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हमारी अस्मिता की पहचान है मातृभाषा
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डॉ. नवीन जोशी।
- फोटो : BAGESHWAR
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बागेश्वर। मनुष्य की अस्मिता की पहचान उसकी मातृभाषा से होती है। हर देश और प्रांत की अपनी अलग बोली और अलग भाषा होती है। भाषा और बोली के माध्यम से ही हम एक दूसरे से संवाद स्थापित करते हैं। हमारे देश में कई भाषा और बोलियां बोली जाती हैं। बावजूद इसके देश की सबसे अधिक बोली और पढ़ी जाने वाली भाषा हिंदी है। देश के 60 प्रतिशत से अधिक लोग हिंदी भाषा बोलते हैं, बावजूद इसके अब तक हिंदी भाषा को राष्ट्रभाषा का दर्जा नहीं मिल सका है। मातृभाषा हिंदी के कई साहित्यकार और हिंदी प्रेमी हिंदी को राष्ट्रभाषा का दर्जा देने की समय-समय पर मांग उठाते रहे हैं। जिले के कई साहित्यकार हिंदी के उत्थान को लेकर अपने स्तर से कार्य कर रहे हैं।
जिले के साहित्यकारों का मानना है कि आजादी के बाद हिंदी को जो मुकाम मिलना चाहिए था, अब तक की सरकारें उस दिशा में ठोस पहल नहीं कर सकी हैं। हिंदी की बजाय अब भी विदेशी भाषा को बढ़ावा दिया जाता है। आजादी के बाद भी न्यायालयों के कामकाज में हिंदी की बजाय अंग्रेजी का प्रयोग होता है। बैंक के आवेदन फॉर्म से लेकर बांड तक हर जगह अंग्रेजी का बोलबाला है। अंग्रेजी बोलने वाले को हिंदीभाषी से श्रेष्ठ समझने और दिखाने का चलन अब भी समाप्त नहीं हो सका है।
साहित्यकारों का मानना है कि हिंदी हमारी जड़ों से जुड़ी है, लेकिन उसे उचित सम्मान नहीं दिया जाता है। जबकि विदेश से आई भाषा को हम सर्वोपरि मानने लगे हैं। हर देश और प्रांत को अपनी भाषा में कामकाज की सहूलियत दी जानी चाहिए। हिंदी को राष्ट्रभाषा का दर्जा दिलाने के लिए कार्य कर रहे हिंदी साहित्य भारती संगठन के साहित्यकार मातृभाषा को विश्वव्यापी बनाने की दिशा में कार्य कर रहे हैं। इन साहित्यकारों की पहल से आज विश्व के 20 देशों में संगठन से जुड़े साहित्यकार हिंदी को बढ़ावा देने का कार्य कर रहे हैं। हिंदी को देश की राष्ट्रभाषा बनाने के लिए भी इनका प्रयास लगातार चल रहा है।
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इसे विडंबना ही कहेंगे कि आजादी के बाद से लगातार उठ रही मांग के बावजूद मातृभाषा हिंदी को राष्ट्रभाषा का दर्जा नहीं मिल सका है। हमारी मातृभाषा हिंदी राष्ट्रभाषा बनाए जाने के सर्वथा उपयुक्त है। हिंदी की बजाय अंग्रेजी को बढ़ावा देना अब भी हमारी मानसिक गुलामी को दर्शाता है। युवा पीढ़ी को मातृभाषा संरक्षण के लिए आगे आकर कार्य करना होगा। मातृभाषा हिंदी बचेगी, तभी देश का कला, संस्कृति, इतिहास और साहित्य भी सुरक्षित रहेगा।
डॉ. गोपाल कृष्ण जोशी, साहित्यकार, प्रवक्ता इंका क्वैराली
मातृभाषा न केवल हमारी चेतन अवस्था का आइना है बल्कि लोक की चेतना का भी अभिलेख है। वर्तमान में भाषा को विद्वता एवं सामाजिक स्तर का द्योतक बना दिया गया है, जो कि मातृभाषा हिंदी के दिनों दिन अवमूल्यन का कारण बनता जा रहा है। मातृभाषा हिंदी को उचित महत्व और सम्मान देने की जरूरत है। हमें अपनी मातृभाषा पर गर्व करते हुए सभी भाषाओं को समान रूप से स्वीकार करना होगा। हिंदी को जितना अधिक बढ़ावा मिलेगा, वह देश हित में होगा।
डॉ. राजीव जोशी, साहित्यकार, प्रवक्ता डायट बागेश्वर
