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कुमाऊंनी लेखन की मानक भाषा अल्मोड़ा की खसपर्जिया

Sun, 13 Nov 2016 11:18 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला ब्यूरो, अल्मोड़ा।
ब्यूरो/अमर उजाला ब्यूरो, अल्मोड़ा। Updated Sun, 13 Nov 2016 11:18 PM IST
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कुमाऊंनी के वरिष्ठ साहित्यकार डा. तारा चंद्र त्रिपाठी। - फोटो : अमर उजाला

अल्मोड़ा। कुमाऊंनी भाषा के मानकीकरण को लेकर कई बार सवाल उठते रहे हैं, लेकिन कुमाऊंनी के अधिकतर लेखक और साहित्यकार इसे बहुत बड़ा मुद्दा नहीं मानते। लेखकों और साहित्यकारों का तर्क है कि कुमाऊं के अलग अलग जगहों पर रहने वाले लोग अपने क्षेत्र की बोली ही बोलेंगे लेकिन लिखने की परंपरा अल्मोड़ा के आसपास रहने वाली खास प्रजा की भाषा (खसपर्जिया) ही है और इस भाषा को ही कुमाऊंनी लेखन के रूप में स्वीकार किया जाना चाहिए।

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    विद्वानों का मत है कि कुमाऊं के विभिन्न स्थानों में एक ही वस्तु का नाम अलग बोला जाता रहा है। जैसे भुट्टे को अलग-अलग जगहों पर जुनौल, काकुनी, घ्वाग भी बोला जाता है। इनको उसी रूप में पर्यायवाची माना जाना चाहिए जैसे चंद्रमा के लिए राकेश, शशि, मयंक आदि को पर्यायवाची माना जाता है।
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वरिष्ठ कुमाऊंनी साहित्यकार, गढ़वाली-कुमाऊंनी भाषाशास्त्र के विद्वान डॉ. तारा चंद्र त्रिपाठी का मानना है कि जहां राजधानी होती है, विद्वान होते हैं, विधान होते हैं और आदेश जारी होते हैं। वहां की बोली ही लेखन के लिए मानक भाषा मानी जाती है क्योंकि अल्मोड़ा 1561 से कुमाऊं की राजधानी रही है और यहां के दानपात्र, दस्तावेज अल्मोड़ा के आसपास की भाषा (खसपर्जिया) में ही हैं। इसलिए खसपर्जिया को कुमाऊंनी लेखन के रूप में स्वीकार किया जाना चाहिए। 
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अल्मोड़ा। कुमाऊंनी में करीब तीन सौ से ज्यादा शब्द द्रविड़ भाषा के हैं। एक हजार अंग्रेजी, चार सौ से पांच सौ के करीब शब्द फारसी के हैं, जबकि हमारे ज्योतिषशास्त्र में लग्न, पणफर आदि शब्द ग्रीक भाषाओं के हैं। तारा चंद्र त्रिपाठी का मानना है कि जनसंपर्क के कारण प्रत्येक क्षेत्र की भाषा में अन्य क्षेत्रीय या बाहरी समूहों के भाषाओं के शब्द स्वत: आ जाते हैं। उनका मानना है कि ऐसे शब्द आते रहेंगे और इनसे भाषा समृद्ध ही होगी। 

अल्मोड़ा। प्रसिद्ध साहित्यकार डॉ. तारा चंद्र त्रिपाठी का मानना है कि आज के दौर में बच्चों को बहुभाषी होना चाहिए। वह कहते हैं कि यदि कुमाऊंनी, गढ़वाली को अगली पीढ़ी नहीं सीखेगी तो इसको आठवीं अनुसूची में दर्ज करने की मांग की सार्थकता नहीं रह जाएगी।


25 साल तक कुमाऊं, गढ़वाल के स्थान नामों, भाषाशास्त्र का अध्ययन करने वाले 78 वर्षीय डॉ. त्रिपाठी बताते हैं कि उनका पुत्र इंग्लैंड में बड़ी कंपनी में डायरेक्टर है और आज भी वह उनसे कुमाऊंनी में ही बात करता है। उन्होंने बच्चों को सबसे पहले कुमाऊंनी भाषा अभियान से जोड़ने की वकालत की है। 

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