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गगास में पानी के लिए जंगल से भी जुड़ना होगा गांव को
अमर उजाला ब्यूराे अल्माेड़ा
Updated Mon, 15 May 2017 11:12 PM IST
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भतौरा गांव।
- फोटो : अमर उजाला
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बिंता क्षेत्र में गगास नदी के किनारे की तीन वन पंचायतों की ग्राम सभा भतौरा में नदी के पानी के कम होने की चिंता लोगों के चेहरों पर साफ पढ़ी जा सकती है। नदी सूख रही है और इसी हिसाब से इनके जीवन में चिंता भी बढ़ती जा रही है। खेत खलिहान से लेकर पशु संसाधन तक कम होते जा रहे हैं। अब गांव के लोग गगास को बचाने के लिए खुद भी खड़े होने की तैयारी में हैं।
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भतौरा के आसपास का भटकोट का आरक्षित वन क्षेत्र भी बदल गया है। इस क्षेत्र में लोगों की पहुंच अब नहीं रह गई है। गांव की महिलाएं कुंती देवी, नरी देवी आदि की मानें तो आरक्षित वन क्षेत्र में अब किलमोड़ा, हिंसालु, घिंघोरा की झाड़ियां न के बराबर रह गई हैं। इसी गांव के ललित मोहन कैड़ा के मुताबिक जंगल में दो दो फुट ऊंची घास भी है। पहले गांव की महिलाएं घास लेने के लिए जंगल जाती थी, गांव के पशु भी जंगल में रहते थे, तो लोगों ने चाल-खाल (खाव) भी बनाए थे। अब यह जुड़ाव खत्म हो चुका है। जंगल में घास और चीड़ के पेड़ तेजी से पैर पसार रहे हैं। ऐसे में जंगल हर साल आग की भेंट चढ़ जा रहे हैं। जंगल की इस आग ने पिछले कुछ सालों में हिंसालु की इन छोटी झाड़ियों को पूरी तरह से खत्म कर दिया है। इस सूखे और फलदार वृक्षों से विहीन जंगल में जानवरों के रहने के लिए भी कोई जगह नहीं बची है। ऐसे में ये जानवर भी गांव की ओर ही रुख कर रहे हैं। गांव की खेती बाड़ी पर सीधा दबाव है।
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गांव के लोगों के मुताबिक गगास को और गांव को बचाना है, तो इन आरक्षित वन क्षेत्रों में भी काम करना होगा। लोगों से आरक्षित वन क्षेत्रों का जुड़ाव हो सके इसके लिए भी कोशिश होनी चाहिए। गांव के ही सुंदर सिंह बोरा के मुताबिक आरक्षित वन क्षेत्र में चौड़ी पत्ती के पौधे लगाए जाने, चाल-खाल बनाने की जरूरत है। अगर रास्ता मिले तो गांव के लोग इसके लिए भी तैयार हैं।
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पहले खैराड़ी तक बांज और उतीस के पेड़ थे, ये पेड़ भी अब खत्म हो गए हैं। वन दरोगा देवेंद्र कैड़ा के मुताबिक आरक्षित वन क्षेत्रों में भी गांव वाले वनीकरण का काम कर सकते हैं, इसके लिए ग्राम पंचायत की ओर से प्रस्ताव की जरूरत होगी। भतौरा में हुई इस बैठक में महिलाओं ने यह तय किया कि जल्द ही एक प्रस्ताव बनाकर वन विभाग को सौंपा जाएगा।
ऐसे टूटी किलमोड़ा के जंगल की सांस
भतौरा। गांव की महिलाओं के मुताबिक भतौरा के आस पास पहले किलमोड़ा की घनी झाड़ियां हुआ करती थी, किलमोड़े के मोटे दानों के लिए यह गांव मशहूर था। आज से करीब 20 साल पहले बाहर से आई एक कंपनी ने लोगों से किलमोड़ा की जड़ खरीदने की पेशकश की थी। गांव वालों ने उस कंपनी की बात मानी और धीरे-धीरे करके किलमोड़ा का यह पूरा क्षेत्र ही किलमोड़ा से विहीन हो गया। आज गांव वालों को किलमोड़ा के न रहने का अफसोस है, लेकिन अब वह जंगल दुबारा वापस नहीं आ पा रहा है। अब लोगों का कहना है कि दुबारा पौध मिलने पर वह फिर से किलमोड़ा को इस क्षेत्र में जगह-जगह लगाने के लिए तैयार हैं।