मातृभाषा हिंदी को वर्तमान समय में उचित सम्मान मिलता दिख रहा है। हिंदी माध्यम में मीडिया और व्यवसायिक बाजार का बढ़ना हिंदी को वैश्विक पहचान दिलाने की ओर बेहतर कदम है। युवा पीढ़ी भी हिंदी को लेकर सकारात्मक हो रही है। हिंदी को एक समृद्ध भाषा के रूप में स्थापित करने का यह सही समय है। अब विदेशी भाषाओं की बजाय अपनी मातृभाषा हिंदी को सर्वोपरि मानने और हिंदी को राष्ट्रभाषा का दर्जा देकर विश्व स्तर पर पहचान दिलाने की जरूरत है।
डॉ. केएस रावत, साहित्यकार, प्रवक्ता डायट बागेश्वर
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जिले के साहित्यकारों का मानना है कि आजादी के बाद हिंदी को जो मुकाम मिलना चाहिए था, अब तक की सरकारें उस दिशा में ठोस पहल नहीं कर सकी हैं। हिंदी की बजाय अब भी विदेशी भाषा को बढ़ावा दिया जाता है। आजादी के बाद भी न्यायालयों के कामकाज में हिंदी की बजाय अंग्रेजी का प्रयोग होता है। बैंक के आवेदन फॉर्म से लेकर बांड तक हर जगह अंग्रेजी का बोलबाला है। अंग्रेजी बोलने वाले को हिंदीभाषी से श्रेष्ठ समझने और दिखाने का चलन अब भी समाप्त नहीं हो सका है।
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साहित्यकारों का मानना है कि हिंदी हमारी जड़ों से जुड़ी है, लेकिन उसे उचित सम्मान नहीं दिया जाता है। जबकि विदेश से आई भाषा को हम सर्वोपरि मानने लगे हैं। हर देश और प्रांत को अपनी भाषा में कामकाज की सहूलियत दी जानी चाहिए। हिंदी को राष्ट्रभाषा का दर्जा दिलाने के लिए कार्य कर रहे हिंदी साहित्य भारती संगठन के साहित्यकार मातृभाषा को विश्वव्यापी बनाने की दिशा में कार्य कर रहे हैं। इन साहित्यकारों की पहल से आज विश्व के 20 देशों में संगठन से जुड़े साहित्यकार हिंदी को बढ़ावा देने का कार्य कर रहे हैं। हिंदी को देश की राष्ट्रभाषा बनाने के लिए भी इनका प्रयास लगातार चल रहा है।
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इसे विडंबना ही कहेंगे कि आजादी के बाद से लगातार उठ रही मांग के बावजूद मातृभाषा हिंदी को राष्ट्रभाषा का दर्जा नहीं मिल सका है। हमारी मातृभाषा हिंदी राष्ट्रभाषा बनाए जाने के सर्वथा उपयुक्त है। हिंदी की बजाय अंग्रेजी को बढ़ावा देना अब भी हमारी मानसिक गुलामी को दर्शाता है। युवा पीढ़ी को मातृभाषा संरक्षण के लिए आगे आकर कार्य करना होगा। मातृभाषा हिंदी बचेगी, तभी देश का कला, संस्कृति, इतिहास और साहित्य भी सुरक्षित रहेगा।
डॉ. गोपाल कृष्ण जोशी, साहित्यकार, प्रवक्ता इंका क्वैराली
मातृभाषा न केवल हमारी चेतन अवस्था का आइना है बल्कि लोक की चेतना का भी अभिलेख है। वर्तमान में भाषा को विद्वता एवं सामाजिक स्तर का द्योतक बना दिया गया है, जो कि मातृभाषा हिंदी के दिनों दिन अवमूल्यन का कारण बनता जा रहा है। मातृभाषा हिंदी को उचित महत्व और सम्मान देने की जरूरत है। हमें अपनी मातृभाषा पर गर्व करते हुए सभी भाषाओं को समान रूप से स्वीकार करना होगा। हिंदी को जितना अधिक बढ़ावा मिलेगा, वह देश हित में होगा।
डॉ. राजीव जोशी, साहित्यकार, प्रवक्ता डायट बागेश्वर
मातृभाषा हिंदी को वर्तमान समय में उचित सम्मान मिलता दिख रहा है। हिंदी माध्यम में मीडिया और व्यवसायिक बाजार का बढ़ना हिंदी को वैश्विक पहचान दिलाने की ओर बेहतर कदम है। युवा पीढ़ी भी हिंदी को लेकर सकारात्मक हो रही है। हिंदी को एक समृद्ध भाषा के रूप में स्थापित करने का यह सही समय है। अब विदेशी भाषाओं की बजाय अपनी मातृभाषा हिंदी को सर्वोपरि मानने और हिंदी को राष्ट्रभाषा का दर्जा देकर विश्व स्तर पर पहचान दिलाने की जरूरत है।
डॉ. केएस रावत, साहित्यकार, प्रवक्ता डायट बागेश्वर