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जहां बहता था पशुओं का खून अब वहां खिलते हैं फूल

Sun, 13 Nov 2016 11:18 PM IST
अमर उजाला ब्यूरो, बागेश्वर
अमर उजाला ब्यूरो, बागेश्वर Updated Sun, 13 Nov 2016 11:18 PM IST
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Now the flowers bloom where flowed the blood of animals
मंदिर के बाहर खिले फूल - फोटो : अमर उजाला
उत्तराखंड के मंदिरों में दी जाने वाली पशु बलि प्रथा धीरे-धीरे समाप्ति की ओर है। इसी का असर है कि आदि शंकराचार्य द्वारा दसवीं सदी में स्थापित कांडा के प्रसिद्ध कालिका मंदिर के जिस स्थान पर 1100 वर्षों तक पशुओं का रक्त बहा करता था अब वहां फूल खिला करते हैं। श्रद्धालु अब मन्नत पूरी करने के लिए पशु बलि के स्थान पर मंदिर में नारियल चढ़ाया करते हैं। 
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बागेश्वर जिला मुख्यालय से लगभग 30 किमी की दूरी पर कांडा पड़ाव स्थित है।

कहा जाता है कि कांडा क्षेत्र में काल का आतंक था। वह हर साल एक नरबलि लेता था। वह अदृश्य काल जिसका भी नाम लेता, उसकी तत्काल मृत्यु हो जाती थी। इससे लोग भयभीत रहते थे। दसवीं सदी में जगतगुरु शंकराचार्य कैलाश यात्रा पर जा रहे थे। उन्होंने इस स्थान पर विश्राम किया। तब स्थानीय लोगों ने आपबीती उन्हें सुनाई। जगतगुरु ने स्थानीय लोहारों के हाथों लोहे के नौ कड़ाहे बनवाए। लोक मान्यताओं के अनुसार उन्होंने अदृश्य काल को सात कड़ाहों के नीचे दबा दिया और इसके ऊपर एक विशाल शिला रख दी। इसके बाद उन्होंने यहां एक पेड़ की जड़ पर मां काली की स्थापना की। कहा जाता है कि तब से काल का भय समाप्त हो गया।
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इसके बाद लोगों ने हर साल नवरात्र पर पंच बलि देने की प्रथा शुरू की। कुछ वर्ष पूर्व तक काली मंदिर में नवरात्र पर देवी को पेठा, छिपकली, सूअर, बकरा और भैंसें की पंच बलि दी जाती थी। भैंसों को बांधने के लिए मंदिर परिसर में ही एक खंभा भी गाड़ा गया था। पशु बलि देने के लिए हजारों की संख्या में लोग जुटते थे। परंतु हाईकोर्ट के निर्देश के बाद मंदिर में पशु बलि बंद कर दी गई है। 1100 वर्षों से जिस स्थान पर पशुओं का खून बहा करता था वहां पर गेंदे के खूबसूरत फूल खिला करते हैं। वर्तमान में यहां पर भव्य मंदिर का निर्माण किया गया है।
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