{"_id":"142-53164","slug":"Chamoli-53164-142","type":"story","status":"publish","title_hn":"‘रामलीला’ के बाद अब ‘पांडव लीला’ की धूम","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
‘रामलीला’ के बाद अब ‘पांडव लीला’ की धूम
Chamoli
Updated Sun, 18 Nov 2012 12:00 PM IST
विज्ञापन
प्रमोद सेमवाल
गोपेश्वर। पर्वतीय क्षेत्र के ग्रामीणों और देवी-देवताओं का चोली-दामन का साथ है। समय-समय पर होने वाले भव्य धार्मिक आयोजन इसके प्रमाण हैं। पिछले एक महीने से रामलीला का मंचन हुआ, तो अब जगह-जगह पांडव लीला के आयोजन की धूम मची है। ग्रामीण पंडों दोवतों (पांडव देव) का जागरों के माध्यम से आह्वान करते हैं। इसके तहत पश्वा डोल-दमाऊं की थाप पर पांच पांडव और द्रोपदी का अद्भुत नृत्य प्रस्तुत किया जाता है।
दशोली प्रखंड के गंगोल गांव में पांडव लीला का मंचन शुरू हो गया है। यहां दोपहर दो बजे बाद पांडव डोल-दमाऊं की थाप पर नृत्य कर रहे हैं। जबकि, रात्रि को ग्रामीण जागरों के साथ मुखौटा नृत्य कर रहे हैं। प्रतिदिन भीम, युधिष्ठिर, अर्जुन, सहदेव, नकुल, द्रोपदी, नागार्जुन, कृष्ण और हनुमान के पश्वा अपने अस्त्र-शस्त्रों की पूजा-अर्चना पारंपरिक ढंग से संपन्न होने के बाद नृत्य कर रहे हैं। इसमें कई बार देवों का प्रतीक बनकर नृत्य करने वाला व्यक्ति खुद को कष्ट भी देता है। ग्रामीणों द्वारा अपने आराध्य देवों को च्यूड़ा (भुने हुए चावल), माल्टा और नया अनाज भेंट करने की परंपरा है।
विज्ञापन
गोपेश्वर। पर्वतीय क्षेत्र के ग्रामीणों और देवी-देवताओं का चोली-दामन का साथ है। समय-समय पर होने वाले भव्य धार्मिक आयोजन इसके प्रमाण हैं। पिछले एक महीने से रामलीला का मंचन हुआ, तो अब जगह-जगह पांडव लीला के आयोजन की धूम मची है। ग्रामीण पंडों दोवतों (पांडव देव) का जागरों के माध्यम से आह्वान करते हैं। इसके तहत पश्वा डोल-दमाऊं की थाप पर पांच पांडव और द्रोपदी का अद्भुत नृत्य प्रस्तुत किया जाता है।
दशोली प्रखंड के गंगोल गांव में पांडव लीला का मंचन शुरू हो गया है। यहां दोपहर दो बजे बाद पांडव डोल-दमाऊं की थाप पर नृत्य कर रहे हैं। जबकि, रात्रि को ग्रामीण जागरों के साथ मुखौटा नृत्य कर रहे हैं। प्रतिदिन भीम, युधिष्ठिर, अर्जुन, सहदेव, नकुल, द्रोपदी, नागार्जुन, कृष्ण और हनुमान के पश्वा अपने अस्त्र-शस्त्रों की पूजा-अर्चना पारंपरिक ढंग से संपन्न होने के बाद नृत्य कर रहे हैं। इसमें कई बार देवों का प्रतीक बनकर नृत्य करने वाला व्यक्ति खुद को कष्ट भी देता है। ग्रामीणों द्वारा अपने आराध्य देवों को च्यूड़ा (भुने हुए चावल), माल्टा और नया अनाज भेंट करने की परंपरा है।
विज्ञापन