{"_id":"64c2b2074ba759a38d0fd259","slug":"student-given-suggestion-bageshwar-news-c-231-1-shld1004-538-2023-07-27","type":"story","status":"publish","title_hn":"Bageshwar News: प्रधानमंत्री को भाया दिव्यानी का लेख, भेजा सराहना पत्र","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
Bageshwar News: प्रधानमंत्री को भाया दिव्यानी का लेख, भेजा सराहना पत्र
Thu, 27 Jul 2023 11:35 PM IST
हल्द्वानी ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, बागेश्वर
संवाद न्यूज एजेंसी, बागेश्वर
Updated Thu, 27 Jul 2023 11:35 PM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
बागेश्वर। अप्रैल में पीएम नरेंद्र मोदी की परीक्षा पर चर्चा में हिस्सा लेने के बाद पीएम को लिखे लेख के कारण बागेश्वर की बेटी दिव्यानी जगवाल काफी चर्चा में आ गई हैं। दिव्यानी का व्यावहारिक शिक्षा पर लिखा लेख प्रधानमंत्री को पसंद आया है। प्रधानमंत्री ने दिव्यानी को सराहना पत्र भेजा है।
बागेश्वर के प्रतिष्ठित व्यवसायी मनीष जखवाल की पुत्री दिव्यानी को पीएम की परीक्षा पर चर्चा में हिस्सा लेने के बाद व्यावहारिक शिक्षा पर लेख लिखने और प्रधानमंत्री को लेख भेजने का विचार आया। वेटेज हॉल स्कूल द येलो ब्रीक रोड डोंगा देहरादून में कक्षा 12 की छात्रा दिव्यानी ने लेख की शुरूआत ‘जैसे हमारी कल्पना का कोई मापदंड नहीं होता, वैसे ही सीखने का भी कोई मापदंड नहीं होता’ से की है।
अंग्रेजी में लिखे गए लेख में दिव्यानी ने लिखा कि पुराने लोग मानते हैं कि शिक्षा केवल हमें दी गई पाठ्यपुस्तकों और हमारे माता-पिता, पूर्वजों की शिक्षाओं तक ही सीमित है जो शायद कुछ हद तक सही हो लेकिन इसके साथ ही इस तथ्य को नजरअंदाज कर दिया जाता है कि जानकारी और ज्ञान हर गुजरते सेकेंड और अलग-अलग पीढ़ियों में बदलते और संशोधित होते रहते हैं। जो कल की सच्चाई थी, उसे आज के प्रश्नचिह्न के साथ निर्देशित किया जा सकता है।
विज्ञापन
दिव्यानी का मानना है कि शिक्षा की कोई सीमा नहीं है, यह न केवल मेरा दृष्टिकोण है, बल्कि मेरा मानना है कि इसे पूरी दुनिया में, विशेष रूप से स्कूलों में बढ़ावा दिया जाना चाहिए।
सीमाओं के बिना शिक्षा क्यों नहीं
बागेश्वर। दिव्यानी ने पीएम को भेजे लेख में शिक्षा को सीमाओं में बांधने पर विचार प्रकट करते हुए लिखा कि बिना किसी सीमा के शिक्षा एक बच्चे या किसी भी व्यक्ति को न केवल वर्तमान दुनिया और सामान्य मामलों के बारे में जानने में मदद करती है बल्कि उन्हें वर्तमान दुनिया से परे सोचने, देखने, कई परिवेशों के अनुकूल होने, विकल्प चुनने की अनुमति भी देती है। कौशल विकसित करने में मदद करती है। दिव्यानी मानती हैं कि आधुनिक दुनिया में, आधुनिक समस्याओं के साथ, हमें वर्तमान दुनिया की समस्याओं से निपटने के लिए नवीन विचारों वाले नए दिमागों की आवश्यकता है और ऐसे दिमागों को बनाने के लिए सीमाओं के बिना शिक्षा इसका सटीक उपाय है। इससे 21वीं सदी की समस्याओं से कुशलतापूर्वक निपटा जा सकता है।
दिव्यानी का यह भी है मानना
