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वन अधिकार कानून की गोष्ठी
ब्यूरो/अमर उजाला ब्यूरो, अल्मोड़ा
Updated Sun, 15 Mar 2015 11:37 PM IST
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नगर पालिका सभागार में हुई गोष्ठी में वक्ताओं ने कहा कि ब्रिटिशकाल 1865 में पहला भारतीय वन अधिनियम बनने के बाद 1897 में बिनसर के जंगल को रिजर्व फारेस्ट घोषित किया गया लेकिन आजादी के बाद भी इस जंगल का व्यावसायिक दोहन किया जा रहा है जो चिंताजनक है।
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मुख्य वक्ता डा. शमशेर सिंह बिष्ट ने कहा कि बांज के जंगल के संरक्षण के लिए 1988 में अभ्यारण्य की स्थापना की गई। बिनसर वन्यजीव विहार के भीतर छह गांव आते हैं। अभ्यारण्य की स्थापना के समय 76 अन्य गांव अपनी चारा पत्ती, घास, पशु चुगान, पशु बिछावन, ईंधन खेती के उपकरण, इमारती, लकड़ी, कुटीर उद्योगों के लिए कच्चे माल आदि के लिए पूर्णतया बिनसर के जंगल पर ही निर्भर रहते हैं। अभ्यारण्य बनने से इन गांवों का अस्तित्व संकट में है। खेती, पशुपालन, कुटीर उद्योगों आदि के लिए वनों से उक्त संसाधन मिलने मुश्किल हो गए हैं। हालत यह है कि ग्रामीण न तो अपना मकान बना सकते और न ही टूटे मकान की मरम्मत ही करा सकते हैं। जंगल से पेड़ काटने की अनुमति भी नही है। तेंदुआ, सुअर आदि हिंसक वन्य जीवों से लोगों को जान का भी खतरा बना रहता है।
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मदन लाल साह ने कहा कि एक तरफ बिनसर संरक्षण के लिए स्थानीय ग्रामीणों पर इतनी कड़ी पाबंदियां लगायी गई हैं कि अंग्रेजों के समय से मिले परंपरागत अधिकारों तक से उन्हें वंचित कर दिया गया है लेकिन दूसरी तरफ बिनसर के उसी जंगल में देश-विदेश के सैलानियों की आवाजाही, जमीन की खरीद-फरोख्त, नए गेस्ट हाउसों, होटल बनना कई सवाल खड़ा करता है। अध्यक्षता पद्मश्री डा. ललित पांडे, संचालन महेश जोशी ने किया।
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कार्यक्रम में सुनोली निवासी ईश्वरी दत्त जोशी की बिनसर अभ्यारण्य के बहाने पुस्तक का विमोचन किया गया। यह पुस्तक बिनसर वन क्षेत्र से संबंधित सूचनाओं, जानकारियों, 1988 में प्रदेश सरकार द्वारा इसे वन्य जीव अभ्यारण्य घोषित किए जाने के बाद स्थानीय गांवों पर पड़े प्रभावों का उल्लेख किया गया है।
वहां डीएफओ प्रेम कुमार, सतीश पांडे, चंदन बिष्ट, बालम सुयाल, दिनेश पांडे, कमल जोशी, देव सिंह पिलख्वाल, डीके कांडपाल, जीवन चंद्र, हयात रावत, जमन सिंह, उदय किरौला, राजीव शर्मा, डा. दीवान नगरकोटी, डा. रवि जोशी मौजूद थे।