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होली जलाएं पर्यावरण नहीं

Thu, 09 Nov 2023 07:05 PM IST
Anonymous User अमर उजाला ब्यूरो मैनपुरी
अमर उजाला ब्यूरो मैनपुरी Published by: Anonymous User Updated Thu, 09 Nov 2023 07:05 PM IST
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Holy Light environmental
हाेली - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो
मैनपुरी। घटती हरियाली और बढ़ता प्रदूषण वर्तमान में सबसे बड़ी समस्या है। साथ ही सर्वाधिक चिंताजनक का विषय भी। प्रतिवर्ष होली जलाने के लिए हरे पेड़ों का कटान होता है। इससे प्रदूषण बढ़ता है। वहीं सनातन धर्म के नियमों के होली में हरे पेड़ों को काटकर रखना निषेध है। ऐसे में जरूरत है भारतीय संस्कृति के मूल्यों को अपनाकर पर्यावरण को बचाने की और प्रदूषण घटाने की।
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प्रत्येक वर्ष त्योहार पर जगह-जगह होली जलाई जाती है। हफ्तों पहले चौराहों पर होली एकत्रित की जाती है। इसके लिए सूखी लकड़ियों के साथ ही बड़े पैमाने पर हरे पेड़ों को काटा जाता है। ताकि बड़ी से बड़ी होली रखी जाए। इससे पर्यावरण को नुकसान होता है। साथ ही प्रदूषण भी बढ़ता है। जबकि वास्तविकता यह है कि भारतीय संस्कृति, सनातन धर्म और शास्त्रों के अनुसार हरे पेड़ों को ही काटना निषेध है। होली के लिए तो कतई हरे पेड़ नहीं काटने चाहिए। श्री एकरसानंद संस्कृत माध्यमिक विद्यालय के प्रधानाचार्य डाक्टर ग्याप्रसाद दुबे ने बताया होली के लिए हरे पेड़ कतई नहीं काटने चाहिए। शास्त्रों में भी इसे निषेध बताया गया है। वर्तमान में आधुनिकता के माहौल में भारतीय संस्कृति को लोग भूल चुके हैं। इसके चलते ही धर्म आदि के कार्यों में गिरावट आई है। लोग पूजा-पाठ के वास्तविक नियम तक भूल चुके हैं।
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प्रधानाचार्य डाक्टर ग्याप्रसाद दुबे ने बताया कि शास्त्रों के मुताबिक होली में उपलों का प्रयोग सर्वाधिक होता है। होली रखने के लिए उपलों से ही पूजा होती है। प्राचीन काल में होली में उपलों के बाद फसलों से बची चीजों जैसे सरसों, अरहर की लकड़ी, धान के पुआल आदि का उपयोग किया जाता था। हरे पेड़ों को काटकर कभी भी होलिका में नहीं रखा जाता था।
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डाक्टर इच्छाराम द्विवेदी ने बताया कि वेद, पुराण और शास्त्रों सभी में हरे पेड़ों को काटने की मनाही है। भारतीय संस्कृति में सदैव प्रकृति की रक्षा की है। यही कारण हैं कि सबसे ज्यादा आक्सीजन देने वाले पेड़ों को पूज्यनीय बताया गया है। इन्हें पंच पल्लव की उपाधि दी गई है। इनमें आम, बरगद, पीपल, गूलर, अशोक को शामिल किया गया है। इसके अलावा दूब घास से लेकर आक व नीम तक की पूजा की जाती है। ऐसे में हरे पेड़ों को होलिका के लिए काटना पर्यावरण, धर्म और शास्त्र तीनों ही दृष्टि से गलत है।
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