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पेड़ नहीं काटने के लिखित आश्वासन पर ही खत्म करेंगे आंदोलन
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बागेश्वर के जाखनी में प्रदर्शन करती महिलाएं, आंदोलन के समर्थन में खड़े युवा। संवाद न्यूज एजेंसी
- फोटो : BAGESHWAR
बागेश्वर। कमेड़ीदेवी-रंगथना-मजगांव-चौनाला मोटर मार्ग के निर्माण में जंगल को काटे जाने का विरोध जारी है। जाखनी गांव की महिलाओं ने पांचवें दिन भी चिपको आंदोलन की तर्ज पर पेड़ों से लिपटकर प्रदर्शन किया। आंदोलन को गांव के युवाओं ने भी समर्थन दिया। आंदोलनकारियों ने सक्षम अधिकारी का लिखित आश्वासन मिलने के बाद ही आंदोलन समाप्त करने की बात कही।
जाखनी गांव के जंगल से चौनाला के लिए बन रहे मोटर मार्ग निर्माण में 500 से अधिक पेड़ों के कटने की आशंका को देखते हुए महिलाओं ने चिपको आंदोलन का सहारा लिया है। महिलाओं की मुहिम को गांव के पुरुषों ने समर्थन दिया और अब गांव की युवा शक्ति भी आंदोलन में शरीक हो गई है। जाखनी परिवार फाउंडेशन के अध्यक्ष और सामाजिक कार्यकर्ता हेमवंत सिंह मेहता ने बताया कि 90 के दशक में जाखनी गांव के जंगल को देवी भगवती को अर्पित कर दिया था। देवी को जंगल चढ़ाने का मकसद पेड़-पौधों की सुरक्षा करना था। इससे पूर्व भी जाखनी के जंगलों से पेड़ नहीं काटे जाते थे। बताया कि पूर्वजों के समय से पेड़ों को बचाने की जो परंपरा चली आ रही है, उसे गांव के युवा भी बखूबी निभा रहे हैं। ऐसे में विकास के नाम पर सालों से सहेजकर रखे पेड़ों पर आरी चलते हुए नहीं देख सकते। आंदोलन कर रहीं महिलाओं का कहना है कि रंगथरा-मजगांव-चौनाला मोटर मार्ग में बीच का गांव मजगांव है, लेकिन सड़क को सेरी-रंगथरा से काटा जा रहा है। जिसमें मजगांव नहीं आता है। ग्रामीणों ने वर्तमान में जहां तक सड़क का कटान हुआ है, वहीं से मजगांव में मिलान करने की मांग की।
वहीं ग्राम प्रधान ईश्वर सिंह मेहता, पूर्व क्षेपं सदस्य जोगा सिंह मेहता, सरपंच कमला मेहता ने कहा कि अब तक जो भी अधिकारी या कर्मचारी यहां पर आए हैं, उन्होंने मौखिक आश्वासन दिया है। सक्षम अधिकारी आंदोलन की सुध लेना तक नहीं चाह रहे। जब तक कोई सक्षम अधिकारी आंदोलन स्थल पर आकर लिखित आश्वासन नहीं देगा, आंदोलन चलता रहेगा। इस मौके पर मंगल सिंह मेहता, गोविंद सिंह मेहता, हिमानी मेहता, धीरज सिंह मेहता, रूप सिंह मेहता, नीमा देवी, इंद्रा देवी आदि थे।
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क्या कहते हैं पर्यावरण प्रेमी
पेड़ और पर्यावरण बचाने के लिए आंदोलन कर रहे जाखनी गांव के लोगों का प्रयास सराहनीय है। धरा की सुंदरता और जिंदगी की जरूरतें बिना पेड़ और जंगल बचाए पूरी नहीं होंगी। ग्रामीणों की मुहिम में छिपे संदेश को समझना होगा। ग्रामीण क्षेत्रों में विकास और सड़क निर्माण में काटे जा रहे पेड़ों की भरपाई करने के लिए स्थानीय निवासियों को व्यापक पौधरोपण अभियान चलाना चाहिए। तभी विकास के साथ पर्यावरण संरक्षण भी किया जा सकेगा। - किशन सिंह मलड़ा, वृक्ष पुरुष, बागेश्वर
पेड़ों से पहाड़, पानी और पर्यावरण जुड़ा हुआ है। मनुष्य को सांस लेने से लेकर प्यास बुझाने तक, भोजन से लेकर सुख सुविधाओं तक में पेड़ों की जरूरत पड़ती है। माना कि गांवों में भी विकास की जरूरत है, लेकिन पेड़ों की कीमत पर विकास नहीं किया जाना चाहिए। मोटर मार्ग निर्माण की सर्वे में गांव के पूर्व से बने पैदल रास्तों को वरीयता दी जानी चाहिए। सड़क बनाने वाली कंपनी को निविदा के समय काटे जाने वाले पेड़ों के बराबर पौधरोपण के स्पष्ट निर्देश दिए जाने चाहिए। - बसंत बल्लभ जोशी, पर्यावरण प्रेमी, अमस्यारी, गरुड़
