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दुर्लभ लोक वाद्ययंत्रों को सहेजने का समर्पण भाव
ब्यूरो/अमर उजाला ब्यूरो, अल्मोड़ा।
Updated Sun, 18 Dec 2016 11:02 PM IST
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जुगलकिशोर पेटशाली
- फोटो : अमर उजाला
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अल्मोड़ा। एक तरफ लोकसंस्कृति को पहचान दिलाने वाले लोक वाद्य लोगों से दूर होते जा रहे हैं वहीं उत्तराखंड के दुर्लभ पारंपरिक लोक वाद्ययंत्रों को सहेजने के काम में ग्राम पेटशाल निवासी रंगकर्मी जुगल किशोर पेटशाली ने जीवन के बहुमूल्य कई साल लगा दिए। ढोल, नगाड़ा, बिणाई, हुड़का, रणसिंह, नागफनी, भौंकर, अलगोजा जैसे करीब तीन दर्जन लोकवाद्यों को चितई स्थित लोक वाद्य यंत्र संग्रहालय में सहेजने के साथ ही रंगकर्मी पेटशाली ने लोकवाद्यों की जानकारी आम लोगों को देने के मकसद से किताब भी लिखी है।
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प्रेमगाथा पर आधारित राजूला मालूसाही महाकाव्य बनाने के बाद जयशंकर प्रसाद सम्मान प्राप्त करने वाले राज्य के एकमात्र रंगकर्मी जुगल किशोर पेटशाली बताते हैं कि 1980 से पहले तक वह पूरी तरह राजनीतिज्ञ रहे, लेकिन उसके बाद से वह उत्तराखंड की संस्कृति को बचाने के अभियान में जुटे हैं। वाद्ययंत्रों के प्रति लगाव या लोकवाद्य यंत्रों को बचाने के लिए उन्होंने 2003 से लोकवाद्यों को सहेजना शुरू कर दिया था। परिणाम स्वरूप आज उनके पास 35 दुर्लभ वाद्ययंत्रों समेत प्रख्यात नृत्य सम्राट उदयशंकर से जुड़ी सामग्री भी संकलित है।
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यही नहीं उनके पास 1925 से 1930 के रिकॉर्डेड सुरमाली कौतिक लागो मार झपैका जैसे कुमाऊंनी गीत भी संकलित हैं। उनका कहना है कि प्रदेश सरकार लोक वाद्यों और उन्हें बजाने वाले कलाकारों के प्रति संजीदा नहीं है। 29 नवंबर 2015 को जब मुख्यमंत्री हरीश रावत चितई पहुंचे थे तो उन्होंने चितई स्थित लोक वाद्य यंत्र संग्रहालय को राज्य संग्रहालय के रूप में पहचान दिलाने का आश्वासन दिया था।
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साथ ही संस्कृति विभाग को जुगल किशोर पेटशाली की साझीदारी में संग्रहालय का संचालन करने के भी निर्देश दिए थे, लेकिन एक साल बीत जाने के बाद भी इस दिशा में कोई कार्य नहीं हुआ है। उनका मानना है कि जब तक सरकारें संस्कृति, कलाकारों और लोकविधाओं को बचाने में पहल नहीं करेंगी आने वाली पीढ़ी विलुप्त हो रही सांस्कृतिक धरोहरों, लोककलाओं के बारे में कभी नहीं जान सकेगी।