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Bageshwar News: सस्ती नाशपाती से किसानों का मोहभंग
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वाजिब दाम न मिलने के कारण किसान अब नहीं लगा रहे नाशपाती के बगीचे
आनंद बिष्ट
गरुड़ (बागेश्वर)। जिले की कत्यूर घाटी में नाशपाती का सर्वाधिक उत्पादन होता है। इसके बावजूद इन किसानों की नाशपाती एक, दो रुपये प्रति किलो की दर से बिकी। कई किसानों को उपज की लागत तक नहीं मिल सकी। इस कारण किसान नाशपाती उगाने में दिलचस्पी नहीं ले रहे हैं। नाशपाती उत्पादन से फायदा न होने पर किसानों ने नाशपाती का पौधरोपण बंद कर दिया जबकि कुछ किसानों ने अपने बागानों से नाशपाती के पेड़ ही हटा दिए।
स्थानीय किसानों ने बताया कि वर्ष 1970 के दशक में उद्यान विभाग और गरुड़ के मूलवासी नवीन मंडी हल्द्वानी के आढ़ती स्व. धन गिरि गोस्वामी ने कत्यूर घाटी के किसानों को नाशपाती के बगीचे लगाने के लिए प्रेरित किया था।
तब किसानों को नाशपाती के दाम ठीक मिले लेकिन बाद में पैदावार बढ़ने पर मंडियों में नाशपाती के दाम घटने के कारण किसानों का मन इस खेती से हट गया। जैसर ढिकुरा गांव निवासी सुनील पांडे ने बताया कि पहले नाशपाती का सबसे ज्यादा उत्पादन गागरीगोल क्षेत्र में होता था। उन्होंने बताया कि व्यापारी किसानों से आज भी एक, दो रुपये प्रति किलो की दर से नाशपाती खरीद रहे हैं।
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कुंदन सिंह कबडोला स्यालीस्टेट, शंकर राम पडियारखेत, सुंदर बरोलिया देवनाई, प्रकाश सिंह थायत पुरुड़ा, नारायण नाथ बिनखोली, बलवंत सिंह भिलकोट, भुवन मिश्रा गागरीगोल, नंदन थापा अयारतोली, बलवंत सिंह गलई, नारायण दत्त भट्ट, महेश कुलेगी आदि गरुड़ क्षेत्र हल्द्वानी मंडी में नाशपाती भेजते हैं। उन्होंने बताया कि हल्द्वानी मंडी में प्रति कट्टा 150-180 रुपये की दर से नाशपाती बिक रही है। मंडी में उचित दाम न मिलने के कारण उन्हें रोज हजारों रुपये का घाटा हो रहा है। संवाद
दो, तीन ट्रक रह गई दैनिक आपूर्ति
गरुड़ (बागेश्वर)। पहले कत्यूर क्षेत्र से रोजाना कई ट्रक नाशपाती हल्द्वानी मंडी भेजी जाती थी। वहां से खाली आने वाले ट्रक में कम भाड़े पर यहां तक ईंट पहुंचाई जाती थी लेकिन अब कत्यूर घाटी ट्रक एसोसिएशन के संजय फर्स्वाण, कंचन सिंह थायत, महेश रावत, कुंदन सिंह नेगी, प्रकाश रावल ने बताया कि इस बार क्षेत्र से रोजाना दो, तीन ट्रक नाशपाती ही हल्द्वानी मंडी भेजी जा रही है। संवाद
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आनंद बिष्ट
गरुड़ (बागेश्वर)। जिले की कत्यूर घाटी में नाशपाती का सर्वाधिक उत्पादन होता है। इसके बावजूद इन किसानों की नाशपाती एक, दो रुपये प्रति किलो की दर से बिकी। कई किसानों को उपज की लागत तक नहीं मिल सकी। इस कारण किसान नाशपाती उगाने में दिलचस्पी नहीं ले रहे हैं। नाशपाती उत्पादन से फायदा न होने पर किसानों ने नाशपाती का पौधरोपण बंद कर दिया जबकि कुछ किसानों ने अपने बागानों से नाशपाती के पेड़ ही हटा दिए।
स्थानीय किसानों ने बताया कि वर्ष 1970 के दशक में उद्यान विभाग और गरुड़ के मूलवासी नवीन मंडी हल्द्वानी के आढ़ती स्व. धन गिरि गोस्वामी ने कत्यूर घाटी के किसानों को नाशपाती के बगीचे लगाने के लिए प्रेरित किया था।
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तब किसानों को नाशपाती के दाम ठीक मिले लेकिन बाद में पैदावार बढ़ने पर मंडियों में नाशपाती के दाम घटने के कारण किसानों का मन इस खेती से हट गया। जैसर ढिकुरा गांव निवासी सुनील पांडे ने बताया कि पहले नाशपाती का सबसे ज्यादा उत्पादन गागरीगोल क्षेत्र में होता था। उन्होंने बताया कि व्यापारी किसानों से आज भी एक, दो रुपये प्रति किलो की दर से नाशपाती खरीद रहे हैं।
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कुंदन सिंह कबडोला स्यालीस्टेट, शंकर राम पडियारखेत, सुंदर बरोलिया देवनाई, प्रकाश सिंह थायत पुरुड़ा, नारायण नाथ बिनखोली, बलवंत सिंह भिलकोट, भुवन मिश्रा गागरीगोल, नंदन थापा अयारतोली, बलवंत सिंह गलई, नारायण दत्त भट्ट, महेश कुलेगी आदि गरुड़ क्षेत्र हल्द्वानी मंडी में नाशपाती भेजते हैं। उन्होंने बताया कि हल्द्वानी मंडी में प्रति कट्टा 150-180 रुपये की दर से नाशपाती बिक रही है। मंडी में उचित दाम न मिलने के कारण उन्हें रोज हजारों रुपये का घाटा हो रहा है। संवाद
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गरुड़ (बागेश्वर)। पहले कत्यूर क्षेत्र से रोजाना कई ट्रक नाशपाती हल्द्वानी मंडी भेजी जाती थी। वहां से खाली आने वाले ट्रक में कम भाड़े पर यहां तक ईंट पहुंचाई जाती थी लेकिन अब कत्यूर घाटी ट्रक एसोसिएशन के संजय फर्स्वाण, कंचन सिंह थायत, महेश रावत, कुंदन सिंह नेगी, प्रकाश रावल ने बताया कि इस बार क्षेत्र से रोजाना दो, तीन ट्रक नाशपाती ही हल्द्वानी मंडी भेजी जा रही है। संवाद