जाखनी गांव की महिलाओं ने गौरा देवी की याद दिला दी है। आंदोलन कर रही मातृ शक्ति ने प्रबल प्रयास, सकारात्मक सोच, कठिन मेहनत, असीम धैर्य से जिन पौधों को सींचकर पेड़ बनाया है, उनकी सुरक्षा के लिए महिलाएं आरपार की जंग के लिए तैयार हैं। गांव की महिलाओं ने पर्यावरण को लेकर बेखबर हो रहे लोगों को भविष्य के प्रति आइना दिखाया है। अगर अब भी पर्यावरण के प्रति नहीं चेते तो आने वाला कल भयावह हो सकता है। - गिरधर सिंह नेगी, वरिष्ठ प्रोफेसर, इतिहास विभाग, डीएसबी परिसर नैनीताल
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जाखनी गांव के जंगल से चौनाला के लिए बन रहे मोटर मार्ग निर्माण में 500 से अधिक पेड़ों के कटने की आशंका को देखते हुए महिलाओं ने चिपको आंदोलन का सहारा लिया है। महिलाओं की मुहिम को गांव के पुरुषों ने समर्थन दिया और अब गांव की युवा शक्ति भी आंदोलन में शरीक हो गई है। जाखनी परिवार फाउंडेशन के अध्यक्ष और सामाजिक कार्यकर्ता हेमवंत सिंह मेहता ने बताया कि 90 के दशक में जाखनी गांव के जंगल को देवी भगवती को अर्पित कर दिया था। देवी को जंगल चढ़ाने का मकसद पेड़-पौधों की सुरक्षा करना था। इससे पूर्व भी जाखनी के जंगलों से पेड़ नहीं काटे जाते थे। बताया कि पूर्वजों के समय से पेड़ों को बचाने की जो परंपरा चली आ रही है, उसे गांव के युवा भी बखूबी निभा रहे हैं। ऐसे में विकास के नाम पर सालों से सहेजकर रखे पेड़ों पर आरी चलते हुए नहीं देख सकते। आंदोलन कर रहीं महिलाओं का कहना है कि रंगथरा-मजगांव-चौनाला मोटर मार्ग में बीच का गांव मजगांव है, लेकिन सड़क को सेरी-रंगथरा से काटा जा रहा है। जिसमें मजगांव नहीं आता है। ग्रामीणों ने वर्तमान में जहां तक सड़क का कटान हुआ है, वहीं से मजगांव में मिलान करने की मांग की।
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वहीं ग्राम प्रधान ईश्वर सिंह मेहता, पूर्व क्षेपं सदस्य जोगा सिंह मेहता, सरपंच कमला मेहता ने कहा कि अब तक जो भी अधिकारी या कर्मचारी यहां पर आए हैं, उन्होंने मौखिक आश्वासन दिया है। सक्षम अधिकारी आंदोलन की सुध लेना तक नहीं चाह रहे। जब तक कोई सक्षम अधिकारी आंदोलन स्थल पर आकर लिखित आश्वासन नहीं देगा, आंदोलन चलता रहेगा। इस मौके पर मंगल सिंह मेहता, गोविंद सिंह मेहता, हिमानी मेहता, धीरज सिंह मेहता, रूप सिंह मेहता, नीमा देवी, इंद्रा देवी आदि थे।
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क्या कहते हैं पर्यावरण प्रेमी
पेड़ और पर्यावरण बचाने के लिए आंदोलन कर रहे जाखनी गांव के लोगों का प्रयास सराहनीय है। धरा की सुंदरता और जिंदगी की जरूरतें बिना पेड़ और जंगल बचाए पूरी नहीं होंगी। ग्रामीणों की मुहिम में छिपे संदेश को समझना होगा। ग्रामीण क्षेत्रों में विकास और सड़क निर्माण में काटे जा रहे पेड़ों की भरपाई करने के लिए स्थानीय निवासियों को व्यापक पौधरोपण अभियान चलाना चाहिए। तभी विकास के साथ पर्यावरण संरक्षण भी किया जा सकेगा। - किशन सिंह मलड़ा, वृक्ष पुरुष, बागेश्वर
पेड़ों से पहाड़, पानी और पर्यावरण जुड़ा हुआ है। मनुष्य को सांस लेने से लेकर प्यास बुझाने तक, भोजन से लेकर सुख सुविधाओं तक में पेड़ों की जरूरत पड़ती है। माना कि गांवों में भी विकास की जरूरत है, लेकिन पेड़ों की कीमत पर विकास नहीं किया जाना चाहिए। मोटर मार्ग निर्माण की सर्वे में गांव के पूर्व से बने पैदल रास्तों को वरीयता दी जानी चाहिए। सड़क बनाने वाली कंपनी को निविदा के समय काटे जाने वाले पेड़ों के बराबर पौधरोपण के स्पष्ट निर्देश दिए जाने चाहिए। - बसंत बल्लभ जोशी, पर्यावरण प्रेमी, अमस्यारी, गरुड़
जाखनी गांव की महिलाओं ने गौरा देवी की याद दिला दी है। आंदोलन कर रही मातृ शक्ति ने प्रबल प्रयास, सकारात्मक सोच, कठिन मेहनत, असीम धैर्य से जिन पौधों को सींचकर पेड़ बनाया है, उनकी सुरक्षा के लिए महिलाएं आरपार की जंग के लिए तैयार हैं। गांव की महिलाओं ने पर्यावरण को लेकर बेखबर हो रहे लोगों को भविष्य के प्रति आइना दिखाया है। अगर अब भी पर्यावरण के प्रति नहीं चेते तो आने वाला कल भयावह हो सकता है। - गिरधर सिंह नेगी, वरिष्ठ प्रोफेसर, इतिहास विभाग, डीएसबी परिसर नैनीताल