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जदोड़ा के घर ठहरती हैं मां नंदा
Chamoli
Updated Thu, 09 Aug 2012 12:00 PM IST
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कर्णप्रयाग। ‘जै बोला, जै भगोती नंदा, नंदा ऊंचा हिमालय की, जमन सिंह जदोड़ा की मां नंदा राजराजेश्वरी.. जै बोला’ मां श्रीनंदा की जागर में देवी के गुणणान के साथ उसके परम भक्तों का भी उल्लेख मिलता है। देवी के इन्हीं भक्तों में संगमस्थली के ईड़ा-बधाणी गांव के जमन सिंह जदोड़ा (गुसाई) का भी उल्लेख है। राजजात में ससुराल (कैलाश) के लिए विदा होने से पूर्व मां श्रीनंदा रात्रि विश्राम के लिए जदोड़ा गुर्साइं (थोकदार) लोगों के यहां पहुंचती है।
मान्यता है कि मां और भक्त के वचन के निर्वहन के लिए राजजात में कैलाश विदा से पूर्व पहले पड़ाव पर मां नंदा ईड़ा-बधाणी पहुंचती हैं। 19 पड़ावों की पैदल ऐतिहासिक और धार्मिक रहस्यों को संजोए राजजात यात्रा में मां श्रीनंदा अपने भक्त को दिए वचन का पालन करने श्रीनंदा की छंतोली नौटी से पहले दिन रात्रि विश्राम के लिए ईड़ा-बधाणी गांव में जदोड़ा गुसाईं लोगों के घर पहुंचती है। यहां अपनी आराध्य को जदोड़ा वंशज जेवर, कलेऊ और श्रृंगार सामग्री भेंट करते हैं। दूसरे दिन समीपवर्ती गांवों का भ्रमण करते हुए देवी की छंतोली पुन: नौटी पहुंचते हुए तीसरे दिन भक्ति और भावुकता के सैलाब में सराबोर होकर कैलाश के लिए विदा होती है।
प्राचीन मान्यता
मान्यताओं के अनुसार प्राचीनकाल में भगवान आशुतोष और मां पार्वती इस स्थान से कैलाश जा रहे थे। इसी दौरान मां पार्वती को प्यास लगी और वे समीपवर्ती गांव बधाणी जा पहुंची। जबकि भगवान शंकर सीधे शैलेश्वर की ओर निकल गए। बधाणी गांव में उस समय के थोकदार और प्रधान जमन सिंह जदोड़ा (गुसाई) ने पानी पिलाने के साथ देवी का खूब आदर सत्कार करते हुए उन्हें दही-भात भी खिलाया। विदा होते समय जमन सिंह जदोड़ा ने देवी मां से कहा कि कैलाश जाते समय वे जरूर उसके घर पर आएं। इसी परंपरा का निर्वहन करते हुए मां श्रीनंदा राजजात में कैलाश विदा होने से पूर्व ईड़ा-बधाणी में जदोड़ा वंशज गुसाईं लोगों के घर रात्रि विश्राम करती हैं।
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जदोड़ा गुसाईं ईड़ा-बधाणी गांव के प्रधान (गांव में श्रेष्ठ) हैं। जमन सिंह जदोड़ा इन्हीं के पूर्वज हैं। मां श्रीनंदा के अनन्य भक्तों में उनकी गिनती होती हैं। गांव एवं क्षेत्र का सौभाग्य है कि मां श्रीनंदा राजजात में अपने भक्त को दिए वचन का पालन करने ससुराल जाने से पूर्व रात्रि विश्राम को उसके घर पहुंचती है।
-प्रो. डीआर पुरोहित, पूर्व निदेशक लोक संस्कृति एवं कला निष्पादन केंद्र, एचएनबी, केविवि श्रीनगर गढ़वाल
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मान्यता है कि मां और भक्त के वचन के निर्वहन के लिए राजजात में कैलाश विदा से पूर्व पहले पड़ाव पर मां नंदा ईड़ा-बधाणी पहुंचती हैं। 19 पड़ावों की पैदल ऐतिहासिक और धार्मिक रहस्यों को संजोए राजजात यात्रा में मां श्रीनंदा अपने भक्त को दिए वचन का पालन करने श्रीनंदा की छंतोली नौटी से पहले दिन रात्रि विश्राम के लिए ईड़ा-बधाणी गांव में जदोड़ा गुसाईं लोगों के घर पहुंचती है। यहां अपनी आराध्य को जदोड़ा वंशज जेवर, कलेऊ और श्रृंगार सामग्री भेंट करते हैं। दूसरे दिन समीपवर्ती गांवों का भ्रमण करते हुए देवी की छंतोली पुन: नौटी पहुंचते हुए तीसरे दिन भक्ति और भावुकता के सैलाब में सराबोर होकर कैलाश के लिए विदा होती है।
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प्राचीन मान्यता
मान्यताओं के अनुसार प्राचीनकाल में भगवान आशुतोष और मां पार्वती इस स्थान से कैलाश जा रहे थे। इसी दौरान मां पार्वती को प्यास लगी और वे समीपवर्ती गांव बधाणी जा पहुंची। जबकि भगवान शंकर सीधे शैलेश्वर की ओर निकल गए। बधाणी गांव में उस समय के थोकदार और प्रधान जमन सिंह जदोड़ा (गुसाई) ने पानी पिलाने के साथ देवी का खूब आदर सत्कार करते हुए उन्हें दही-भात भी खिलाया। विदा होते समय जमन सिंह जदोड़ा ने देवी मां से कहा कि कैलाश जाते समय वे जरूर उसके घर पर आएं। इसी परंपरा का निर्वहन करते हुए मां श्रीनंदा राजजात में कैलाश विदा होने से पूर्व ईड़ा-बधाणी में जदोड़ा वंशज गुसाईं लोगों के घर रात्रि विश्राम करती हैं।
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जदोड़ा गुसाईं ईड़ा-बधाणी गांव के प्रधान (गांव में श्रेष्ठ) हैं। जमन सिंह जदोड़ा इन्हीं के पूर्वज हैं। मां श्रीनंदा के अनन्य भक्तों में उनकी गिनती होती हैं। गांव एवं क्षेत्र का सौभाग्य है कि मां श्रीनंदा राजजात में अपने भक्त को दिए वचन का पालन करने ससुराल जाने से पूर्व रात्रि विश्राम को उसके घर पहुंचती है।
-प्रो. डीआर पुरोहित, पूर्व निदेशक लोक संस्कृति एवं कला निष्पादन केंद्र, एचएनबी, केविवि श्रीनगर गढ़वाल