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स्वास्थ्य सुविधाओं के नाम पर सामान्य सी जांच तक नहीं होती अस्पतालों में
Updated Tue, 12 Jun 2018 11:56 PM IST
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अल्मोड़ा। प्रदेश की भाजपा सरकार के शासन में पहली बार एक साल के भीतर जिले में 46 डॉक्टरों की तैनाती हुई है लेकिन इसके बावजूद जिले के अस्पतालों में डॉक्टरों के कुल 273 पदों में से 103 पद खाली चल रहे हैं। हालांकि कुछ माह पहले 46 डॉक्टरों की तैनाती के बाद काफी हद तक राहत मिली है, लेकिन फिर भी जिला मुख्यालय से लेकर ब्लॉक स्तर तक स्थित अस्पतालों में डॉक्टरों की कमी बनी हुई है। दूसरी तरफ ब्लॉक और तहसील स्तर के अधिकांश अस्पतालों में मरीजों के रक्त की जांच, अल्ट्रासाउंड की तक सुविधा नहीं है। रोगियों को सामान्य जांच के लिए भी जिला मुख्यालय की दौड़ लगानी पड़ती है। कई बार दूरस्थ क्षेत्र के मरीज इलाज के अभाव में दम तोड़ देते हैं। अलग राज्य बनने के बाद से उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों में स्थित अस्पतालों में डॉक्टरों की कमी बनी हुई है। डॉक्टरों की कमी और चिकित्सा सुविधाओं से संबंधित अन्य समस्याएं पिछले विधानसभा चुनाव में प्रमुख मुद्दा बने थे। इधर कुछ माह पहले अल्मोड़ा जिले में भी 46 डॉक्टरों की तैनाती हुई है। इन सभी डॉक्टरों को ग्रामीण इलाकों में स्थित अस्पतालों में तैनात किया गया है। पहाड़ी जिलों में डॉक्टरों की तैनाती को प्रदेश सरकार एक बड़ी उपलब्धि के तौर पर प्रचारित कर रही है। एक साथ 46 डॉक्टर मिल जाने से अधिकांश डॉक्टर विहीन अस्पतालों में कम से कम एक डॉक्टर आ जाने से लोगों को राहत जरूर मिली है लेकिन अब भी जिले में डॉक्टरों के 103 पद खाली हैं। अतिरिक्त प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र भैसड़गांव और शहरफाटक दो अस्पताल आज भी डॉक्टर विहीन हैं। जिला मुख्यालय के अस्पतालों में तक न्यूरोलॉजिस्ट, न्यूरोसर्जन, कार्डियोलॉजिस्ट सहित कई विशेषज्ञ डॉक्टरों के कई पद खाली चल रहे हैं। हालत यह है कि जिला मुख्यालय के एकमात्र महिला अस्पताल में भी महिला डॉक्टरों के चार पद खाली हैं। वहां कुछ संविदा डॉक्टरों से काम चलाया जा रहा है।
सामान्य सी जांच तक नहीं होती ब्लॉकों के अस्पतालों में
छोटी सी परेशानी में भी जिला मुख्यालय भागना पड़ता है मरीजों को
कई सालों से गायब चल रहे हैं 26 डॉक्टर
अल्मोड़ा। जिले में तैनात 26 डॉक्टर पिछले कई सालों से ड्यूटी से गायब हैं। इनमें से अधिकांश को गैरहाजिर रहते 10 से 19 साल तक हो गए हैं। इनमें से कुछ ने बचाव के तौर पर कंडिशनल इस्तीफे भी भेज रखे हैं। बताया जाता है कि इनमें अधिकांश डॉक्टरों ने निदेशालय और शासन स्तर पर संपर्क साध कर नियमों की पेचीदगी का लाभ उठाते हुए वर्षों अनुपस्थित रहने के बावजूद नौकरी को बरकरार रखा है। जबकि पता लगा है कि इनमें अधिकांश डॉक्टर कहीं न कहीं प्राइवेट प्रैक्टिस कर रहे हैं। दरअसल लंबे समय तक अनुपस्थित रहने के बावजूद 20 साल तक नौकरी बचे रहने पर यह सभी डॉक्टर जिंदगी भर पेंशन और अन्य सुविधाओं के हकदार हो जाएंगे, लेकिन बजट का रोना रोने वाली सरकार का इस ओर कोई ध्यान नहीं है। बताया जाता है कि अन्य जिलों में भी कई डॉक्टर इसी तरह कई वर्षों से गायब हैं। नौकरी से बाहर नहीं होने के कारण इनके पदों को रिक्त भी घोषित नहीं किया जा सकता।
जिले के किसी अस्पताल में नहीं डायलिसिस की सुविधा
