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अतिक्रमण से घिरे हैं पुरातात्विक महत्व के संरक्षित स्थल
Updated Sat, 08 Dec 2018 10:40 PM IST
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सतीश जोशी ‘सत्तू
चंपावत। जिले में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग (एएसआई) की ओर से संरक्षित घोषित किए गए ऐतिहासिक एवं धार्मिक महत्व के स्थल अतिक्रमण की चपेट में हैं। संरक्षित स्थलों की देखभाल की कोई पुख्ता व्यवस्था नहीं होने के कारण धरोहर अपना महत्व और स्वरूप खोती जा रही हैं।
पुरातत्व विभाग की ओर से जिला मुख्यालय के बालेश्वर मंदिर समूह, बालेश्वर मंदिर के पास के नौले और ब्लॉक कार्यालय मार्ग में स्थित कोतवाली चबूतरा को संरक्षित इमारतों की सूची में शामिल किया गया है। यह तीनों स्थल भारत सरकार के प्राचीन स्मारक एवं अवशेष अधिनियम 1958 के अंतर्गत संरक्षित इमारतों में शामिल हैं। एएसआई के अधिकारी भी मानते हैं कि संरक्षित इमारतों के सौ मीटर के दायरे में किसी भी तरह के निर्माण कार्यों की पाबंदी है। लेकिन कोई भी संरक्षित स्थल वर्तमान में अतिक्रमण से नहीं बच सका है।
एएसआई के सहायक पुरातत्व अधिकारी मनोज कुमार के अनुसार स्थानीय प्रशासन के सहयोग से ऐसे अतिक्रमण कार्य को ध्वस्त करने की कार्रवाई अमल में लाई जाएगी।
पुरातात्विक महत्व के अन्य स्थल भी हैं उपेक्षित
जिले में पुरातात्विक महत्व के आठ अन्य स्थल हैं जो कि वर्तमान में उपेक्षित हाल में हैं। अल्मोड़ा स्थित क्षेत्रीय पुरातत्व कार्यालय से मिली जानकारी के मुताबिक गढ़कोट का प्राचीन विश्रामालय, बाणासुर का किला, नादबोरा का शिव मंदिर, ढकना का एकहथिया नौला, चैकुनी, खर्ककार्की एवं तल्ली मादली के शिव मंदिर, फुंगर की प्राचीन समाधियां संरक्षित स्थलों की सूची में शामिल हैं।
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कोतवाली चबूतरे में राजा-रानी खेलते थे चौपड़
जिला मुख्यालय में बने ऐतिहासिक कोतवाली चबूतरे का उपयोग चौपड़ खेलने के लिए किया जाता था। इतिहासकार डॉ.प्रशांत जोशी के अनुसार तेरहवीं सदी में चंद राजाओं ने कोतवाली चबूतरे का निर्माण कराया था। इस स्थान का उपयोग राजा और पटरानी के हास-परिहास के लिए हुआ करता था। इसके अलावा राजा यहां रानी के साथ बैठकर चौपड़ खेलते थे। विशालकाय पत्थरों की शिलाओं में उत्कृष्ट शिल्प कला के जरिए इसे चौपाल की शक्ल दी गई है।
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चंपावत। जिले में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग (एएसआई) की ओर से संरक्षित घोषित किए गए ऐतिहासिक एवं धार्मिक महत्व के स्थल अतिक्रमण की चपेट में हैं। संरक्षित स्थलों की देखभाल की कोई पुख्ता व्यवस्था नहीं होने के कारण धरोहर अपना महत्व और स्वरूप खोती जा रही हैं।
पुरातत्व विभाग की ओर से जिला मुख्यालय के बालेश्वर मंदिर समूह, बालेश्वर मंदिर के पास के नौले और ब्लॉक कार्यालय मार्ग में स्थित कोतवाली चबूतरा को संरक्षित इमारतों की सूची में शामिल किया गया है। यह तीनों स्थल भारत सरकार के प्राचीन स्मारक एवं अवशेष अधिनियम 1958 के अंतर्गत संरक्षित इमारतों में शामिल हैं। एएसआई के अधिकारी भी मानते हैं कि संरक्षित इमारतों के सौ मीटर के दायरे में किसी भी तरह के निर्माण कार्यों की पाबंदी है। लेकिन कोई भी संरक्षित स्थल वर्तमान में अतिक्रमण से नहीं बच सका है।
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एएसआई के सहायक पुरातत्व अधिकारी मनोज कुमार के अनुसार स्थानीय प्रशासन के सहयोग से ऐसे अतिक्रमण कार्य को ध्वस्त करने की कार्रवाई अमल में लाई जाएगी।
पुरातात्विक महत्व के अन्य स्थल भी हैं उपेक्षित
जिले में पुरातात्विक महत्व के आठ अन्य स्थल हैं जो कि वर्तमान में उपेक्षित हाल में हैं। अल्मोड़ा स्थित क्षेत्रीय पुरातत्व कार्यालय से मिली जानकारी के मुताबिक गढ़कोट का प्राचीन विश्रामालय, बाणासुर का किला, नादबोरा का शिव मंदिर, ढकना का एकहथिया नौला, चैकुनी, खर्ककार्की एवं तल्ली मादली के शिव मंदिर, फुंगर की प्राचीन समाधियां संरक्षित स्थलों की सूची में शामिल हैं।
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कोतवाली चबूतरे में राजा-रानी खेलते थे चौपड़
जिला मुख्यालय में बने ऐतिहासिक कोतवाली चबूतरे का उपयोग चौपड़ खेलने के लिए किया जाता था। इतिहासकार डॉ.प्रशांत जोशी के अनुसार तेरहवीं सदी में चंद राजाओं ने कोतवाली चबूतरे का निर्माण कराया था। इस स्थान का उपयोग राजा और पटरानी के हास-परिहास के लिए हुआ करता था। इसके अलावा राजा यहां रानी के साथ बैठकर चौपड़ खेलते थे। विशालकाय पत्थरों की शिलाओं में उत्कृष्ट शिल्प कला के जरिए इसे चौपाल की शक्ल दी गई है।