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फर्जी पासपोर्ट मामले में अफसरों पर लटकी तलवार
सतीश कुमार पांडेय, अमर उजाला, गोरखपुर।
Updated Mon, 07 Mar 2016 01:37 AM IST
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नेपाली यवुकों को गोरखपुर के पते पर फर्जी तरीके से पासपोर्ट जारी कर दिए गए थे।
- फोटो : demo pic
फर्जी पते पर नेपाली नागरिकों का पासपार्ट बनाने के मामले में पुलिस के साथ ही एलआईयू के अफसरों पर भी कार्रवाई की तलवार लटक रही है। जांच के बाद दर्ज हुई एफआईआर में दोषियों को बचाने का मामला सामने आने पर आईजी ने पूरे मामले की फाइल तलब की है। जुलाई 2015 में कैंट और शाहपुर थाने में दर्ज हुए मुकदमे की प्रगति रिपोर्ट भी मांगी गई है।
वर्ष 2005 से 2009 के बीच कूड़ाघाट, शाहपुर के पते पर नेपाली मूल के 91 लोगों ने पासपोर्ट के लिए आवेदन किया था। पुलिस, एलआईयू के वेरिफिकेशन के बाद 60 लोगों को पासपोर्ट मिल गया। भारत-नेपाल मैत्री समाज के अध्यक्ष मोहन लाल गुप्ता ने 2009 में किराए पर कमरा लेकर रहने वाले नेपाली नागरिकों को गोरखपुर का निवासी बताकर पासपोर्ट देने की शिकायत तत्कालीन आईजी से की थी। जांच में मामला सही मिला।
वेरिफिकेशन में 36 लोग पासपोर्ट में दर्ज पते पर मिले ही नहीं। छानबीन करने पर आसपास के लोगों ने भी इसकी तस्दीक की। जांच में पुलिस व एलआईयू के दरोगा, सिपाहियों के फंसने से अधिकारी भी उन्हें बचाने की कोशिश में लगे रहे। शासन के मामले को संज्ञान लेने पर आईजी ने अक्टूबर 2014 में एसपी (ग्रामीण) ब्रजेश सिंह को पूरे मामले की नए सिरे से जांच करने का निर्देश दिया था।
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जांच में कैंट क्षेत्र के पते पर पासपोर्ट बनवाने वाले 26 और शाहपुर के पते पर पासपोर्ट बनवाने वाले 10 लोग दोषी मिले। नवंबर 2014 में एसपी ग्रामीण की रिपोर्ट थाने पहुंच गई लेकिन थानेदार मुकदमा दर्ज करने में हीलाहवाली कर रहे थे। अधिकारियों के दबाव पर 16 जुलाई को कैंट पुलिस ने पासपोर्ट बनवाने वाले 26 नेपाली नागरिक और शाहपुर पुलिस ने 5 नेपाली नागरिकों पर फर्जी दस्तावेज तैयार कर जालसाजी करने और 17 पासपोर्ट अधिनियम के तहत केस दर्ज किया।
पुलिस ने इस मामले में मोहनलाल गुप्ता को वादी बनाया था जिनकी तीन महीने पहले मौत हो गई। बड़े पैमाने पर हुई धांधली में शामिल लोगों को बचाने का प्रयास किए जाने की जानकारी के बाद आईजी एचआर शर्मा ने पूरे मामले की फाइल तलब की है।
छह पते से किए गए थे आवेदन
पासपोर्ट बनवाने के लिए छह पते का इस्तेमाल किया गया था। जीआरडी गेट के पते पर आठ, चंडी भवन के पते पर चार, दुर्गा भवन के पते पर सात, कूड़ाघाट के पते पर तीन, यादव निवास के पते पर चार और जगरनाथ भवन के पते पर दो लोगों का पासपोर्ट जारी किया गया। इन पते पर 53 नेपाली नागरिकों ने आवेदन किए थे जिनमें 36 लोगों को निवासी बताते हुए पासपोर्ट जारी करने की संस्तुति पुलिस और एलआईयू के अफसरों ने की थी।
मानव तस्करी की जताई जा रही आशंका
फर्जी दस्तावेज पर पासपोर्ट बनवाने नेपाली नागरिक छह साल से लापता हैं। जालसाजी सामने आने के बाद मामले की छानबीन कर रहे पुलिस और एलआईयू के अफसरों को इनके बारे में अब तक कोई जानकारी नहीं मिल पाई है। पासपोर्ट धारकों में महिलाओं की संख्या अधिक होने के कारण इसे मानव तस्करी से जोड़कर देखा जा रहा है। कुल 53 नेपाली नागरिकों ने आवेदन किए थे, जिसमें 36 लोगों को पासपोर्ट जारी करने की संस्तुति पुलिस और एलआईयू के अफसरों ने की है। इनमें महिलाओं की संख्या 32 है। महिलाओं की संख्या अधिक होने के कारण पूरे मामले को मानव तस्करी से जोड़कर देखा जा रहा है। इस मामले में एसपी ग्रामीण की जांच में वर्ष 2005 से 2009 के बीच कैंट और शाहपुर थाने के प्रभारी रहे चार दरोगा और 10 सिपाही दोषी मिले हैं, जिन पर विभागीय कार्रवाई होनी है।