बागेश्वर। दिव्यानी आगे लिखती हैं कि सीमाओं के बिना शिक्षा के सफल कार्यान्वयन के लिए सभी पीढ़ियों के बीच सहयोग और आपसी समझ की आवश्यकता है। पुरानी पीढ़ी की समझ, मूल पीढ़ी के सहयोग और वर्तमान पीढ़ी की कड़ी मेहनत के साथ हम मिलकर भावी पीढ़ी के लिए सीखने और नई दुनिया की समस्याओं को हल करने के लिए उपयुक्त दुनिया बना सकते हैं। उनका मानना है कि एक बच्चा सच्ची शिक्षा तब प्राप्त कर सकता है, जब वह अपनी कक्षाओं में सीखी गई बातों को वास्तविक जीवन की समस्याओं में लागू करता है और उन्हें कुशलता से हल करता है। सूत्र, डेरिवेटिव, पेशेवरों, परिभाषाओं और तारीख को सीखना निश्चित रूप से उन्हें किसी भी प्रतियोगी परीक्षा में उत्तीर्ण कर सकता है लेकिन क्या यह वास्तव में तब उपयोगी होगा जब उन्हें कल आसमान छूना होगा? या क्या उन्हें पता होगा कि जब वास्तविक जीवन की समस्या उनकी परीक्षा लेने आएगी तो उस ज्ञान का उपयोग कैसे करना है? सीमाओं के बिना शिक्षा का अर्थ है बच्चे को किताबी ज्ञान तो सिखाना ही है, साथ ही यह भी सिखाना है कि उसे वास्तविक जीवन में कैसे लागू किया जाए।
पीएम मोदी के पत्र का मजमून
बागेश्वर। पीएम मोदी ने दिव्यानी को भेजे पत्र में स्नेह आशीष से शुरुआत करते हुए लिखा कि परीक्षा पर चर्चा में हिस्सा लेने और इस विषय पर अपने विचार साझा करने के लिए आपका धन्यवाद। आप जैसे युवा साथियों के विचारों को जानना, समझना हमारे लिए उत्साहजनक होता है। युवा पीढ़ी की ऊर्जा, आत्मविश्वास, क्षमताओं को देखकर मुझे अत्यंत गर्व होता है। युवा शक्ति से हमारे देश की आशाएं, आकांक्षाएं जुड़ी हुई हैं। भारत की युवा शक्ति अपने व्यक्तिगत संकल्पों के साथ देश के संकल्पों को जोड़ कर राष्ट्र को प्रगति की ऊंचाइयों पर ले जाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी। उन्होंने दिव्यानी को जीवन की हर परीक्षा में सफलता प्राप्त करने की शुभकामना दी है।
पिता की बात
बागेश्वर। मेधावी दिव्यानी के पिता मनीष जखवाल बताते हैं कि दिव्यानी को बचपन से लिखने का शौक है। वह निरंतर लिखती रहती हैं। दिव्यानी पूरी दक्षता के साथ आगे की पढ़ाई करना चाहती हैं। संवाद
विज्ञापन
बागेश्वर के प्रतिष्ठित व्यवसायी मनीष जखवाल की पुत्री दिव्यानी को पीएम की परीक्षा पर चर्चा में हिस्सा लेने के बाद व्यावहारिक शिक्षा पर लेख लिखने और प्रधानमंत्री को लेख भेजने का विचार आया। वेटेज हॉल स्कूल द येलो ब्रीक रोड डोंगा देहरादून में कक्षा 12 की छात्रा दिव्यानी ने लेख की शुरूआत ‘जैसे हमारी कल्पना का कोई मापदंड नहीं होता, वैसे ही सीखने का भी कोई मापदंड नहीं होता’ से की है।
विज्ञापन
अंग्रेजी में लिखे गए लेख में दिव्यानी ने लिखा कि पुराने लोग मानते हैं कि शिक्षा केवल हमें दी गई पाठ्यपुस्तकों और हमारे माता-पिता, पूर्वजों की शिक्षाओं तक ही सीमित है जो शायद कुछ हद तक सही हो लेकिन इसके साथ ही इस तथ्य को नजरअंदाज कर दिया जाता है कि जानकारी और ज्ञान हर गुजरते सेकेंड और अलग-अलग पीढ़ियों में बदलते और संशोधित होते रहते हैं। जो कल की सच्चाई थी, उसे आज के प्रश्नचिह्न के साथ निर्देशित किया जा सकता है।
विज्ञापन
