Uttarakhand News: उत्तराखंड में तैयार होने लगे असम के मूंगा रेशम के सीड, इन इलाकों में बनेंगे कलस्टर
बागेश्वर जिले में सफल ट्रायल के बाद रेशम विभाग ने खुद सीड उत्पादन शुरू कर दिया है। कपकोट ब्लॉक के तीन गांवों पुड़कूनी, चीराबगड़ और तिमिलाबगड़ को मूंगा रेशम उत्पादन के लिए क्लस्टर मॉडल में विकसित करने की योजना तैयार की गई है।
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कभी असम पर निर्भर रहने वाला उत्तराखंड अपने दम पर मूंगा रेशम क्रांति की ओर कदम बढ़ा रहा है। बागेश्वर जिले में सफल ट्रायल के बाद रेशम विभाग ने खुद सीड उत्पादन शुरू कर दिया है। अब किसानों को बाहर से सीड मंगाने की जरूरत नहीं पड़ेगी। कपकोट ब्लॉक के तीन गांवों पुड़कूनी, चीराबगड़ और तिमिलाबगड़ को मूंगा रेशम उत्पादन के लिए क्लस्टर मॉडल में विकसित करने की योजना तैयार की गई है। इसके तहत 25 किसानों का चयन किया गया है जो मिलकर रेशम उत्पादन की नई कहानी लिखेंगे। रेशम विभाग किसानों से मिले कोकून का इस्तेमाल सीड तैयार करने में कर रहा है।
इस क्रांति के पीछे हैं वृक्ष पुरुष किशन सिंह मलड़ा। उन्होंने वर्ष 2012 से मूंगा रेशम पर काम शुरू किया था। दस साल की मेहनत के बाद वर्ष 2022 में उन्हें शुरुआती सफलता मिली। रेशम विभाग की मदद से उन्होंने असम से सीड लाकर देवकी लघु वाटिका में प्रयोग शुरू किया। कॉल और वेदू के पौधों पर कीटों को पालकर उन्होंने कोकून और अंडे तैयार किए। यहीं से शुरू हुआ बागेश्वर का रेशम आत्मनिर्भरता अभियान।
एक साल में चार फसल
रेशम कीट के जीवन चक्र में तितली से अंडे निकलते हैं। अंडों से बर्मी तैयार होती है। यही बर्मी रेशम उत्पादन के लिए सीड के रूप में किसानों को दी जाती है। मलड़ा बताते हैं कि वर्ष 2024-25 में उन्होंने अब तक तीन फसलें ले ली हैं। वह इस समय चौथी फसल की तैयारी में जुटे हैं।
बागेश्वर में अगर कोल्ड स्टोर होता तो मूंगा रेशम का कारोबार बढ़ सकता है। वर्तमान में कोकून से एक सप्ताह से 10 दिन में तितली तैयार हो रही है। एक सप्ताह में अंडे देने के बाद तितली का जीवन चक्र पूरा हो जाता है। अगर कोल्ड स्टोर होगा तो किसान उन अंडों को लंबे समय से तक सुरक्षित रखने में मदद मिलेगी। -किशन सिंह मलड़ा, वृक्ष पुरुष
बागेश्वर जिले में उत्पादित कोकून से ही सीड बनाया जा रहा है। इससे न केवल असम पर निर्भरता खत्म होगी बल्कि स्थानीय किसानों को बेहतर प्रशिक्षण, भवन और नेट भी उपलब्ध कराए जाएंगे। कलस्टर मॉडल के तहत चयनित किसानों को हर संभव सहायता दी जा रही है ताकि बागेश्वर में मूंगा रेशम की पहचान राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित की जा सके। -कमलेश कुमार, फार्म प्रभारी, रेशम विभाग