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बेतहाशा निर्माण, यांत्रिकी कार्य दे रहे पहाड़ों पर भूस्खलन को दावत
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दिनेश तिवारी
- फोटो : RANIKHET
रानीखेत (अल्मोड़ा)। प्राकृतिक आपदाओं और पहाड़ के बीच संघर्ष का लंबा इतिहास रहा है। पहाड़ों पर बेतहाशा निर्माण, यांत्रिकी कार्यों से पहाड़ों पर लगातार भूस्खलन का खतरा बढ़ रहा है। जानकारों की मानें तो खेती के लिए उपजाऊ मिट्टी और रहने के लिए कम ढाल वाली जमीन मिल जाने के कारण पहाड़ों में अधिकांश बस्तियां संवेदनशील स्थानों पर बसी हैं। इसी कारण राज्य का 80 प्रतिशत हिस्सा अस्थिर ढलानों पर होने के कारण भूस्खलन की परिधि में है और अधिकांश घटनाएं भी इन्हीं इलाकों में घट रही हैं। यदि समय रहते नहीं चेते तो भविष्य में इस तरह की घटनाएं और भी बढ़ने की आशंका है।
प्राकृतिक आपदाओं और पहाड़ के बीच का संघर्ष प्रकृति की उत्पत्ति के साथ ही शुरू हो गया था और यह संघर्ष अनवरत रूप से आज भी जारी है। विधि आयोग के पूर्व उपाध्यक्ष दिनेश तिवारी ने वाडिया इंस्टीट्यूट आफ हिमालयन जियोलॉजी के वैज्ञानिकों के एक अध्ययन का हवाला देते हुए बताया कि पहाड़ में लगातार भूस्खलन का खतरा बढ़ रहा है, इसका प्रमुख कारण क्षमता की अनदेखी कर बेतहाशा निर्माण कार्य है।
खेती के लिए उपजाऊ मिट्टी और रहने के लिए कम ढाल वाली जमीन मिल जाने के कारण पहाड़ों में अधिकांश बस्तियां संवेदनशील स्थानों पर बसी हुई हैं। लगभग 80 प्रतिशत हिस्सा अस्थिर ढलानों के कारण भूस्खलन की परिधि में है और भूस्खलन की घटनाएं इसी परिधि में आने वाले इलाकों में ही घट रही हैं। वर्तमान में ग्रीनहाउस प्रभाव से वायुमंडल में जलवाष्प की मात्रा बढ़ रही है जिससे अधिक वर्षा होने की संभावना होती है, अधिक वर्षा के कारण भूस्खलन, बादल फटना और बाढ़ का आना आम बात है। अचानक किसी इलाके में अधिक वर्षा होने लगती है जिसे बादल फटने की घटना कहा जाता है, इसी कारण जल भराव और बाढ़ जैसी स्थिति पैदा हो जाती है और भूस्खलन होने लगता है। धरातल में होने वाली हलचलें जैसे पत्थर गिरना या खिसकना पथरीली मिट्टी का कटाव और फिर बहाव के कारण बड़े पैमाने पर भूस्खलन होता है। पर्यावरणीय असंतुलन और पृथ्वी की हलचल जब बड़ा रूप ले लेती है तो यह परिस्थिति प्राकृतिक आपदा का कारण बनती है।
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प्राकृतिक आपदाओं और पहाड़ के बीच का संघर्ष प्रकृति की उत्पत्ति के साथ ही शुरू हो गया था और यह संघर्ष अनवरत रूप से आज भी जारी है। विधि आयोग के पूर्व उपाध्यक्ष दिनेश तिवारी ने वाडिया इंस्टीट्यूट आफ हिमालयन जियोलॉजी के वैज्ञानिकों के एक अध्ययन का हवाला देते हुए बताया कि पहाड़ में लगातार भूस्खलन का खतरा बढ़ रहा है, इसका प्रमुख कारण क्षमता की अनदेखी कर बेतहाशा निर्माण कार्य है।
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खेती के लिए उपजाऊ मिट्टी और रहने के लिए कम ढाल वाली जमीन मिल जाने के कारण पहाड़ों में अधिकांश बस्तियां संवेदनशील स्थानों पर बसी हुई हैं। लगभग 80 प्रतिशत हिस्सा अस्थिर ढलानों के कारण भूस्खलन की परिधि में है और भूस्खलन की घटनाएं इसी परिधि में आने वाले इलाकों में ही घट रही हैं। वर्तमान में ग्रीनहाउस प्रभाव से वायुमंडल में जलवाष्प की मात्रा बढ़ रही है जिससे अधिक वर्षा होने की संभावना होती है, अधिक वर्षा के कारण भूस्खलन, बादल फटना और बाढ़ का आना आम बात है। अचानक किसी इलाके में अधिक वर्षा होने लगती है जिसे बादल फटने की घटना कहा जाता है, इसी कारण जल भराव और बाढ़ जैसी स्थिति पैदा हो जाती है और भूस्खलन होने लगता है। धरातल में होने वाली हलचलें जैसे पत्थर गिरना या खिसकना पथरीली मिट्टी का कटाव और फिर बहाव के कारण बड़े पैमाने पर भूस्खलन होता है। पर्यावरणीय असंतुलन और पृथ्वी की हलचल जब बड़ा रूप ले लेती है तो यह परिस्थिति प्राकृतिक आपदा का कारण बनती है।
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