दिव्यानी का मानना है कि शिक्षा की कोई सीमा नहीं है, यह न केवल मेरा दृष्टिकोण है, बल्कि मेरा मानना है कि इसे पूरी दुनिया में, विशेष रूप से स्कूलों में बढ़ावा दिया जाना चाहिए।
सीमाओं के बिना शिक्षा क्यों नहीं
बागेश्वर। दिव्यानी ने पीएम को भेजे लेख में शिक्षा को सीमाओं में बांधने पर विचार प्रकट करते हुए लिखा कि बिना किसी सीमा के शिक्षा एक बच्चे या किसी भी व्यक्ति को न केवल वर्तमान दुनिया और सामान्य मामलों के बारे में जानने में मदद करती है बल्कि उन्हें वर्तमान दुनिया से परे सोचने, देखने, कई परिवेशों के अनुकूल होने, विकल्प चुनने की अनुमति भी देती है। कौशल विकसित करने में मदद करती है। दिव्यानी मानती हैं कि आधुनिक दुनिया में, आधुनिक समस्याओं के साथ, हमें वर्तमान दुनिया की समस्याओं से निपटने के लिए नवीन विचारों वाले नए दिमागों की आवश्यकता है और ऐसे दिमागों को बनाने के लिए सीमाओं के बिना शिक्षा इसका सटीक उपाय है। इससे 21वीं सदी की समस्याओं से कुशलतापूर्वक निपटा जा सकता है।
दिव्यानी का यह भी है मानना
बागेश्वर। दिव्यानी आगे लिखती हैं कि सीमाओं के बिना शिक्षा के सफल कार्यान्वयन के लिए सभी पीढ़ियों के बीच सहयोग और आपसी समझ की आवश्यकता है। पुरानी पीढ़ी की समझ, मूल पीढ़ी के सहयोग और वर्तमान पीढ़ी की कड़ी मेहनत के साथ हम मिलकर भावी पीढ़ी के लिए सीखने और नई दुनिया की समस्याओं को हल करने के लिए उपयुक्त दुनिया बना सकते हैं। उनका मानना है कि एक बच्चा सच्ची शिक्षा तब प्राप्त कर सकता है, जब वह अपनी कक्षाओं में सीखी गई बातों को वास्तविक जीवन की समस्याओं में लागू करता है और उन्हें कुशलता से हल करता है। सूत्र, डेरिवेटिव, पेशेवरों, परिभाषाओं और तारीख को सीखना निश्चित रूप से उन्हें किसी भी प्रतियोगी परीक्षा में उत्तीर्ण कर सकता है लेकिन क्या यह वास्तव में तब उपयोगी होगा जब उन्हें कल आसमान छूना होगा? या क्या उन्हें पता होगा कि जब वास्तविक जीवन की समस्या उनकी परीक्षा लेने आएगी तो उस ज्ञान का उपयोग कैसे करना है? सीमाओं के बिना शिक्षा का अर्थ है बच्चे को किताबी ज्ञान तो सिखाना ही है, साथ ही यह भी सिखाना है कि उसे वास्तविक जीवन में कैसे लागू किया जाए।
पीएम मोदी के पत्र का मजमून
बागेश्वर। पीएम मोदी ने दिव्यानी को भेजे पत्र में स्नेह आशीष से शुरुआत करते हुए लिखा कि परीक्षा पर चर्चा में हिस्सा लेने और इस विषय पर अपने विचार साझा करने के लिए आपका धन्यवाद। आप जैसे युवा साथियों के विचारों को जानना, समझना हमारे लिए उत्साहजनक होता है। युवा पीढ़ी की ऊर्जा, आत्मविश्वास, क्षमताओं को देखकर मुझे अत्यंत गर्व होता है। युवा शक्ति से हमारे देश की आशाएं, आकांक्षाएं जुड़ी हुई हैं। भारत की युवा शक्ति अपने व्यक्तिगत संकल्पों के साथ देश के संकल्पों को जोड़ कर राष्ट्र को प्रगति की ऊंचाइयों पर ले जाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी। उन्होंने दिव्यानी को जीवन की हर परीक्षा में सफलता प्राप्त करने की शुभकामना दी है।
पिता की बात
बागेश्वर। मेधावी दिव्यानी के पिता मनीष जखवाल बताते हैं कि दिव्यानी को बचपन से लिखने का शौक है। वह निरंतर लिखती रहती हैं। दिव्यानी पूरी दक्षता के साथ आगे की पढ़ाई करना चाहती हैं। संवाद