अल्मोड़ा। स्वास्थ्य सुविधाओं को लेकर प्रदेश की सभी सरकारें तमाम दावे करती रहती हैं लेकिन धरातल पर हालत यह है कि जिले में सरकारी तो दूर किसी प्राइवेट अस्पताल में तक मरीजों के लिए डायलिसिस की तक सुविधा नहीं है। साधन संपन्न के लोग तो इसके लिए बाहर चले जाते हैं, लेकिन निर्धन और मध्यम वर्ग परिवारों के मरीजों की इलाज के अभाव में समय से पहले जिंदगी चली जाती है। 2006 में अल्मोड़ा के बेस अस्पताल में लाखों रुपये खर्च करके डायलिसिस मशीन लगाई भी गई, लेकिन स्वास्थ्य महकमे की लापरवाही के चलते यह मशीन कभी चालू नहीं हुई। बीते दिनों कुछ लोग इस मामले को हाइकोर्ट तक ले गए। हाईकोर्ट ने सितंबर 2018 तक अल्मोड़ा में डायलिसिस मशीन लगाने का आदेश जारी किया है। बेस अस्पताल के पीएमएस डॉ.टीडी रखोलिया ने बताया कि इसके लिए नए सिरे से प्रक्रिया चल रही है।
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सीएम की घोषणा के बाद भी दो साल से खराब है सिटी स्कैन मशीन
अल्मोड़ा। अल्मोड़ा जिले के मरीजों की सुविधा के लिए बेस अस्पताल में करीब 10 साल पहले लगाई गई सिटी स्कैन मशीन 2016 से खराब पड़ी है। यह मुद्दा भी पिछले विधानसभा चुनाव में जोरशोर से उठा था। सभी जनप्रतिनिधियों ने मशीन को जल्द दुरुस्त करने के दावे किए थे। सत्ता संभालने के बाद मई 2017 में अल्मोड़ा पहुंचे मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने बकायदा नई सिटी स्कैन मशीन खरीदने की घोषणा की लेकिन आज तक पुरानी मशीन ही ठीक नहीं कराई गई है और जिले के मरीजों को सिटी स्कैन के लिए हल्द्वानी जाना पड़ रहा है। इधर बेस अस्पताल के पीएमएस डा. रखोलिया ने बताया कि पुरानी मशीन को दुरुस्त करने में 18 लाख रुपये खर्च होंगे। संबंधित कंपनी से बात करके नया प्रस्ताव शासन को भेज दिया गया है। बेस अस्पताल में महिला रोगियों की जांच के लिए लगी मेमोग्राफी मशीन भी 2012 से खराब पड़ी है।
सस्ती दवा दिलाने की पीएम की योजना का नहीं मिल रहा लाभ
अल्मोड़ा। जनऔषधि केंद्रों के जरिए आम लोगों को सस्ती दवाएं उपलब्ध कराने की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की योजना कारगर साबित नहीं हुई है। जन औषधि केंद्र सभी जगह खुले हैं, लेकिन हकीकत यह है कि अधिकांश डॉक्टर जन औषधि केंद्र में उपलब्ध दवाएं नहीं लिखते और मरीज पर्ची में डॉक्टर द्वारा बाजार के लिए लिखी गई दवा खरीदने को मजबूर हैं। कहने को हर अस्पताल में मुफ्त दवा के भी स्टोर हैं लेकिन वहां भी पर्याप्त दवाएं उपलब्ध नहीं रहतीं। जिला मुख्यालय के अस्पतालों में ग्रामीण क्षेत्रों से आने वाले मरीज इतने जागरूक भी नहीं होते कि जन औषधि केंद्र में जाकर डॉक्टर द्वारा लिखी गई दवा के विकल्प के तौर पर दूसरी दवा खरीद लें। बीते दिनों अल्मोड़ा में जन औषधि केंद्र का निरीक्षण करने पहुंची संसदीय समिति के सामने भी यह मुद्दा उठा था। समिति ने इस बारे में कार्रवाई करने की बात कही है देखना है इसका क्या असर होता है।
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सामान्य सी जांच तक नहीं होती ब्लॉकों के अस्पतालों में
छोटी सी परेशानी में भी जिला मुख्यालय भागना पड़ता है मरीजों को
कई सालों से गायब चल रहे हैं 26 डॉक्टर
