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Almora News: अस्तित्व बचाने के लिए जूझ रही आदिमानवों की ऐतिहासिक लखुडियार गुफा
Mon, 26 Jun 2023 11:42 PM IST
हल्द्वानी ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, अल्मोड़ा
संवाद न्यूज एजेंसी, अल्मोड़ा
Updated Mon, 26 Jun 2023 11:42 PM IST
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अराजक तत्वों ने इस तरह शैल चित्रों को पहुंचाया है नुकसान। संवाद
अल्मोड़ा। मानव के अतीत का जीता-जागता प्रमाण आदिमानवों की ऐतिहासिक लखुडियार गुफा अपना अस्तित्व बचाने के लिए जूझ रही है। आदिमानवों ने इस गुफा में गेरुआ, काले और सफेद रंग से शैल चित्र उकेरे हैं जो प्रागैतिहासिक काल की कहानी बयां कर रहे हैं लेकिन देखरेख के अभाव में ऐतिहासिक लखुडियार गुफा और इसमें मौजूद शैल चित्र अपना अस्तित्व बचाने की जद्दोजहद कर रहे हैं।
अल्मोड़ा-पिथौरागढ़ हाईवे पर पेटशाल के पास स्थित लखुडियार गुफा आदिमानव काल का इतिहास समेटे है जिसकी खोज वर्ष 1963 में हुई। इतिहासकारों के मुताबिक प्रागैतिहासिक काल में खानाबदोश की जिंदगी जीते आदिमानव इस गुफा में रहे जिसके आज भी यहां प्रमाण मौजूद हैं। आदिमानवों के गुफा की चट्टानों पर उकेरे गेरुए, काले और सफेद रंग के शैल चित्र ऐतिहासिक और पर्यटन की दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं।
यहां मानव, पशु, छिपकली, सर्प, नदी, इंद्रधनुष के शैल चित्र साफ देखे जा सकते हैं लेकिन देखरेख के अभाव में यह गुफा और शैल चित्रों के अस्तित्व को नुकसान पहुंच रहा है। अराजक तत्वों ने गुफा में उकेरे शैल चित्रों में हाथ पहुंचने तक की ऊंचाई तक पत्थरों से लकीरें खींचकर नाम लिख डाले हैं। इसके बावजूद इस ऐतिहासिक धरोहर के संरक्षण के प्रयास नाकाफी साबित हो रहे हैं।
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तीन साल पहले परिचारक हुआ सेवानिवृत्त तो नहीं हुई नए की नियुक्ति
अल्मोड़ा। ऐतिहासिक गुफा को सहेजने के प्रयास का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि यहां तीन साल से परिचारक की नियुक्ति नहीं हो सकी है। इसकी देखरेख का जिम्मा संभालने वाले पुरातत्व विभाग के क्षेत्रीय पुरातत्व अधिकारी डॉ. चंद्र सिंह चौहान ने बताया कि इस गुफा की सुरक्षा के लिए यहां तैनात स्मारक परिचर तीन साल पूर्व सेवानिवृत्त हो गए। तब से इस धरोहर की देखरेख करने वाला कोई नहीं है।
गुफा के संरक्षण के लिए जिला योजना से 15 लाख रुपये हुए हैं स्वीकृत
अल्मोड़ा। आदिमानवों का इतिहास बताने वाली इस गुफा के संरक्षण के लिए जिला योजना से पंद्रह लाख रुपये स्वीकृत हुए हैं। क्षेत्रीय पुरातत्व अधिकारी डॉ. चौहान ने बताया कि इसकी डीपीआर शासन में भेजी जा रही है। स्वीकृति के बाद यहां सुरक्षा दीवार और गेट के निर्माण की योजना है। इसके संरक्षण के गंभीरता से प्रयास हो रहे हैं।
लखुडियार गुफा ऐतिहासिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है। यहां मौजूद शैल चित्रों को नुकसान पहुंचाना गंभीर चिंता का विषय है। इसके लिए एएसआई, प्रशासन और सरकार को गंभीर होने की जरूरत है। - प्रो. बीडीएस नेगी, इतिहासकार, अल्मोड़ा।
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अल्मोड़ा-पिथौरागढ़ हाईवे पर पेटशाल के पास स्थित लखुडियार गुफा आदिमानव काल का इतिहास समेटे है जिसकी खोज वर्ष 1963 में हुई। इतिहासकारों के मुताबिक प्रागैतिहासिक काल में खानाबदोश की जिंदगी जीते आदिमानव इस गुफा में रहे जिसके आज भी यहां प्रमाण मौजूद हैं। आदिमानवों के गुफा की चट्टानों पर उकेरे गेरुए, काले और सफेद रंग के शैल चित्र ऐतिहासिक और पर्यटन की दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं।
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यहां मानव, पशु, छिपकली, सर्प, नदी, इंद्रधनुष के शैल चित्र साफ देखे जा सकते हैं लेकिन देखरेख के अभाव में यह गुफा और शैल चित्रों के अस्तित्व को नुकसान पहुंच रहा है। अराजक तत्वों ने गुफा में उकेरे शैल चित्रों में हाथ पहुंचने तक की ऊंचाई तक पत्थरों से लकीरें खींचकर नाम लिख डाले हैं। इसके बावजूद इस ऐतिहासिक धरोहर के संरक्षण के प्रयास नाकाफी साबित हो रहे हैं।
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तीन साल पहले परिचारक हुआ सेवानिवृत्त तो नहीं हुई नए की नियुक्ति
अल्मोड़ा। ऐतिहासिक गुफा को सहेजने के प्रयास का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि यहां तीन साल से परिचारक की नियुक्ति नहीं हो सकी है। इसकी देखरेख का जिम्मा संभालने वाले पुरातत्व विभाग के क्षेत्रीय पुरातत्व अधिकारी डॉ. चंद्र सिंह चौहान ने बताया कि इस गुफा की सुरक्षा के लिए यहां तैनात स्मारक परिचर तीन साल पूर्व सेवानिवृत्त हो गए। तब से इस धरोहर की देखरेख करने वाला कोई नहीं है।
गुफा के संरक्षण के लिए जिला योजना से 15 लाख रुपये हुए हैं स्वीकृत
अल्मोड़ा। आदिमानवों का इतिहास बताने वाली इस गुफा के संरक्षण के लिए जिला योजना से पंद्रह लाख रुपये स्वीकृत हुए हैं। क्षेत्रीय पुरातत्व अधिकारी डॉ. चौहान ने बताया कि इसकी डीपीआर शासन में भेजी जा रही है। स्वीकृति के बाद यहां सुरक्षा दीवार और गेट के निर्माण की योजना है। इसके संरक्षण के गंभीरता से प्रयास हो रहे हैं।
लखुडियार गुफा ऐतिहासिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है। यहां मौजूद शैल चित्रों को नुकसान पहुंचाना गंभीर चिंता का विषय है। इसके लिए एएसआई, प्रशासन और सरकार को गंभीर होने की जरूरत है। - प्रो. बीडीएस नेगी, इतिहासकार, अल्मोड़ा।