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बदरीनाथ धाम के कपाट शीतकाल के लिए बंद

Mon, 18 Nov 2013 08:38 PM IST
अमर उजाला, गोपेश्वर
अमर उजाला, गोपेश्वर Updated Mon, 18 Nov 2013 08:38 PM IST
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badrinath dham is close

बदरीनाथ के कपाट सोमवार को रीतिरिवाज और मंत्रोच्चारण के बीच देर शाम 7 बजकर 38 मिनट पर शीतकाल के लिए बंद हो गए। इस मौके पर धाम में करीब ढाई हजार श्रद्धालु मौजूद थे। मान्यता है कि शीतकाल में छह माह के लिए भगवान बदरीविशाल की पूजा अर्चना का जिम्मा महर्षि नारद संभालते हैं।

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सोमवार को बदरीनाथ मंदिर दिनभर श्रद्धालुओं के दर्शनार्थ खुला रहा। बदरीविशाल का श्रृंगार विभिन्न पुष्पों से किया गया। धाम में तड़के से शुरू हुई श्री बदरीविशाल की महाभिषेक पूजा देर शाम तक चली। इस दौरान देश-विदेश से पहुंचे सैकड़ों श्रद्धालुओं ने बदरीनाथ धाम में मत्था टेका। धाम के कपाट बंद होने के दौरान सिंहद्वार के दोनों ओर बदरीनाथ के धर्माधिकारी और वेदपाठियों ने स्वास्ति वाचन और विष्णु सहस्रनाम का वाचन किया।
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इससे पहले परंपरा के अनुसार बदरीनाथ के मुख्य पुजारी रावल केशवन नंबूरी ने स्त्री वेश धारण कर माता लक्ष्मी को बदरीनाथ गर्भगृह में रखा। माणा गांव की कन्याओं द्वारा बनाए गए कंबल पर घी का लेपन कर बदरीविशाल को ओढ़ाया गया। बदरीनाथ के गर्भगृह से भगवान कुबेर, गरुड़ जी और उद्धव जी की उत्सव मूर्ति को गर्भगृह से उत्सव डोली में रखा गया। इस दौरान धाम में उमड़े श्रद्धालुओं के बदरीविशाल के जयकारों से बदरीशपुरी गुंजायमान हो उठी। इस अवसर पर बीकेटीसी के सीईओ बीडी सिंह, धर्माधिकारी भुवन उनियाल आदि मौजूद थे।
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आज रवाना होगी उत्सव डोली
शीतकाल में श्रद्धालु बदरीनाथ नहीं जा सकते। धार्मिक मान्यता के अनुसार ऐसे में श्रद्धालु बदरीविशाल की पूजा-अर्चना नृसिंह मंदिर जोशीमठ में कर सकते हैं। जहां आदि गुरु शंकराचार्य की गद्दी विराजमान रहती है। बदरीनाथ की यात्रा शुरू होते ही जोशीमठ नृसिंह मंदिर से आदिगुरु शंकराचार्य की गद्दी को बदरीनाथ धाम ले जाया जाता है।


कपाट बंद होने पर गद्दी को जोशीमठ नृसिंह मंदिर में स्थापित किया जाता है। धाम में छह माह तक पूजा अर्चना के बाद भगवान बदरीविशाल की शालिगग्राम की मूर्ति को घृत कंबल में लपेटा जाता है। भगवान कुबेर, गरुड़ और उद्धव जी की उत्सव मूर्ति को पांडुकेश्वर लाया जाता है। मंगलवार को सुबह उत्सव डोली पांडुकेश्वर के लिए रवाना होगी।

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