज्सीट तैयार कर बच्चों की पढ़ाई को लगातार जारी रखा। शिक्षक पचौली द्वारा नौनिहालों के भविष्य को संवारने के लिए कोरोना के दौरान उनकी पढ़ाई को पूरा कराने की पहल का अभिभावकों ने स्वागत किया। शिक्षक पचौली ने अपने सेवित क्षेत्र के 49 बच्चों को कोरोना काल में पढ़ाकर मार्गदर्शन किया।
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हर दिन आठ किमी चले रमेश
चंपावत। जिले का एक छोटा सा क्षेत्र है चल्थियां। इस प्राथमिक विद्यालय के स्कूल के शिक्षक रमेश चंद्र जोशी ने 22 मार्च 2020 को कोविड कर्फ्यू के एक महीने बाद 22 अप्रैल से पढ़ाई का नया तरीका शुरू किया। उन्होंने खुद गांवों में जाकर दो से तीन बच्चों को एक साथ पढ़ाना शुरू किया। इस तरह से स्कूल के 35 बच्चों को पढ़ाने के लिए उन्हें हर दिन आठ किलोमीटर पैदल दौड़ लगानी होती थी। एक दिन में 15 से 18 बच्चों की पढ़ाई होती थी। शिक्षक जोशी बताते हैं कि घर में पढ़ने में बच्चे खासी दिलचस्पी लेते थे। बच्चों के माता-पिता को घर आकर पढ़ाने से बहुत सुकून महसूस होता था।

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