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गगास घाटी के प्याज के पौधे पहुंचे पर खरीदार नहीं
ब्यूरो /अमर उजाला, रानीखेत (अल्मोड़ा)।
Updated Thu, 19 Nov 2015 12:12 AM IST
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गगास घाटी की मशहूर प्याज की पौध बाजार में आ गई है, लेकिन कम बारिश का असर इस बार पौध की खपत में भी साफ दिखाई दे रही है।
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प्याज की बुआई पूरी तरह से बारिश पर निर्भर रहती है, इस बार बारिश कम होने के कारण नदी, गधेरे सूख चुके हैं, इसी कारण बाजार में काफी कम संख्या में लोग पौध खरीद रहे हैं। जिस कारण काश्तकारों के चहरे पर मायूसी है। गगास घाटी के प्याज की डिमांड पूरे कुमाऊं भर में है।
शहर से 19 किमी की दूरी पर स्थित गगास घाटी के मकड़ौं, मंगचौड़ा सहित कई इलाकों में व्यापक मात्रा में प्याज की पौध उगाई जाती है।
अगस्त और सितंबर में काश्तकार एक से लेकर पांच नाली तक की भूमि में बीज बोते हैं। निराई, गुड़ाई और खरपतवार निकालने के बाद नवंबर की 10 तारीख तक पौध तैयार हो जाती है।
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ग्रामीण प्याज की पौध सोमेश्वर, गरुड़, बागेश्वर, हवालबाग, अल्मोड़ा, रानीखेत, रुद्रप्रयाग, कर्णप्रयाग, चौखुटिया, मुनस्यारी, चंपावत, डीडीहाट, धारचूला आदि क्षेत्रों में बेचते हैं।
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मकड़ों के काश्तकार राजेंद्र बिष्ट, मंगचौड़ा के खुशाल सिंह ने बताया कि बीज का उत्पादन तो ठीक हुआ है, लेकिन बारिश नहीं होने के कारण अभी तक लोग पौध खरीदने नहीं पहुंच रहे हैं।
बरसात में भी काफी कम मात्रा में बारिश हुई, जिस कारण गाड़-गधेरे सूख चुके हैं। गत वर्षों तक काश्तकार सीजन में तीन से चार लाख रुपये तक की प्याज की पौध बेच देते थे, इस बार खपत कम हो जाने के कारण किसानों के चेहरे मायूस हैं।
गगास घाटी के काश्तकार स्वयं प्याज का बीज तैयार करते हैं। इस प्याज की खासियत यह है कि रोपाई के बाद पौध के ऊपर से फूल नहीं आता। गांठ भी बड़ी निकलती है। फूल वाली पौध ठीक नहीं मानी जाती। काश्तकार राजेंद्र बिष्ट ने बताया कि उद्यान विभाग की तरफ से पर्याप्त मदद किसानों को नहीं मिल पाती।