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उत्तराखंड में छोटी लड़ाई हारे, लेकिन बड़ी लड़ाई जीते रावत
सुधाकर भट्ट/ अमर उजाला, देहरादून
Updated Fri, 22 Apr 2016 09:31 AM IST
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हरीश रावत
- फोटो : AmarUjala
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अब तक के घटनाक्रम को ही ध्यान में रखा जाए तो छोटी लड़ाई हार कर मुख्यमंत्री हरीश रावत एक बड़ी लड़ाई जीतते हुए नजर आ रहे हैं।
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स्टिंग का दाग और अपने नेतृत्व पर सवाल की तोहमत हरीश रावत ने इस बीच झेली। हाईकोर्ट का फैसला आने के बाद यह भी साबित हुआ कि रावत राष्ट्रपति शासन की बड़ी चुनौती से पार पाने में कामयाब रहे। प्रदेश भाजपा ने जो लड़ाई उत्तराखंड की विधानसभा में शुरू की थी, उसे रावत केंद्र तक ले गए। पूर्व मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा एक बार रावत से बीस साबित हुए थे, लेकिन अब वे दो बार उनसे मात खाते हुए ही दिखाई दे रहे हैं।
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18 मार्च को सदन में हुए घमासान के बाद कांग्रेस ने अपनी इस लड़ाई को तरीके से लड़ा। राज्य के तमाम विरोध-प्रदर्शनों में केंद्रीय नेतृत्व को पूरी तरह से किनारे रखा गया। एक बार तो यहां तक कहा कि रावत को कांग्रेस हाईकमान ने अकेला छोड़ दिया है। 27 मार्च को प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लगने के बाद कांग्रेस ने कोर्ट की ओर रुख किया तो तस्वीर का रुख बदलना शुरू हुआ। कोर्ट को कांग्रेस ने पूरी तरह से कांग्रेस हाईकमान पर ही छोड़ दिया। कपिल सिब्बल, मनु सिंघवी की मौजूदगी में विकासनगर विधायक और पूर्व मंत्री नवप्रभात की लगातार नैनीताल में उपस्थिति बनी रही।
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राष्ट्रपति शासन पर कोर्ट के रुख को देखते हुए कांग्रेस अपने पक्ष में फैसले को लेकर आश्वस्त भी थी। यही वजह रही कि कांग्रेस ने इस पूरे विरोध को केंद्र तक सीमित रखा। लोकतंत्र बचाओ से लेकर बागी कांग्रेस विधायकों की दल बदल कानून के तहत सदस्यता समाप्त कराने में रावत का हमलावर रुख केंद्र सरकार की ओर ही रहा। इसके उलट, भाजपा के विधायक दिल्ली की ओर ही रुख करते दिखाई दिए। साफ दिखा कि भाजपा की रणनीति दिल्ली से तो कांग्रेस की रणनीति देहरादून से ही अमल में लाई जाती रही। यह भी बहुत हद तक रावत के ही पक्ष में गया।
कांग्रेस के नौ विधायकों के बागी होने के दंश को भी रावत किसी तरह से सहन कर गए। सीएम के बाद नंबर टू और मुख्यमंत्री हरीश रावत से बीच-बीच में नाराजगी जताने वाली इंदिरा हृदयेश का रावत साथ लेने में सफल रहे तो बाकी के बचे विधायकों को एकजुट रखने में। रावत की राजनीतिक समझ पीडीएफ के मामले में ज्यादा खुलकर सामने आई। कुछ समय पूर्व ही समन्वय समिति की बैठक में पीडीएफ को लेकर सवाल उठा था तो हरीश रावत पर ही यह फैसला छोड़ दिया गया था। रावत ने साफ कहा था कि पीडीएफ कांग्रेस की सहयोगी है और उससे किनारा करने का मतलब नहीं। रावत का यह रुख अब कांग्रेस के काम आया।
29 अप्रैल को बहुमत साबित करने में भी अब पीडीएफ की एकजुटता उनके काम आएगी। वहीं नौ बागी विधायकों के नेता रहे पूर्व मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा एक बार फिर रावत से मात खाते हुए दिख रहे हैं। 2012 में बहुगुणा मुख्यमंत्री बनने की दौड़ में हरीश रावत को पीछे छोड़ गए थे। 2014 में बहुगुणा की जगह हरीश को सीएम बनने का मौका मिला। अब नौ कांग्रेस विधायकों के साथ बहुगुणा सत्ताधारी दल से ही बाहर हैं। इतना होने पर भी अभी रावत की लड़ाई खत्म नहीं हुई है। भाजपा सुप्रीम कोर्ट पहुंच सकती है। वहीं अपने कुनबे को बचाए रखने और आगे की टूट फूट से बचने की चुनौती से भी रावत को जूझना है।