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क्रांतिकारी धौनी ने सरकारी नौकरी ठुकरा कर देश पर कुर्बान कर दिया जीवन
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स्वतंत्रता संग्राम सेनानी राम सिंह धौनी। (फाइल फोटो)
- फोटो : ALMORA
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अल्मोड़ा। महान स्वतंत्रता संग्राम सेनानी राम सिंह धौनी ने भारत माता को गुलामी की जंजीरों से मुक्त कराने के लिए पूरा जीवन कुर्बान कर दिया। उन्होंने सालम में घूम-घूम कर लोगों में आजादी की अलख जगाई। लेकिन आज आजादी के 73 साल बाद स्वतंत्रता संग्राम सेनानी राम सिंह धौनी के पैतृक गांव तल्ला बिनौला में क्रांतिकारी धौनी की प्रतिमा तक नहीं लग सकी है जबकि स्व. धौनी ने सरकारी नौकरी ठुकरा कर पूरा जीवन भारत माता की सेवा में समर्पित किया था।
क्रांतिकारी धौनी का जन्म 24 फरवरी 1893 में जिले के तल्ला बिनौला गांव में कुंती देवी और हिम्मत सिंह धौनी के घर में हुआ था। बचपन से कुशाग्र बुद्धि के राम सिंह ने बीए तक की पढ़ाई प्रथम श्रेणी में पास की। तब धौनी सालम क्षेत्र से स्नातक उपाधि पाने वाले पहले व्यक्ति थे। खादी की धोती, कुर्ता, गांधी टोपी उनका पहनावा था। 1919 में धौनी बीए अंतिम वर्ष की परीक्षा की तैयारियों में जुटे थे। इसी दौरान उनकी माता का निधन हो गया। उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बाद उनके परिजन चाहते थे कि वह कोई सरकारी नौकरी कर लें, लेकिन उन्होंने कुमाऊं कमिश्नर के तहसीलदार तक की सरकारी नौकरी के प्रस्ताव को ठुकरा दिया और पूरा जीवन देश सेवा में लगा दिया। राजस्थान प्रवास के दौरान उन्होंने बीकानेर के सूरतगढ़ मिडिल स्कूल में हेड मास्टर की नौकरी की। 1921 में इस नौकरी से त्यागपत्र देकर राम चंद्र नेवटिया हाईस्कूल फतेहपुर (जयपुर) में सहायक शिक्षक बन गए। धौनी अल्मोड़ा डिस्ट्रिक्ट बोर्ड के सदस्य और 1926 में चेयरमैन भी रहे। 1928 में वह सालम आ गए और चौखुरी में मिडिल स्कूल स्थापित कर लोगों में आजादी की अलख जगाई। मुंबई प्रवास के दौरान 1929 में वह चेचक रोगियों की सेवा में जुट गए। इस दौरान वह भी बीमारी की चपेट में आ गए। स्वास्थ्य खराब होने पर उन्होंने 12 नवंबर 1930 को दुनिया को अलविदा कह दिया।
अंग्रेजों को बंदर कहकर देश छोड़ने का दिया संदेश
अल्मोड़ा। राम सिंह धौनी क्रांतिकारी होने के साथ ही एक प्रखर पत्रकार, संपादक और साहित्यकार भी थे। उनकी कविताओं में देशप्रेम की झलक स्पष्ट झलकती है। उन्होंने साहित्य के जरिए लोगों में देशप्रेम की अलख जगाई। स्व. धौनी की ओर से रचित ‘भारत मैं तुझको श्रद्धा से प्रणाम करता हूं, अपने हृदय के भावों को चरणों में धरता हूं...’ कविता उनके देशप्रेम को उजागर करती है। उन्होंने ‘बहुत उजाड़ा नंदन वन को खूब दिखाया बंदरपन को..’ शीर्षक से लिखी कविता में अंग्रेजों को बंदर कहकर भारत देश छोड़कर चले जाने का संदेश दिया। सामाजिक छुआछूत को खत्म करने लिए उन्हें लोगों का विरोध भी झेलना पड़ा।
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क्रांतिकारी धौनी का जन्म 24 फरवरी 1893 में जिले के तल्ला बिनौला गांव में कुंती देवी और हिम्मत सिंह धौनी के घर में हुआ था। बचपन से कुशाग्र बुद्धि के राम सिंह ने बीए तक की पढ़ाई प्रथम श्रेणी में पास की। तब धौनी सालम क्षेत्र से स्नातक उपाधि पाने वाले पहले व्यक्ति थे। खादी की धोती, कुर्ता, गांधी टोपी उनका पहनावा था। 1919 में धौनी बीए अंतिम वर्ष की परीक्षा की तैयारियों में जुटे थे। इसी दौरान उनकी माता का निधन हो गया। उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बाद उनके परिजन चाहते थे कि वह कोई सरकारी नौकरी कर लें, लेकिन उन्होंने कुमाऊं कमिश्नर के तहसीलदार तक की सरकारी नौकरी के प्रस्ताव को ठुकरा दिया और पूरा जीवन देश सेवा में लगा दिया। राजस्थान प्रवास के दौरान उन्होंने बीकानेर के सूरतगढ़ मिडिल स्कूल में हेड मास्टर की नौकरी की। 1921 में इस नौकरी से त्यागपत्र देकर राम चंद्र नेवटिया हाईस्कूल फतेहपुर (जयपुर) में सहायक शिक्षक बन गए। धौनी अल्मोड़ा डिस्ट्रिक्ट बोर्ड के सदस्य और 1926 में चेयरमैन भी रहे। 1928 में वह सालम आ गए और चौखुरी में मिडिल स्कूल स्थापित कर लोगों में आजादी की अलख जगाई। मुंबई प्रवास के दौरान 1929 में वह चेचक रोगियों की सेवा में जुट गए। इस दौरान वह भी बीमारी की चपेट में आ गए। स्वास्थ्य खराब होने पर उन्होंने 12 नवंबर 1930 को दुनिया को अलविदा कह दिया।
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अंग्रेजों को बंदर कहकर देश छोड़ने का दिया संदेश
अल्मोड़ा। राम सिंह धौनी क्रांतिकारी होने के साथ ही एक प्रखर पत्रकार, संपादक और साहित्यकार भी थे। उनकी कविताओं में देशप्रेम की झलक स्पष्ट झलकती है। उन्होंने साहित्य के जरिए लोगों में देशप्रेम की अलख जगाई। स्व. धौनी की ओर से रचित ‘भारत मैं तुझको श्रद्धा से प्रणाम करता हूं, अपने हृदय के भावों को चरणों में धरता हूं...’ कविता उनके देशप्रेम को उजागर करती है। उन्होंने ‘बहुत उजाड़ा नंदन वन को खूब दिखाया बंदरपन को..’ शीर्षक से लिखी कविता में अंग्रेजों को बंदर कहकर भारत देश छोड़कर चले जाने का संदेश दिया। सामाजिक छुआछूत को खत्म करने लिए उन्हें लोगों का विरोध भी झेलना पड़ा।
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