{"_id":"64d133c557f17a740107bbbd","slug":"daina-hoya-bhoomi-ka-bhoomi-yala-deva-ho-almora-news-c-8-hld1004-204916-2023-08-07","type":"story","status":"publish","title_hn":"Almora News: दैणा होया भूमि का भूमि याला देवा हो...","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
Almora News: दैणा होया भूमि का भूमि याला देवा हो...
Mon, 07 Aug 2023 11:41 PM IST
हल्द्वानी ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, अल्मोड़ा
संवाद न्यूज एजेंसी, अल्मोड़ा
Updated Mon, 07 Aug 2023 11:41 PM IST
विज्ञापन
सोमनाथ मंदिर में हुड़के की थाप पर फूलों के पौधों की रोपाई करतीं महिलाएं। संवाद
- फोटो : सोमनाथ मंदिर में हुड़के की थाप पर फूलों के पौधों की रोपाई करतीं महिलाएं। संवाद
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विज्ञापन
सोमेश्वर (अल्मोड़ा)। 11 वीं शताब्दी में स्थापित आस्था का केंद्र सोमेश्वर का सोमनाथ मंदिर आज भी अनूठी परंपरा को सहेजे है। यहां हर साल श्रावण माह के चौथे सोमवार फूलों की रोपाई की परंपरा सदियों से चली आ रही है। हुड़के की थाप पर भगवान शिव के जयकारे लगाते हुए मंदिर परिसर में डेढ़ नाली के खेत में फूलों के पौधों की रोपाई होती है, जिसमें क्षेत्र के लगभग सभी गांवों की महिलाएं और नवविवाहिताएं शामिल होती हैं। इन्हीं फूलों से सोमनाथ मंदिर में विराजमान भगवान शिव का पूजन होता है।
मान्यता है कि रोपाई करते समय जो भी मनोकामना होती है वह जरूर पूरी होती है। इस बार भी श्रावण के चौथे सोमवार को क्षेत्र की महिलाएं उत्साह के साथ मंदिर में एकत्र हुईं। विभिन्न प्रजाति के फूलों के पौधे हुड़के की थाप पर रोपे गए। इस दौरान भगवान शिव के जयकारों और हुड़के की धुन से पूरा क्षेत्र गूंज उठा। दैणा होया भूमि का भूमि याला देवा हो, दैणा होया खोली का गणेश देवा हो.. से भगवान का आह्वान किया गया। संवाद
विज्ञापन
खुद स्थापित हुआ शिवलिंग
सोमेश्वर। मंदिर के पुजारी राम भारती बताते हैं कि 11 वीं शताब्दी में सोमेश्वर के हट्यूड़ा में शिवलिंग की स्वत: उत्पत्ति हुई। तत्कालीन राजा सोमचंद्र ने यहां मंदिर का निर्माण कराया। इन्हीं के नाम से मंदिर को सोमनाथ के नाम से प्रसिद्धि मिली। बताया कि पूर्व में मंदिर की देखरेख और पूजा-पाठ का जिम्मा रावल परिवारों को सौंपा गया लेकिन रावल वंश समाप्त होने के बाद आदि गुरु शंकराचार्य ने डोबा धारी मांग के टंगड़िया जाति के लोगों को अपना शिष्य बनाते हुए उन्हें पूजा-पाठ की जिम्मेदारी सौंपी। उन्होंने टंगड़िया जाति के लोगों को भारती की उपाधि दी। तब से वे मंदिर की देखरेख और पूजा-पाठ की जिम्मेदारी संभाले हैं। बताया कि तब से यहां फूलों के पौधों की रोपाई लगाने की परंपरा चली आ रही है।
विज्ञापन
अच्छी फसल का प्रतीक है फूलों के पौधों की रोपाई
सोमेश्वर। क्षेत्र की 80 वर्षीय हंसी देवी बताती हैं कि बचपन से ही महिलाओं को मंदिर में फूलों के पौधे की रोपाई लगाते हुए देखा है। अपने बुजुर्गों से भी यही सुना है कि रोपाई में शामिल होने वाले लोगों की मनोकामना पूर्ण होती है। बताया कि पूरे क्षेत्र में अच्छी फसल और उपज हो, घर में सुख-समृद्धि बनी रही, इसी मनोकामना के साथ फूलों के पौधे की रोपाई की परंपरा है।