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पानी के संरक्षण के लिए ही देवालयों की तरह पूजे जाते थे नौले

Fri, 16 Mar 2018 11:36 PM IST
Updated Fri, 16 Mar 2018 11:36 PM IST
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पानी के संरक्षण के लिए ही देवालयों की तरह पूजे जाते थे नौले
बागेश्वर। उपेक्षा के कारण नौले-धारे आज भले ही समाप्त हो गए हो लेकिन एक समय में इन जीवनदायिनी नौलों को देवालयों की तरह पूजा जाता था। नौलों के आसपास किसी तरह की गंदगी तो दूर, चप्पल उतारकर पानी निकाला जाता था।
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विवाह, पूजा कार्य, जनेऊ सहित विभिन्न धार्मिक कार्यों के बाद नौल सैलाने की रस्म आज भी निभाई जाती है। बुजुर्गों का कहना है कि इसी सम्मान ने इन नौलों का अस्तित्व सैकड़ों सालों तक बचाए रखा। गांवों का शहरीकरण, पेयजल योजनाएं घर-घर पहुंचने के बाद नौले-धारों को उपेक्षित कर दिया गया।
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जल स्रोतों की पर्यावरण सुरक्षा का रखा जाता था ध्यान
बागेश्वर। पर्यावरण संरक्षण में जुटे किशन सिंह बताते हैं कि नौले धारों के आसपास पर्यावरण की सुरक्षा का विशेष ध्यान रखा जाता था। धारों के आसपास उतीस और बांज सहित अन्य चौड़ी पत्ती प्रजाति के पेड़ों को संरक्षण दिया जाता था। नमी कम न हो इसके लिए धारों के आसपास के किसी भी पेड़-पौधे यहां तक कि झाड़ियों को भी नुकसान नहीं पहुंचाया जाता था।
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वन्य क्षेत्रों में बरसाती जल के संरक्षण के लिए खालें बनाई जाती थीं। इन खालों में बरसात का पानी एकत्र होता था। इन्हें भैंसखाल कहा जाता था। यह भैंसखाल पालतू और जंगली जानवरों की प्यास तो बुझाते ही थे। इनसे जल संरक्षण भी होता था। आज भी पूरे पर्वतीय क्षेत्र के कई गांवों में भैंसखाल नाम से स्थान मौजूद हैं।

...इसलिए सुरक्षित रहते थे वन
बागेश्वर। जलौनी लकड़ी के लिए अधिक घने जंगलों के ऐसे पेड़ों को चुना जाता था जिनसे वर्ष भर की लकड़ी की जरूरत पूरी हो सके। सभी परिवारों के कृषि व पशुपालन से जुड़े होने के कारण चारा प्रजाति के पेड़ों को भी संरक्षित करते थे। बांज, रियांज, फल्यांट, भीमल, तिमूल ऐसे पेड़ होते हैं जिनसे पशुओं के लिए चारे के साथ ही जलाने के लिए लकड़ी भी मिल जाती थी।

खेतों और घरों के आसपास इस प्रजाति के पेड़ पाले जाते थे। इसके अलावा वनों में घेराबंदी के लिए काटकर डाली गई कांटेदार झाड़ियों घिंघारू, किलमोड़ा, हिसालू को भी घास काटने के बाद जलौनी लकड़ी के रूप में इस्तेमाल किया जाता था। जलौनी लकड़ी की आधी जरूरत इनसे पूरी हो जाने से जंगलों पर अधिक दबाव नहीं पड़ता था।

योजनाओं पर नहीं जल स्रोतों पर थी निर्भरता
बागेश्वर। पर्वतीय क्षेत्र में भले ही आज लोग नलों से पानी आने का इंतजार करते हों लेकिन पहले लोग पेयजल सहित अन्य सभी जरूरतों के लिए नौले धारों पर ही निर्भर रहते थे। सैकड़ों साल पहले लोग ऐसी जगहों पर बसे थे जहां पर्याप्त मात्रा में पेयजल उपलब्ध था।


1960 के बाद पहाड़ में सड़कों का निर्माण शुरू होने के बाद लोगों ने मूल गांवों से सड़कों के किनारे बसना शुरू किया। चार-पांच दशक पूर्व की नई बसासतों में ही जल संकट आज भी नजर आता है। क्योंकि यह परिवार पूरी तरह से योजनाओं के पानी पर निर्भर हैं।
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