{"_id":"5fd8f8f18ebc3e40fd31452d","slug":"18-families-of-samudar-get-rid-of-smoke-bageshwar-news-hld4073911183","type":"story","status":"publish","title_hn":"समडर के 18 परिवारों को धुएं से निजात","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
समडर के 18 परिवारों को धुएं से निजात
विज्ञापन
कपकोट के सुमडर गांव में एक घर में लगा धूम्ररहित चूल्हा। संवाद न्यूज एजेंसी
- फोटो : BAGESHWAR
बागेश्वर। बागेश्वर जिले के हिमालयी क्षेत्र में रहने वाले लोग तमाम अभावों में जी रहे हैं। यहां लोग आज भी लकड़ी पर भोजन बनाने को मजबूर हैं। अब हंस फाउंडेशन ने गांव के 18 परिवारों को धूम्र रहित चूल्हे प्रदान कर धुएं से निजात दिलाई है।
हिमनालयी क्षेत्र के खाती, तीख, बोरबलड़ा, सुमडर समेत तमाम गांवों के लोग आज भी लकड़ी में भोजन बनाने के लिए मजबूर हैं। इन गांवों में स्वास्थ्य, शिक्षा, सौरऊर्जा की सुविधा दे रहे हंस फाउंडेशन ने इनकी दिक्कतों को समझा और वर्ष 2019 के अंत में बोर बलड़ा ग्राम पंचायत के सुमडर के 18 परिवारों को धूम्र रहित चूल्हे देने की योजना बनाई। कुछ समय पहले यह चूल्हे ग्रामीणों को प्रदान किए गए हैं।
18 चूल्हे बनाने में आई 30 हजार की लागत
फाउंडेशन ने स्थानीय कारीगरों के माध्यम से 18 परिवारों के लिए धुआं रहित चूल्हे बनाए। मिट्टी के इन चूल्हों से लोहे के पाइप को जोड़ा गया है। पाइप के जरिए धुआं घर से बाहर निकल जाता है। हंस फाउंडेशन के कंसलटेंट एनबी कांडपाल ने बताया कि 18 चूल्हों को बनाने में 30 हजार रुपये की लागत आई। इसमें लकड़ी भी कम खर्च होती है। इस कार्य को अंजाम देने में हंस फाउंडेशन के पंचायत कार्यकर्ता हरीश दानू ने अहम योगदान दिया।
विज्ञापन
गैर सिलिंडर भरने के लिए नहीं आ पाते 12 किमी दूर
बागेश्वर। बोरबलड़ा के कुछ परिवारों को पिछले साल उज्ज्वला योजना के तहत गैस कनेक्शन दिए गए हैं, बावजूद इसके वह भी लकड़ी में ही भोजन बनाने को मजबूर हैं। ग्रामीणों का कहना है कि बदियाकोट सड़क तक आने के लिए 12 किमी पैदल चलना पड़ता है। इस कारण सिलिंडर नहीं भरवा पाते।
हिमालयी क्षेत्र के अन्य गांवों को भी फाउंडेशन धूम्र रहित चूहे प्रदान करने की मंशा रखता है लेकिन फंडिंग न होने से दिक्कत आ रही है। सरकार यदि सहयोग दे तो रसोई गैस रहित गांवों को धूम्र रहित चूल्हे प्रदान किए जाएंगे। - एनबी अवस्थी कंसलटेंट हंस फाउंडेशन
विज्ञापन
हिमनालयी क्षेत्र के खाती, तीख, बोरबलड़ा, सुमडर समेत तमाम गांवों के लोग आज भी लकड़ी में भोजन बनाने के लिए मजबूर हैं। इन गांवों में स्वास्थ्य, शिक्षा, सौरऊर्जा की सुविधा दे रहे हंस फाउंडेशन ने इनकी दिक्कतों को समझा और वर्ष 2019 के अंत में बोर बलड़ा ग्राम पंचायत के सुमडर के 18 परिवारों को धूम्र रहित चूल्हे देने की योजना बनाई। कुछ समय पहले यह चूल्हे ग्रामीणों को प्रदान किए गए हैं।
विज्ञापन
18 चूल्हे बनाने में आई 30 हजार की लागत
फाउंडेशन ने स्थानीय कारीगरों के माध्यम से 18 परिवारों के लिए धुआं रहित चूल्हे बनाए। मिट्टी के इन चूल्हों से लोहे के पाइप को जोड़ा गया है। पाइप के जरिए धुआं घर से बाहर निकल जाता है। हंस फाउंडेशन के कंसलटेंट एनबी कांडपाल ने बताया कि 18 चूल्हों को बनाने में 30 हजार रुपये की लागत आई। इसमें लकड़ी भी कम खर्च होती है। इस कार्य को अंजाम देने में हंस फाउंडेशन के पंचायत कार्यकर्ता हरीश दानू ने अहम योगदान दिया।
विज्ञापन
गैर सिलिंडर भरने के लिए नहीं आ पाते 12 किमी दूर
बागेश्वर। बोरबलड़ा के कुछ परिवारों को पिछले साल उज्ज्वला योजना के तहत गैस कनेक्शन दिए गए हैं, बावजूद इसके वह भी लकड़ी में ही भोजन बनाने को मजबूर हैं। ग्रामीणों का कहना है कि बदियाकोट सड़क तक आने के लिए 12 किमी पैदल चलना पड़ता है। इस कारण सिलिंडर नहीं भरवा पाते।
हिमालयी क्षेत्र के अन्य गांवों को भी फाउंडेशन धूम्र रहित चूहे प्रदान करने की मंशा रखता है लेकिन फंडिंग न होने से दिक्कत आ रही है। सरकार यदि सहयोग दे तो रसोई गैस रहित गांवों को धूम्र रहित चूल्हे प्रदान किए जाएंगे। - एनबी अवस्थी कंसलटेंट हंस फाउंडेशन