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Bageshwar News: गिनती के रह गए गिद्ध, पर्यावरणीय संतुलन पर बढ़ा खतरा
Thu, 04 Jun 2026 11:29 PM IST
हल्द्वानी ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, बागेश्वर
संवाद न्यूज एजेंसी, बागेश्वर
Updated Thu, 04 Jun 2026 11:29 PM IST
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बागेश्वर। कभी आसमान में बड़ी संख्या में मंडराने वाले गिद्ध अब मुश्किल से नजर आते हैं। पर्यावरणीय बदलाव, मानवीय गतिविधियों और पशुओं में इस्तेमाल होने वाली दवाओं के दुष्प्रभाव ने प्राकृतिक स्वच्छकों की पहचान रखने वाले इन पक्षियों के अस्तित्व पर गंभीर संकट खड़ा कर दिया है।
25 वर्ष पहले जहां जिले में गिद्धों की संख्या हजारों में आंकी जाती थी, वहीं अब इनकी मौजूदगी सैकड़ों तक सिमटकर रह गई है। मृत पशुओं को खाकर पर्यावरण को स्वच्छ बनाए रखने और पारिस्थितिकी तंत्र के संतुलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले गिद्धों की घटती संख्या विशेषज्ञों के लिए चिंता का विषय बनी हुई है।
रेंजर श्याम सिंह करायत के अनुसार वर्तमान में जिले में केवल 150 से 250 गिद्धों के होने का अनुमान है हालांकि नियमित गणना न होने के कारण सटीक आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं। वर्ष 2000-01 के आसपास जिले में गिद्धों की अनुमानित संख्या ढाई से तीन हजार के बीच थी। हालांकि उस समय इनकी औपचारिक गणना नहीं हुई थी। इसके बाद लगातार इनकी संख्या में गिरावट आती गई।
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हिमालयन गिद्ध की तादाद अधिक
बागेश्वर जिले में हिमालयन गिद्ध, दाड़ीदार गिद्ध, सफेद गिद्ध, लाल सिर वाला गिद्ध, पतली चोंच वाला गिद्ध और सफेद पीठ वाला गिद्ध जैसी कई प्रजातियां पाई जाती थीं। लेकिन बीते वर्षों में इनमें से अधिकांश प्रजातियां दुर्लभ होती चली गई हैं।
दवाएं, आवास में कमी और जलवायु परिवर्तन बने प्रमुख कारण
कार्बेट नेशनल पार्क के पक्षी विशेषज्ञ राजेश भट्ट के अनुसार गिद्धों की संख्या में आई भारी गिरावट के पीछे कई कारण जिम्मेदार हैं। डाइक्लोफेनक दवा का सेवन कर चुके पशुओं के शव खाने से बड़ी संख्या में गिद्धों के फेफड़े और किडनी प्रभावित हुए जिससे उनकी मौत हो गई। पशुओं में इस्तेमाल होने वाले अन्य रसायनों और दवाओं ने भी उनकी प्रजनन क्षमता पर प्रतिकूल प्रभाव डाला तथा अंडों के बाहरी आवरण को कमजोर किया। इसके अलावा पहाड़ों के कटान से दाड़ीदार गिद्धों के प्राकृतिक आवास कम हुए हैं। बड़े और पुराने पेड़ों की संख्या घटने से इनके सुरक्षित घोंसले बनाने के स्थान भी कम हो गए हैं। ग्रामीण क्षेत्रों से पलायन, पशुपालन में कमी, मृत पशुओं को खुले में छोड़ने के बजाय दफनाने की बढ़ती प्रवृत्ति, प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन जैसे कारक भी गिद्धों की घटती संख्या के लिए जिम्मेदार माने जा रहे हैं।
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25 वर्ष पहले जहां जिले में गिद्धों की संख्या हजारों में आंकी जाती थी, वहीं अब इनकी मौजूदगी सैकड़ों तक सिमटकर रह गई है। मृत पशुओं को खाकर पर्यावरण को स्वच्छ बनाए रखने और पारिस्थितिकी तंत्र के संतुलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले गिद्धों की घटती संख्या विशेषज्ञों के लिए चिंता का विषय बनी हुई है।
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रेंजर श्याम सिंह करायत के अनुसार वर्तमान में जिले में केवल 150 से 250 गिद्धों के होने का अनुमान है हालांकि नियमित गणना न होने के कारण सटीक आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं। वर्ष 2000-01 के आसपास जिले में गिद्धों की अनुमानित संख्या ढाई से तीन हजार के बीच थी। हालांकि उस समय इनकी औपचारिक गणना नहीं हुई थी। इसके बाद लगातार इनकी संख्या में गिरावट आती गई।
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हिमालयन गिद्ध की तादाद अधिक
बागेश्वर जिले में हिमालयन गिद्ध, दाड़ीदार गिद्ध, सफेद गिद्ध, लाल सिर वाला गिद्ध, पतली चोंच वाला गिद्ध और सफेद पीठ वाला गिद्ध जैसी कई प्रजातियां पाई जाती थीं। लेकिन बीते वर्षों में इनमें से अधिकांश प्रजातियां दुर्लभ होती चली गई हैं।
दवाएं, आवास में कमी और जलवायु परिवर्तन बने प्रमुख कारण
कार्बेट नेशनल पार्क के पक्षी विशेषज्ञ राजेश भट्ट के अनुसार गिद्धों की संख्या में आई भारी गिरावट के पीछे कई कारण जिम्मेदार हैं। डाइक्लोफेनक दवा का सेवन कर चुके पशुओं के शव खाने से बड़ी संख्या में गिद्धों के फेफड़े और किडनी प्रभावित हुए जिससे उनकी मौत हो गई। पशुओं में इस्तेमाल होने वाले अन्य रसायनों और दवाओं ने भी उनकी प्रजनन क्षमता पर प्रतिकूल प्रभाव डाला तथा अंडों के बाहरी आवरण को कमजोर किया। इसके अलावा पहाड़ों के कटान से दाड़ीदार गिद्धों के प्राकृतिक आवास कम हुए हैं। बड़े और पुराने पेड़ों की संख्या घटने से इनके सुरक्षित घोंसले बनाने के स्थान भी कम हो गए हैं। ग्रामीण क्षेत्रों से पलायन, पशुपालन में कमी, मृत पशुओं को खुले में छोड़ने के बजाय दफनाने की बढ़ती प्रवृत्ति, प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन जैसे कारक भी गिद्धों की घटती संख्या के लिए जिम्मेदार माने जा रहे हैं।