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सरपंचों ने वन अधिनियम के संशोधनों का किया विरोध
Mon, 03 Jun 2019 12:45 AM IST
बृजमोहन बृजमोहन
अमर उजाला ब्यूरो बागेश्वर।
अमर उजाला ब्यूरो बागेश्वर।
Published by: बृजमोहन बृजमोहन
Updated Mon, 03 Jun 2019 12:45 AM IST
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बागेश्वर के स्वराज भवन में वन सरपंच संगठन की बैठक में मौजूद सदस्य
- फोटो : AMAR UJALA
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। वन पंचायत सरपंच संगठन ने वन अधिनियम के प्रस्तावित संशोधन का विरोध शुरू कर दिया है। संगठन ने संशोधन को खारिज करने की मांग की है। मांग पूरी नहीं होने पर प्रदेश व्यापी आंदोलन की चेतावनी दी है।
संगठन की बैठक रविवार को नुमाइश खेत स्थित स्वराज भवन के सभागार में हुई। वक्ताओं ने कहा कि यदि वन एक्ट में प्रस्तावित संशोधन हो गया तो वन विभाग को बिना वारंट गिरफ्तारी, किसी को भी गोली मारने, जंगल में आग लगने पर संबंधित ग्रामीणों के वनाधिकार समाप्ति के अव्यवहारिक प्रावधान है। इससे सैकड़ों सालों से चले आ रहे ग्रामीणों के वनाधिकार भी समाप्त हो जाएंगे। उन्होंने कहा कि उत्तराखंड के 85 फीसदी भूभाग में जंगल है।
इस संशोधन के लागू होने से पहाड़ में बसे लोगों का जीना दूभर हो जाएगा। पलायन, वन और जन के बीच संघर्ष बढ़ेगा जो दोनों के लिए घातक साबित होगा। आरोप लगाया कि वन पंचायतों को भी वन विभाग के नियंत्रण में कर दिया है ऐसे में वह बिना पैसे के चौकीदार हो गए हैं। उन्होंने वन पंचायतों को वन विभाग के नियंत्रण से बाहर करने की मांग की है। इस मौके पर आगे की रणनीति बनाने के लिए कुमाऊं मंडल के सभी जिलों को जोड़कर संयोजक मंडल बनाने की योजना बनी है। बैठक में बागेश्वर, चंपावत, अल्मोड़ा, पिथौरागढ़, मुनस्यारी की वन पंचायतों के सरपंचों ने हिस्सा लिया। इस दौरान पूरन रावल, दान सिंह कठायत, ईश्वर जोशी, पीसी जोशी, पुष्कर सिंह, कुशल सिंह बिष्ट, सदन मिश्रा, रमेश कृषक, नयन पंत, डूंगर, सिंह, एमएम उपाध्याय आदि शामिल थे।
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संगठन की बैठक रविवार को नुमाइश खेत स्थित स्वराज भवन के सभागार में हुई। वक्ताओं ने कहा कि यदि वन एक्ट में प्रस्तावित संशोधन हो गया तो वन विभाग को बिना वारंट गिरफ्तारी, किसी को भी गोली मारने, जंगल में आग लगने पर संबंधित ग्रामीणों के वनाधिकार समाप्ति के अव्यवहारिक प्रावधान है। इससे सैकड़ों सालों से चले आ रहे ग्रामीणों के वनाधिकार भी समाप्त हो जाएंगे। उन्होंने कहा कि उत्तराखंड के 85 फीसदी भूभाग में जंगल है।
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इस संशोधन के लागू होने से पहाड़ में बसे लोगों का जीना दूभर हो जाएगा। पलायन, वन और जन के बीच संघर्ष बढ़ेगा जो दोनों के लिए घातक साबित होगा। आरोप लगाया कि वन पंचायतों को भी वन विभाग के नियंत्रण में कर दिया है ऐसे में वह बिना पैसे के चौकीदार हो गए हैं। उन्होंने वन पंचायतों को वन विभाग के नियंत्रण से बाहर करने की मांग की है। इस मौके पर आगे की रणनीति बनाने के लिए कुमाऊं मंडल के सभी जिलों को जोड़कर संयोजक मंडल बनाने की योजना बनी है। बैठक में बागेश्वर, चंपावत, अल्मोड़ा, पिथौरागढ़, मुनस्यारी की वन पंचायतों के सरपंचों ने हिस्सा लिया। इस दौरान पूरन रावल, दान सिंह कठायत, ईश्वर जोशी, पीसी जोशी, पुष्कर सिंह, कुशल सिंह बिष्ट, सदन मिश्रा, रमेश कृषक, नयन पंत, डूंगर, सिंह, एमएम उपाध्याय आदि शामिल थे।
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