कुदरत ने संवारा, हाकिमों ने नकारा
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जागेश्वर प्रसिद्ध तीर्थ स्थल होने के साथ ही पर्यटन के लिहाज से भी प्रकृति की नेमत है। आरतोला से जागेश्वर के बीच में देवदार का घना जंगल। डंडेश्वर और वृद्ध जागेश्वर में जगनाथ समूह के मंदिर। जागेश्वर से निकली जटा गंगा। यह सब जागेश्वर की सुंदरता में चार चांद लगाते हैं। यहां सालभर श्रद्धालु पूजा अर्चना के लिए आते रहते हैं। साथ ही पर्यटकों को भी जागेश्वर की आबोहवा पसंद आती है। प्रकृति ने जागेश्वर को सब कुछ दिया मगर हमारी सरकारें इस जागनाथ की नगरी के लिए कुछ नहीं कर पाईं। कई साल पहले जागेश्वर के निकट झील विकसित करने की योजना बनाई गई थी, यह भी आज तक अधर में है। यात्रियों के लिए धर्मशालाएं तक नहीं हैं। जटागंगा नदी में सुंदर घाट, आकर्षक गेट, पार्क आदि बनाने की योजनाएं भी फाइलों में ही गुम होकर रह गई हैं। गंदे पानी के निकास, कूड़ा निस्तारण की भी व्यवस्था नहीं है। ट्रस्ट बनने के बाद तो मंदिर से आय भी अच्छी खासी हो रही है।
बेहतर सुविधाएं नहीं होने से पर्यटन और रोजगार के क्षेत्र में अपेक्षित सुधार नहीं हो रहा है। 2003 में तत्कालीन केंद्रीय पर्यटन मंत्री जगमोहन ने स्वयं जागेश्वर आकर क्षेत्र के विकास को योजना बनाई थी। मंदिर के निकट बहने वाली जटागंगा में झील और आरतोला में भव्य गेट, पार्किंग आदि काम प्रस्तावित थे। 12 साल बाद भी योजनाएं धरातल पर नहीं उतर सकी हैं।
डीके जोशी, ग्राम प्रधान बसांण
जागेश्वर मंदिर के आसपास कुछ अच्छे पार्क और अन्य ट्रैकिंग रूट विकसित किए जाने चाहिए ताकि पर्यटक यहां रुकना पसंद करें। क्षेत्र में बेहतर सुविधाएं उपलब्ध होने से पर्यटन गतिविधियों को बढ़ावा तो मिलेगा ही साथ ही रोजगार के अवसरों में भी वृद्धि होगी। देश विदेश में प्रसिद्ध इस क्षेत्र का अपेक्षित विकास नहीं होना दुर्भाग्यपूर्ण है। सरकार को इस पर ध्यान देना चाहिए।
सतीश पंत, प्रधान दन्यां
जागेश्वर के विकास को करीब एक दशक पहले बनीं योजना को कारगर रूप दिया जाना जरूरी है। इसके अलावा गंदे पानी के निकास के लिए सीवर लाइन का निर्माण, कूड़ा निस्तारण को स्थायी और पर्यावरण अनुकूल व्यवस्था की जरूरत है, ताकि जटागंगा की पवित्रता और स्वच्छता बनीं रहे। मंदिर प्रबंधन समिति श्रद्धालुओं के लिए हर संभव सुविधाएं जुटाने का प्रयास कर रही है।
प्रकाश भट्ट, प्रबंधक जागेश्वर मंदिर प्रबंधन समिति
जागेश्वर में पर्यटकों के लिए सुविधाएं नहीं हैं। यहां स्तरीय वॉश रूम तक नहीं हैं। प्राचीन धर्मशालाओं को प्रशासन ने 2003 में तोड़ दिया परंतु 12 साल बाद भी नई धर्मशालाएं नहीं बनीं। मंदिर समूह के पास ही शमशानघाट है। शवों के अवशेष और अधजली लकड़ियों से जटागंगा प्रदूषित होने की आशंका है। जबकि इस नदी से कई गांवों के लिए पेयजल योजनाएं भी बनी हैं।
हरिमोहन भट्ट, प्रधान जागेश्वर