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वर्ष 2005 से 2009 के बीच कूड़ाघाट, शाहपुर के पते पर नेपाली मूल के 91 लोगों ने पासपोर्ट के लिए आवेदन किया था। पुलिस, एलआईयू के वेरिफिकेशन के बाद 60 लोगों को पासपोर्ट मिल गया। भारत-नेपाल मैत्री समाज के अध्यक्ष मोहन लाल गुप्ता ने 2009 में किराए पर कमरा लेकर रहने वाले नेपाली नागरिकों को गोरखपुर का निवासी बताकर पासपोर्ट देने की शिकायत तत्कालीन आईजी से की थी। जांच में मामला सही मिला।
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वेरिफिकेशन में 36 लोग पासपोर्ट में दर्ज पते पर मिले ही नहीं। छानबीन करने पर आसपास के लोगों ने भी इसकी तस्दीक की। जांच में पुलिस व एलआईयू के दरोगा, सिपाहियों के फंसने से अधिकारी भी उन्हें बचाने की कोशिश में लगे रहे। शासन के मामले को संज्ञान लेने पर आईजी ने अक्टूबर 2014 में एसपी (ग्रामीण) ब्रजेश सिंह को पूरे मामले की नए सिरे से जांच करने का निर्देश दिया था।
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जांच में कैंट क्षेत्र के पते पर पासपोर्ट बनवाने वाले 26 और शाहपुर के पते पर पासपोर्ट बनवाने वाले 10 लोग दोषी मिले। नवंबर 2014 में एसपी ग्रामीण की रिपोर्ट थाने पहुंच गई लेकिन थानेदार मुकदमा दर्ज करने में हीलाहवाली कर रहे थे। अधिकारियों के दबाव पर 16 जुलाई को कैंट पुलिस ने पासपोर्ट बनवाने वाले 26 नेपाली नागरिक और शाहपुर पुलिस ने 5 नेपाली नागरिकों पर फर्जी दस्तावेज तैयार कर जालसाजी करने और 17 पासपोर्ट अधिनियम के तहत केस दर्ज किया।
पुलिस ने इस मामले में मोहनलाल गुप्ता को वादी बनाया था जिनकी तीन महीने पहले मौत हो गई। बड़े पैमाने पर हुई धांधली में शामिल लोगों को बचाने का प्रयास किए जाने की जानकारी के बाद आईजी एचआर शर्मा ने पूरे मामले की फाइल तलब की है।
छह पते से किए गए थे आवेदन
पासपोर्ट बनवाने के लिए छह पते का इस्तेमाल किया गया था। जीआरडी गेट के पते पर आठ, चंडी भवन के पते पर चार, दुर्गा भवन के पते पर सात, कूड़ाघाट के पते पर तीन, यादव निवास के पते पर चार और जगरनाथ भवन के पते पर दो लोगों का पासपोर्ट जारी किया गया। इन पते पर 53 नेपाली नागरिकों ने आवेदन किए थे जिनमें 36 लोगों को निवासी बताते हुए पासपोर्ट जारी करने की संस्तुति पुलिस और एलआईयू के अफसरों ने की थी।
मानव तस्करी की जताई जा रही आशंका
फर्जी दस्तावेज पर पासपोर्ट बनवाने नेपाली नागरिक छह साल से लापता हैं। जालसाजी सामने आने के बाद मामले की छानबीन कर रहे पुलिस और एलआईयू के अफसरों को इनके बारे में अब तक कोई जानकारी नहीं मिल पाई है। पासपोर्ट धारकों में महिलाओं की संख्या अधिक होने के कारण इसे मानव तस्करी से जोड़कर देखा जा रहा है। कुल 53 नेपाली नागरिकों ने आवेदन किए थे, जिसमें 36 लोगों को पासपोर्ट जारी करने की संस्तुति पुलिस और एलआईयू के अफसरों ने की है। इनमें महिलाओं की संख्या 32 है। महिलाओं की संख्या अधिक होने के कारण पूरे मामले को मानव तस्करी से जोड़कर देखा जा रहा है। इस मामले में एसपी ग्रामीण की जांच में वर्ष 2005 से 2009 के बीच कैंट और शाहपुर थाने के प्रभारी रहे चार दरोगा और 10 सिपाही दोषी मिले हैं, जिन पर विभागीय कार्रवाई होनी है।