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किसानों की आय दोगुनी करने पर काम शुरू
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अल्मोड़ा। 2022 तक किसानों की आय दोगुनी करने को जिले की 95 न्याय पंचायतों में 20 कलस्टर गठित कर दिए गए हैं। विभिन्न विभाग आपसी सामंजस्य से काश्तकारों को सब्जी, जड़ी बूटी, उद्यानीकरण, रेशम, दुग्ध, मत्स्य, पशुपालन, कुक्कुट पालन से जोड़ रहे हैं और सरकारी योजनाओं का लाभ काश्तकारों तक पहुंचाया जा रहा है, ताकि उनकी आय में बढ़ोतरी हो सके।
जिले के ग्यारह ब्लॉकों में 95 न्याय पंचायतों के अंतर्गत 1166 ग्राम पंचायतें हैं। 2022 तक काश्तकारों की आय दोगुनी करने को जिले में 20 कलस्टर गठित किए गए हैं। इन कलस्टरों से 1,09,268 काश्तकारों को जोड़ा गया है। बीस कलस्टरों के लिए एक-एक नोडल और सह नोडल अधिकारी भी नामित किए गए हैं।
योजना के तहत कृषि, उद्यान, पशुपालन, दुग्ध, मत्स्य, रेशम समेत विभिन्न विभागों ने आपसी समन्वय से काम करना शुरू कर दिया है। इसके लिए जागरूकता गोष्ठियां और काश्तकारों को भ्रमण भी कराया जा रहा है, ताकि वह उससे सीख लेकर अपनी आय बढ़ा सकें।
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मुख्य कृषि अधिकारी प्रियंका सिंह ने बताया कि काश्तकारों को उनके रुझान के अनुसार सब्जी, फसल उत्पादन, रेशम, मत्स्य, दुग्ध उत्पादन, उद्यानीकरण, जड़ी-बूटी, मसाले, पशुपालन, पॉलीहाउस, बकरी, कुक्कुट पालन, जैविक खेती, बर्मी कंपोस्ट उत्पादन से जोड़ा जा रहा है।
इसमें विवेकानंद पर्वतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, जीबी पंत पर्यावरण संस्थान, कृषि विज्ञान केंद्र मटेला, राजकीय जैविक प्रशिक्षण केंद्र मजखाली के वैज्ञानिकों का भी सहयोग लिया जा रहा है। जागरुकता के लिए ग्रामीण इलाकों में गोष्ठियां आयोजित कर विशेषज्ञ काश्तकारों को जानकारियां भी दे रहे हैं।
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जिले के ग्यारह ब्लॉकों में 95 न्याय पंचायतों के अंतर्गत 1166 ग्राम पंचायतें हैं। 2022 तक काश्तकारों की आय दोगुनी करने को जिले में 20 कलस्टर गठित किए गए हैं। इन कलस्टरों से 1,09,268 काश्तकारों को जोड़ा गया है। बीस कलस्टरों के लिए एक-एक नोडल और सह नोडल अधिकारी भी नामित किए गए हैं।
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योजना के तहत कृषि, उद्यान, पशुपालन, दुग्ध, मत्स्य, रेशम समेत विभिन्न विभागों ने आपसी समन्वय से काम करना शुरू कर दिया है। इसके लिए जागरूकता गोष्ठियां और काश्तकारों को भ्रमण भी कराया जा रहा है, ताकि वह उससे सीख लेकर अपनी आय बढ़ा सकें।
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मुख्य कृषि अधिकारी प्रियंका सिंह ने बताया कि काश्तकारों को उनके रुझान के अनुसार सब्जी, फसल उत्पादन, रेशम, मत्स्य, दुग्ध उत्पादन, उद्यानीकरण, जड़ी-बूटी, मसाले, पशुपालन, पॉलीहाउस, बकरी, कुक्कुट पालन, जैविक खेती, बर्मी कंपोस्ट उत्पादन से जोड़ा जा रहा है।
इसमें विवेकानंद पर्वतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, जीबी पंत पर्यावरण संस्थान, कृषि विज्ञान केंद्र मटेला, राजकीय जैविक प्रशिक्षण केंद्र मजखाली के वैज्ञानिकों का भी सहयोग लिया जा रहा है। जागरुकता के लिए ग्रामीण इलाकों में गोष्ठियां आयोजित कर विशेषज्ञ काश्तकारों को जानकारियां भी दे रहे हैं।