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Almora News: कचरा डंपिंग साइटों के जैविक उपचार की नई राह

Haldwani Bureau हल्द्वानी ब्यूरो
Updated Sat, 27 Jun 2026 10:59 PM IST
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New avenues for biological remediation of waste dumping sites
अल्मोड़ा। पर्वतीय क्षेत्रों में तेजी से बढ़ते नगरीकरण और पर्यटन के कारण कचरा प्रबंधन एक गंभीर चुनौती बनता जा रहा है। स्थानीय निकाय कचरे का संग्रह तो कर रहे हैं लेकिन डंपिंग साइटों पर जमा कचरे के पहाड़ों का स्थायी समाधान बड़ी समस्या है। इसी से निपटने के लिए वैज्ञानिक अब जैविक उपचार (बायो-रिमेडिएशन) और पौध आधारित उपचार (फाइटो-रिमेडिएशन) की नई तकनीकों पर अनुसंधान कर रहे हैं।
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राष्ट्रीय हिमालयी अध्ययन मिशन के तहत गोविंद बल्लभ पंत राष्ट्रीय हिमालयी पर्यावरण संस्थान, कोसी-अल्मोड़ा में वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. सुमित राय के नेतृत्व में दो वर्षों से एक महत्वपूर्ण अनुसंधान परियोजना संचालित की जा रही है। इसका उद्देश्य प्रदूषित मृदा (मिट्टी) और जल को विशेष पौध प्रजातियों एवं सूक्ष्मजीवों की सहायता से प्रदूषण मुक्त करने की प्रभावी तकनीक विकसित करना है।
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अनुसंधान के दौरान अल्मोड़ा और चंपावत जिले की कचरा डंपिंग साइटों से कुल 26 मृदा नमूने एकत्र किए गए जिनमें अल्मोड़ा से आठ, चंपावत से 18 नमूने शामिल थे। इन सभी नमूनों के भौतिक, रासायनिक और जैविक विश्लेषण में मिट्टी के भीतर समृद्ध सूक्ष्मजीवी विविधता पाई गई।
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वैज्ञानिकों ने 18 प्रकार के जीवाणुओं (बैक्टीरिया) और छह प्रकार के कवकों (फंगस) की पहचान की है। इन सूक्ष्मजीवों की एमाइलेज, प्रोटीज, सेल्यूलोज अपघटन और अमोनिया निर्माण जैसी क्षमताओं का गहन परीक्षण किया गया, ताकि जैविक कचरे के विघटन और मृदा के जैव उपचार में उनकी प्रभावशीलता को आंका जा सके।
प्रदूषण सोखने वाली 13 पौध प्रजातियों की पहचान; ''''बांज'''' सबसे प्रभावी
अनुसंधानकर्ताओं ने ऐसी 13 पौध प्रजातियों की पहचान की है जिनमें पर्यावरण में मौजूद हानिकारक तत्वों और भारी धातुओं को अवशोषित कर उनके प्रभाव को कम करने की अद्भुत क्षमता है। इनमें देवदार, बांज, बांस, हाइड्रेंजिया, सिल्वर ओक, कनेर, भीमल और तेजपत्ता जैसी प्रजातियां प्रमुख हैं।
पौधों पर किए गए इस अध्ययन में बांज प्रजाति भारी धातुओं के अवशोषित करने में सबसे प्रभावी पाई गई। वहीं, देवदार में जिंक, उतीस में कैडमियम तथा हाइड्रेंजिया में निकिल को सोखने की उल्लेखनीय क्षमता देखी गई है।

अल्मोड़ा की मिट्टी अधिक उर्वर, चंपावत में लवणता ज्यादा
अध्ययन के अनुसार अल्मोड़ा की कचरा डंपिंग साइटों की मृदा का पीएच (pH) मान 6.0 से 8.3 के बीच पाया गया जबकि चंपावत में यह 6.2 से 8.2 के बीच रहा। अल्मोड़ा की मिट्टी अपेक्षाकृत अधिक क्षारीय और कार्बनिक पदार्थों से समृद्ध मिली जिससे उसकी उर्वरता अधिक पाई गई। दूसरी ओर, चंपावत की मिट्टी में लवणों (साल्ट) की मात्रा अधिक दर्ज की गई।

भारी धातुओं की मौजूदगी चिंता का विषय
दोनों जिलों की डंपिंग साइटों पर शीशा (लेड), तांबा (कॉपर), निकिल और जस्ता (जिंक) सहित कई भारी धातुओं (हैवी मेटल्स) की अत्यधिक मात्रा पाई गई है। चंपावत की मिट्टी में इन घातक धातुओं की उपस्थिति विशेष रूप से अधिक दर्ज की गई। वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि इन जहरीली धातुओं को मानव खाद्य शृंखला (फूड चेन) में प्रवेश करने से रोकना अत्यंत आवश्यक है, अन्यथा यह गंभीर बीमारियों का कारण बन सकती हैं।

कोट
- सूक्ष्मजीवों की पहचान, पौध प्रजातियों के चयन तथा मृदा के विस्तृत विश्लेषण के बाद प्रयोगशाला स्तर पर अनुसंधान पूरा कर लिया गया है। इसके आधार पर जल्द ही एक जैविक कचरा प्रबंधन मॉडल विकसित किया जा रहा है। इससे कचरा डंपिंग साइटों के प्रभावी जैव उपचार के लिए उपयुक्त पौधों का चयन आसान होगा और हिमालयी क्षेत्रों में कचरा प्रबंधन की समस्या का स्थायी समाधान मिल सकेगा। - डॉ. सुमित राय, वैज्ञानिक, जीबी पंत राष्ट्रीय हिमालयी पर्यावरण संस्थान, कोसी-अल्मोड़ा

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