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Bageshwar News: दास के बढ़ते प्रभाव ने दिग्गज राम प्रसाद को धकेल दिया था हाशिये पर

Fri, 28 Apr 2023 11:55 PM IST
हल्द्वानी ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, बागेश्वर
संवाद न्यूज एजेंसी, बागेश्वर Updated Fri, 28 Apr 2023 11:55 PM IST
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Das' growing influence had pushed veteran Ram Prasad to the margins
बागेश्वर। भाजपा के कद्दावर नेता चंदन राम दास आज हमारे बीच नहीं हैं। वह राजनीति में एकाएक चमके और बागेश्वर की राजनीति के सिरमौर बन गए। भाजपा में शामिल होने के बाद उन्होंने विधानसभा के चार चुनाव लड़े और चारों चुनाव जीतकर कीर्तिमान स्थापित किया। लगातार चार जीत ने इन्हें भाजपा के कद्दावर नेताओं में शुमार कर दिया था। बागेश्वर की जनता में उनकी स्वीकार्यता ही कही जाएगी कि दास के प्रभाव ने कांग्रेस के दिग्गज नेता पूर्व मंत्री राम प्रसाद टम्टा को हाशिये पर धकेल दिया था।
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चंदन राम दास वर्ष 2007 में भाजपा के कद्दावर नेता तत्कालीन कपकोट के विधायक, पूर्व मुख्यमंत्री भगत सिंह कोश्यारी की पहल पर भाजपा में शामिल हुए थे। तब बागेश्वर विधानसभा सीट पर कांग्रेस का कब्जा था। राम प्रसाद टम्टा बागेश्वर के विधायक थे। चंदन राम दास के पार्टी में शामिल होने के कुछ दिन बाद भाजपा ने 2007 के विधानसभा चुनाव के लिए प्रत्याशियों की सूची घोषित की तो बागेश्वर सीट से कुछ दिन पहले ही पार्टी में शामिल हुए चंदन राम दास को पार्टी ने उम्मीदवार घोषित कर दिया। दास पार्टी की उम्मीदों पर खरा उतरे और विधानसभा चुनाव जीत गए। दास ने कांग्रेस के दिग्गज नेता पूर्व मंत्री राम प्रसाद टम्टा को 5890 मतों के अंतर से हराया। चुनाव में दास को 17614 और टम्टा को 11724 मत मिले।
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वर्ष 2012 के चुनाव में एक बार फिर भाजपा ने चंदन राम दास पर भरोसा किया। दास ने विपरीत परिस्थितियों में 1911 मतों के अंतर से राम प्रसाद टम्टा को पराजित किया। वर्ष 2012 के चुनाव में लगातार दूसरी हार ने राम प्रसाद टम्टा के राजनीतिक भविष्य पर ब्रेक लगा दिया। कांग्रेस ने 2017 के चुनाव में टम्टा को टिकट नहीं दिया। कांग्रेस ने 2017 के चुनाव में नए प्रत्याशी बालकृष्ण को मैदान में उतारा राजनीति में माहिर हो चुके दास ने बालकृष्ण को 14567 मतों के अंतर से हराया। दास को 33792 जबकि प्रतिद्वंदी कांग्रेस के बालकृष्ण को 19225 मत मिले। वर्ष 2022 में दास के सामने कांग्रेस के नए प्रत्याशी रंजीत दास थे। दास 32211 मत लेकर विजयी हुए और उन्होंने कांग्रेस प्रत्याशी को 12141 मतों से हराया। चौथी बार विधानसभा पहुंचने का तोहफा दास को मिला। उन्हें राज्य कैबिनेट में जगह मिली। उनके निधन से न केवल बागेश्वर की राजनीति बल्कि बागेश्वर भाजपा में एक शून्यता आ गई है। इससे उबरने में पार्टी को समय लगेगा। संवाद
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इनसेट
सदमे से उबरने में दास परिवार को लगेगा समय
बागेश्वर। चंदन राम दास के निधन से रिक्त बागेश्वर विधानसभा सीट पर छह महीने के भीतर उप चुनाव हो जाएगा। भाजपा से स्व. चंदन राम दास के परिवार के किसी सदस्य के चुनाव लड़ने की प्रबल संभावना है। दास के परिवार को इस सदमे से उबरने में लंबा समय लगेगा। उप चुनाव में कई महीने का समय है। दास परिवार सदमे से उबरेगा। फिर से जनता के बीच होगा, ऐसी उम्मीद बागेश्वर की जनता को है। संवाद

इनसेट
गुटों में विभक्त कांग्रेस की राह आसान नहीं
बागेश्वर। अल्मोड़ा की बारामंडल सीट से अलग होकर वर्ष 1967 में बनी बागेश्वर विधानसभा सीट पर मुख्य मुकाबला हमेशा भाजपा, कांग्रेस में होता रहा है। हालांकि वर्ष 2007 के विधानसभा चुनाव के बाद के कांग्रेस भाजपा से पार नहीं पाई है। बात कांग्रेस के वर्तमान हालात की करें तो आंतरिक लड़ाई में उलझी कांग्रेस को उप चुनाव में प्रत्याशी चयन और पार्टी की एकजुटता के लिए कड़ी मशक्कत करनी होगी। अपनों के साथ ही भाजपा दास परिवार के प्रति उपजी सहानुभूति का भी सामना करना होगा। इसमें कोई दोराय नहीं है। संवाद
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