अल्मोड़ा। जिले में तैनात 26 डॉक्टर पिछले कई सालों से ड्यूटी से गायब हैं। इनमें से अधिकांश को गैरहाजिर रहते 10 से 19 साल तक हो गए हैं। इनमें से कुछ ने बचाव के तौर पर कंडिशनल इस्तीफे भी भेज रखे हैं। बताया जाता है कि इनमें अधिकांश डॉक्टरों ने निदेशालय और शासन स्तर पर संपर्क साध कर नियमों की पेचीदगी का लाभ उठाते हुए वर्षों अनुपस्थित रहने के बावजूद नौकरी को बरकरार रखा है। जबकि पता लगा है कि इनमें अधिकांश डॉक्टर कहीं न कहीं प्राइवेट प्रैक्टिस कर रहे हैं। दरअसल लंबे समय तक अनुपस्थित रहने के बावजूद 20 साल तक नौकरी बचे रहने पर यह सभी डॉक्टर जिंदगी भर पेंशन और अन्य सुविधाओं के हकदार हो जाएंगे, लेकिन बजट का रोना रोने वाली सरकार का इस ओर कोई ध्यान नहीं है। बताया जाता है कि अन्य जिलों में भी कई डॉक्टर इसी तरह कई वर्षों से गायब हैं। नौकरी से बाहर नहीं होने के कारण इनके पदों को रिक्त भी घोषित नहीं किया जा सकता।
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जिले के किसी अस्पताल में नहीं डायलिसिस की सुविधा
अल्मोड़ा। स्वास्थ्य सुविधाओं को लेकर प्रदेश की सभी सरकारें तमाम दावे करती रहती हैं लेकिन धरातल पर हालत यह है कि जिले में सरकारी तो दूर किसी प्राइवेट अस्पताल में तक मरीजों के लिए डायलिसिस की तक सुविधा नहीं है। साधन संपन्न के लोग तो इसके लिए बाहर चले जाते हैं, लेकिन निर्धन और मध्यम वर्ग परिवारों के मरीजों की इलाज के अभाव में समय से पहले जिंदगी चली जाती है। 2006 में अल्मोड़ा के बेस अस्पताल में लाखों रुपये खर्च करके डायलिसिस मशीन लगाई भी गई, लेकिन स्वास्थ्य महकमे की लापरवाही के चलते यह मशीन कभी चालू नहीं हुई। बीते दिनों कुछ लोग इस मामले को हाइकोर्ट तक ले गए। हाईकोर्ट ने सितंबर 2018 तक अल्मोड़ा में डायलिसिस मशीन लगाने का आदेश जारी किया है। बेस अस्पताल के पीएमएस डॉ.टीडी रखोलिया ने बताया कि इसके लिए नए सिरे से प्रक्रिया चल रही है।
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सीएम की घोषणा के बाद भी दो साल से खराब है सिटी स्कैन मशीन
अल्मोड़ा। अल्मोड़ा जिले के मरीजों की सुविधा के लिए बेस अस्पताल में करीब 10 साल पहले लगाई गई सिटी स्कैन मशीन 2016 से खराब पड़ी है। यह मुद्दा भी पिछले विधानसभा चुनाव में जोरशोर से उठा था। सभी जनप्रतिनिधियों ने मशीन को जल्द दुरुस्त करने के दावे किए थे। सत्ता संभालने के बाद मई 2017 में अल्मोड़ा पहुंचे मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने बकायदा नई सिटी स्कैन मशीन खरीदने की घोषणा की लेकिन आज तक पुरानी मशीन ही ठीक नहीं कराई गई है और जिले के मरीजों को सिटी स्कैन के लिए हल्द्वानी जाना पड़ रहा है। इधर बेस अस्पताल के पीएमएस डा. रखोलिया ने बताया कि पुरानी मशीन को दुरुस्त करने में 18 लाख रुपये खर्च होंगे। संबंधित कंपनी से बात करके नया प्रस्ताव शासन को भेज दिया गया है। बेस अस्पताल में महिला रोगियों की जांच के लिए लगी मेमोग्राफी मशीन भी 2012 से खराब पड़ी है।
सस्ती दवा दिलाने की पीएम की योजना का नहीं मिल रहा लाभ
अल्मोड़ा। जनऔषधि केंद्रों के जरिए आम लोगों को सस्ती दवाएं उपलब्ध कराने की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की योजना कारगर साबित नहीं हुई है। जन औषधि केंद्र सभी जगह खुले हैं, लेकिन हकीकत यह है कि अधिकांश डॉक्टर जन औषधि केंद्र में उपलब्ध दवाएं नहीं लिखते और मरीज पर्ची में डॉक्टर द्वारा बाजार के लिए लिखी गई दवा खरीदने को मजबूर हैं। कहने को हर अस्पताल में मुफ्त दवा के भी स्टोर हैं लेकिन वहां भी पर्याप्त दवाएं उपलब्ध नहीं रहतीं। जिला मुख्यालय के अस्पतालों में ग्रामीण क्षेत्रों से आने वाले मरीज इतने जागरूक भी नहीं होते कि जन औषधि केंद्र में जाकर डॉक्टर द्वारा लिखी गई दवा के विकल्प के तौर पर दूसरी दवा खरीद लें। बीते दिनों अल्मोड़ा में जन औषधि केंद्र का निरीक्षण करने पहुंची संसदीय समिति के सामने भी यह मुद्दा उठा था। समिति ने इस बारे में कार्रवाई करने की बात कही है देखना है इसका क्या असर होता है।