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526 करोड़ के प्रोजेक्ट को मंजूरी दे सरकार ने निदेशालय शिफ्ट होने के कयासों पर लगाया विराम
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रानीखेत का प्रख्यात चौबटिया उद्यान। संवाद
- फोटो : RANIKHET
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रानीखेत (अल्मोड़ा)। सरकार ने बजट सत्र में उत्तराखंड इंटिग्रेटेड हार्टीकल्चर डेवलपमेंट प्रोजेक्ट को मंजूरी देकर चौबटिया स्थित उद्यान निदेशालय के देहरादून शिफ्ट होने के कयासों पर फिलहाल विराम लगा दिया है। इस प्रोजेक्ट के तहत 526 करोड़ रुपये बजट स्वीकृत किया गया है। इससे उम्मीद है कि अब बदहाली का दंश झेल रहे (सेब उद्यान) का गौरवशाली अतीत फिर से लौटेगा।
235 हेक्टेयर में फैले चौबटिया सेब बागान का गौरवशाली अतीत रहा है। 1869 में यहां छावनी की बसासत हुई लेकिन इससे पहले ही अंग्रेज हुक्मरानों ने यहां चाय बागान की शुरूआत कर दी थी। यहां सेब उत्पादन भी होता था। 1952 में यहां उद्यान निदेशालय की स्थापना हुई। तब यहां निदेशक सहित तमाम अधिकारियों की बड़ी चौड़ी फौज तैनात की गई। वैज्ञानिक गांव-गांव जाकर काश्तकारों को औद्यानिकी के बारे में जागरूक करते थे जिसका लाभ काश्तकारों को मिलता था। उत्तर प्रदेश के समय में इस निदेशालय की पहचान देश ही नहीं विदेशों में थी। यहीं शोध होते थे। इस उद्यान के स्वदेशी सेब की महक अन्य राज्यों में भी महकती थी। राज्य बनने के बाद उद्यान निदेशालय के विकास की उम्मीद थी लेकिन यह निदेशालय रसातल में जाता रहा। 2010 के बाद से यहां स्थायी निदेशक नियमित रूप से नहीं बैठते। इसके लिए कई बार आंदोलन हो चुके हैं। बीच-बीच में निदेशालय के देहरादून शिफ्ट होने की सुगबुगाहट भी होती रहती है।
इस प्रोजेक्ट के तहत औद्यानिकी क्षेत्र में सभी कार्य होंगे। सेब बागान का कायाकल्प होगा। सब्जी उत्पादन, मशरूम, फल, फूल का उत्पादन के अलावा अन्य बड़े कार्य किए जाएंगे। सेब के रूट स्टॉक तैयार करने पर अधिक फोकस किया जाएगा, ताकि अन्य राज्यों को भी इन्हें भेजा जा सके। यह परियोजना औद्यानिकी क्षेत्र के विकास के लिए मील का पत्थर साबित होगी।
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-डॉ. हरमिंदर सिंह बावेजा, उद्यान निदेशक, चौबटिया।
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235 हेक्टेयर में फैले चौबटिया सेब बागान का गौरवशाली अतीत रहा है। 1869 में यहां छावनी की बसासत हुई लेकिन इससे पहले ही अंग्रेज हुक्मरानों ने यहां चाय बागान की शुरूआत कर दी थी। यहां सेब उत्पादन भी होता था। 1952 में यहां उद्यान निदेशालय की स्थापना हुई। तब यहां निदेशक सहित तमाम अधिकारियों की बड़ी चौड़ी फौज तैनात की गई। वैज्ञानिक गांव-गांव जाकर काश्तकारों को औद्यानिकी के बारे में जागरूक करते थे जिसका लाभ काश्तकारों को मिलता था। उत्तर प्रदेश के समय में इस निदेशालय की पहचान देश ही नहीं विदेशों में थी। यहीं शोध होते थे। इस उद्यान के स्वदेशी सेब की महक अन्य राज्यों में भी महकती थी। राज्य बनने के बाद उद्यान निदेशालय के विकास की उम्मीद थी लेकिन यह निदेशालय रसातल में जाता रहा। 2010 के बाद से यहां स्थायी निदेशक नियमित रूप से नहीं बैठते। इसके लिए कई बार आंदोलन हो चुके हैं। बीच-बीच में निदेशालय के देहरादून शिफ्ट होने की सुगबुगाहट भी होती रहती है।
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इस प्रोजेक्ट के तहत औद्यानिकी क्षेत्र में सभी कार्य होंगे। सेब बागान का कायाकल्प होगा। सब्जी उत्पादन, मशरूम, फल, फूल का उत्पादन के अलावा अन्य बड़े कार्य किए जाएंगे। सेब के रूट स्टॉक तैयार करने पर अधिक फोकस किया जाएगा, ताकि अन्य राज्यों को भी इन्हें भेजा जा सके। यह परियोजना औद्यानिकी क्षेत्र के विकास के लिए मील का पत्थर साबित होगी।
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-डॉ. हरमिंदर सिंह बावेजा, उद्यान निदेशक, चौबटिया।