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कुली बेगार आंदोलन की सफलता से अभिभूत थे गांधी जी
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कौसानी के इसी अनासक्ति आश्रम में ठहरे थे महात्मा गांधी।
- फोटो : BAGESHWAR
बागेश्वर। 90 वर्ष पहले राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने बागेश्वर की यात्रा की थी। तब पूरे देश में स्वतंत्रता की मांग को लेकर आंदोलन किए जा रहे थे। उन्हीं में से एक आंदोलन था कुली बेगार आंदोलन। कुली बेगार प्रथा को खत्म करने की शुरुआत बागेश्वर जिले से की गई थी।
वर्ष 1921 में उत्तरायणी मेले के अवसर पर बद्री दत्त पांडे के नेतृत्व में सैकड़ों लोगों ने आंदोलन में भाग लिया। आक्रोशित आंदोलनकारियों ने कुली बेगार प्रथा के रजिस्टरों को सरयू में बहाकर इस कुप्रथा का अंत किया। इसी से प्रभावित होकर महात्मा गांधी ने 1929 में बागेश्वर की यात्रा की। कुली बेगार आंदोलन में सफलता के बाद उन्होंने बद्री दत्त पांडे को कुमाऊं केसरी की उपाधि दी। आंदोलन से प्रभावित महात्मा गांधी ने इसे रक्तहीन क्रांति नाम दिया। कहा जाता है कि तब बापू को कौसानी से जिला मुख्यालय तक डोली में लाया गया था। वह कौसानी में रहे थे।
इस दौरान उन्होंने अनासक्ति योग टीका भी लिखी थी। तब उस भवन को लाल कोठी नाम से जाना जाता था। बाद में इसका नाम अनासक्ति आश्रम रखा गया। शिक्षक राजेंद्र सिंह बोरा बताते हैं कि अधिक अन्न उपजाने के लिए गांधी जी ने नुमाइशखेत मैदान में हल चलवाया था। इसी स्थान पर स्वराज भवन का निर्माण भी किया गया है, जिसमें गांधी जी आदमकद मूर्ति स्थापित की गई है। वर्ष 1947 में भारत की स्वतंत्रता के समय बागनाथ मंदिर के पास स्थित बाजार, उसके आसपास के क्षेत्र को बागेश्वर कहा जाता था। वर्ष 1948 में बाजार से सटे नौ गांवों को मिलाकर बागेश्वर ग्रामसभा का गठन किया गया। वर्ष 1968 में बागेश्वर की नगरपालिका का गठन किया गया। उस समय नगर की जनसंख्या मात्र तीन हजार थी।
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वर्ष 1921 में उत्तरायणी मेले के अवसर पर बद्री दत्त पांडे के नेतृत्व में सैकड़ों लोगों ने आंदोलन में भाग लिया। आक्रोशित आंदोलनकारियों ने कुली बेगार प्रथा के रजिस्टरों को सरयू में बहाकर इस कुप्रथा का अंत किया। इसी से प्रभावित होकर महात्मा गांधी ने 1929 में बागेश्वर की यात्रा की। कुली बेगार आंदोलन में सफलता के बाद उन्होंने बद्री दत्त पांडे को कुमाऊं केसरी की उपाधि दी। आंदोलन से प्रभावित महात्मा गांधी ने इसे रक्तहीन क्रांति नाम दिया। कहा जाता है कि तब बापू को कौसानी से जिला मुख्यालय तक डोली में लाया गया था। वह कौसानी में रहे थे।
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इस दौरान उन्होंने अनासक्ति योग टीका भी लिखी थी। तब उस भवन को लाल कोठी नाम से जाना जाता था। बाद में इसका नाम अनासक्ति आश्रम रखा गया। शिक्षक राजेंद्र सिंह बोरा बताते हैं कि अधिक अन्न उपजाने के लिए गांधी जी ने नुमाइशखेत मैदान में हल चलवाया था। इसी स्थान पर स्वराज भवन का निर्माण भी किया गया है, जिसमें गांधी जी आदमकद मूर्ति स्थापित की गई है। वर्ष 1947 में भारत की स्वतंत्रता के समय बागनाथ मंदिर के पास स्थित बाजार, उसके आसपास के क्षेत्र को बागेश्वर कहा जाता था। वर्ष 1948 में बाजार से सटे नौ गांवों को मिलाकर बागेश्वर ग्रामसभा का गठन किया गया। वर्ष 1968 में बागेश्वर की नगरपालिका का गठन किया गया। उस समय नगर की जनसंख्या मात्र तीन हजार थी।
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