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जल बिन सब सून:पहाड़ के काम नहीं पहाड़ का पानी
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चंपावत। पानी से लबालब शारदा, गौरी, काली, सरयू, धौलीगंगा, लोहावती, गंडक, लधिया, क्वैराला आदि नदियों के होते हुए भी पहाड़ की प्यास नहीं बुझ पा रही है। अब भारत-नेपाल सीमा पर काली नदी पर एशिया का सबसे बड़े पंचेश्वर बांध के जरिए इस पानी से बिजली बनाने की तैयारी तो है लेकिन इस नदी से भी लोगों के गले तर करने की कोशिश न के बराबर है।
हाल यह है कि काली नदी से एक भी पेयजल योजना नहीं है। सामाजिक कार्यकर्ता ओंकार सिंह, आन सिंह सहित दूरदराज के कई ग्रामीणों का कहना है कि नदी के नजदीक होने के बावजूद उन्हें पानी नसीब नहीं है। इसी तरह सरयू नदी से भी कोई योजना नहीं बन सकी है। इस बार जिले में करीब 1100 मिलीमीटर बारिश हुई, मगर इससे जल स्रोत और गधेरे रिचार्ज नहीं हो सके हैं। 35 प्रतिशत से अधिक स्रोत बंद होने के कगार पर है। जो बचे हैं, उनका जल स्तर भी निरंतर कम हो रहा है। यही वजह है कि चंपावत जिले के बाराकोट, पाटी, गुमदेश, तल्लादेश के गांव के लोग पीने के पानी के लिए लंबी दौड़ लगाने को मजबूर हैं।
राज्य आंदोलनकारी प्रेम चंद का कहना है कि न नौजवानों को नौकरी मिल रही है और नहीं पीने को पानी। इस हालात को बदलने के लिए ठोस योजनाएं भी नहीं बन रही है। पर्यावरण के जानकार विवेक जोशी का कहना है कि जल स्रोतों को रिचार्ज करने के लिए न तो कायदे की नीति है और नहीं विभिन्न विभागों में समन्वय।
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पेयजल महकमे, वन और राजस्व विभाग मिलकर कारगर क्रियान्वयन करें तो बात बने। जल संस्थान के अधिशासी अभियंता बिलाल यूनुस का कहना है कि जल स्रोतों को रिचार्ज करने के लिए अलग-अलग स्तर पर प्रयास चल रहे हैं।
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हाल यह है कि काली नदी से एक भी पेयजल योजना नहीं है। सामाजिक कार्यकर्ता ओंकार सिंह, आन सिंह सहित दूरदराज के कई ग्रामीणों का कहना है कि नदी के नजदीक होने के बावजूद उन्हें पानी नसीब नहीं है। इसी तरह सरयू नदी से भी कोई योजना नहीं बन सकी है। इस बार जिले में करीब 1100 मिलीमीटर बारिश हुई, मगर इससे जल स्रोत और गधेरे रिचार्ज नहीं हो सके हैं। 35 प्रतिशत से अधिक स्रोत बंद होने के कगार पर है। जो बचे हैं, उनका जल स्तर भी निरंतर कम हो रहा है। यही वजह है कि चंपावत जिले के बाराकोट, पाटी, गुमदेश, तल्लादेश के गांव के लोग पीने के पानी के लिए लंबी दौड़ लगाने को मजबूर हैं।
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राज्य आंदोलनकारी प्रेम चंद का कहना है कि न नौजवानों को नौकरी मिल रही है और नहीं पीने को पानी। इस हालात को बदलने के लिए ठोस योजनाएं भी नहीं बन रही है। पर्यावरण के जानकार विवेक जोशी का कहना है कि जल स्रोतों को रिचार्ज करने के लिए न तो कायदे की नीति है और नहीं विभिन्न विभागों में समन्वय।
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पेयजल महकमे, वन और राजस्व विभाग मिलकर कारगर क्रियान्वयन करें तो बात बने। जल संस्थान के अधिशासी अभियंता बिलाल यूनुस का कहना है कि जल स्रोतों को रिचार्ज करने के लिए अलग-अलग स्तर पर प्रयास चल रहे हैं।