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Bageshwar News: अपनों के दीदार का इंतजार कर रही दुगड़ा की वीरान बाखली, अपनी जरूरतों के लिए घर छोड़ गए लोग

Wed, 23 Oct 2024 12:03 PM IST
हीरा मेहरा शंकर पांडेय, संवाद
शंकर पांडेय, संवाद Published by: हीरा मेहरा Updated Wed, 23 Oct 2024 12:03 PM IST
सार

शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार ने किस तरह लोगों को उनकी माटी को अलग कर दिया, इसकी एक बानगी खुनौली गांव के दुगड़ा तोक की बाखली है। यहां 40 साल पहले तक 45 लोगों का भरा-पूरा परिवार बसता था। 

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People of Dugda village of bageshwar left their homes for education, health and employment
दुगड़ा गांव - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार ने किस तरह लोगों को उनकी माटी को अलग कर दिया, इसकी एक बानगी खुनौली गांव के दुगड़ा तोक की बाखली है। यहां 40 साल पहले तक 45 लोगों का भरा-पूरा परिवार बसता था। बाद के वर्षों में सुविधाओं की तलाश में एक-एक कर बाखली के लोग अपना घर छोड़ते चले गए। आईएफएस, कैप्टन, सैनिक, शिक्षक, कारोबारी देने वाली बाखली अब जर्जर हो चुकी है। अपनी अंतिम सांसें गिन रही इस बाखली को शायद है अपनों को एक नजर देख लेने का इंतजार है।

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दुगड़ा तोक की पुरानी काष्ठकला की नायाब कृति वाली इस बाखली को 1890 के दशक में नंद राम बचखेती और अमर देव बचखेती ने बनवाया था। तब यह छोटे रूप में भी थी। बाद में परिवार बढ़ा तो 1954 में इसकी मरम्मत कराकर इसे वृहद रूप दिया गया। 1970 के दशक में इस बाखली में पांच परिवारों के करीब 45 लोग रहते थे। बाद के वर्षों में शिक्षा, सड़क और रोजगार की खोज में पलायन बढ़ता गया। करीब दस साल पहले यह बाखली वीरान हो गई। वर्तमान में बचखेती वंशजों के दो परिवारों के दो बुजुर्ग दंपती गांव में रहते हैं लेकिन उन्होंने भी बाखली से अलग अपने मकान बनाए हैं।

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त्योहारों पर गुलजार रहती थी बाखली
बागेश्वर में रहने वाले सेवानिवृत वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी किशन चंद्र बचखेती ने भी इसी बाखली में बचपन गुजारा था। उनके परदादा ने ही इस बाखली को बनवाया था। वह बताते हैं कि एक बाखली में बचखेती वंशजों का पूरा गांव समाया हुआ था। होली पर सैकड़ों लोग बाखली में जमा होकर होली गायन करते थे। दिवाली पर काफी रौनक रहती थी।

 

यादें बसी हैं बाखली में
गाजियाबाद में रहने वाले रिटायर्ड कैप्टन लीलाधर बचखेती बताते हैं कि उनका बचपन इसी बाखली में बीता है। सुविधाएं न होने से गांव छोड़ना पड़ा था। बाखली की यादें तो बहुत हैं, इसके वीरान होने का दुख भी है। अगर सभी लोग हाथ बढ़ाएं तो बाखली को धरोहर के रूप में संरक्षित करने का प्रयास करेंगे।

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