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खुदा के नाम से पूजे जाते हैं भगवान अलखनाथ

Sun, 01 Jan 2017 11:21 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला ब्यूरो, बागेश्वर।
ब्यूरो/अमर उजाला ब्यूरो, बागेश्वर। Updated Sun, 01 Jan 2017 11:21 PM IST
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Alknath worshiped God in the name of God
​ कपकोट के दूणी में खुदा अलखनाथ भगवान की पूजा करते लोग। - फोटो : अमर उजाला

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उत्तराखंड अनेेक लोक उत्सव और परंपराओं के लिए विख्यात है। इन्हीं में से एक है कपकोट के कई गांवों में खुदा के नाम से अलखनाथ भगवान की पूजा। 12 साल में एक बार होने वाली यह पूजा मार्गशीर्ष और शुक्ल पक्ष में तीन से 22 दिन तक होती है। पूजा का ग्रामीणों को लंबा इंतजार रहता है। कपकोट के दूणी गांव में तिरूवा परिवारों की ओर से आयोजित पूजा में दूर दूूूर से लोग शिरकत कर रहे हैं। 

कपकोट ब्लॉक के राम गंगा, रेवती घाटी, सरयू घाटी और पिंडर घाटी के कई गांवों में मार्गशीर्ष और पोष महीने के शुक्ल पक्ष में खुदा (अलखनाथ भगवान) की पूजा होती है। यह पूजा कहीं तीन दिन तो कहीं सात और 22 दिन की होती है। पूजा को मेहता, दानू, कोरंगा और अनुसूचित जाति के परिवार करते हैं। गायक लीती और बांसे गांव के आर्य होते हैं। खुदा पूजा रात के अंधेरे में होती है। जिस मकान में अलखनाथ की पूजा होती है उसकी छत का एक हिस्सा खुला छोड़ा जाता है। यहीं से अलखनाथ भगवान का आना जाना बताया जाता है। अलखनाथ की पूजा के पहले दिन श्रद्धालु पूजा के काम आने वाले बर्तनों और देव डांगरों को गाजे के साथ पवित्र नदियों में स्नान कराते हैं।
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पूजा स्थल को जलाभिषेक और पंचामृत छिड़क कर उसे पवित्र किया जाता है। दिन में ही अलखनाथ, कालासैम, ग्वल, कासण, छुरमल, दुर्गा, कालिका समेत कई अन्य देव देवताओं की स्थापना की जाती है। सायंकाल गणेश पूजन के बाद महा आरती होती है। इसके बाद जगरिए अलखनाथ की गाथा का गायन करते हैं। कुछ देर बाद देवता अवतरित होते हैं। ढोल नगाड़ों की थाप पर वह नाचते हुए लोगों को इच्छित वरदान देते हैं।
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खुदा शब्द से संकेत मिलते हैं और इतिहास भी गवाह है कि मुगलों ने अपने समय में हिंदू देवी देवताओं के कई मंदिर तोड़े और लोगों को पूजा भी नहीं करनी दी। उसी दौर में ग्रामीण अलखनाथ भगवान की पूजा कर रहे थे। तो वहां मुगलों में ग्रामीणों को पूजा करते देख लिया। ग्रामीणों ने पूछने पर उन्हें बताया कि वह खुदा की पूजा कर रहे हैं। इस पर मुगलों ने उन्हें दंडित नहीं किया और वहां से चले गए। तब से अलखनाथ की पूजा रात में होने के साथ ही पूजास्थल की छत खुली रखी जाती है और शक्ति स्थल के पास कपड़े का पर्दा लगाया जाता है। लीती गांव के गायक उमेद राम कहते हैं कि अलखनाथ शिवजी के अवतार हैं। वह एकांत में अत्यंत शुद्धता के साथ रहने वाले देवता हैं। 



अलखनाथ की पूजा के दौरान पय्यां को निमंत्रण देने के मौके पर जोर का मेला लगता है। लीती गांव के उमेद राम बताते हैं कि भगवान श्री कृष्ण ने सुद्धेनाथ और बुद्धेनाथ की तपस्या से प्रसन्न होकर उन्हें पाताल लोक से पय्यां का पौधा दिया। जागरण वाले दिन में पय्यां की टहनियों को गाजे बाजे के साथ तोड़कर उसे डलिया में रखकर पूजास्थल पर लाया जाता है। रात्रि में चार बार की महा आरतियों के बाद दूसरी सुबह बलिदान होता है। भंडारे में बड़ी संख्या में श्रद्धालु प्रसाद ग्रहण करते हैं। 


 
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