एक वार का हकदार नहीं था 'दुबे', अब उस गठजोड़ की अधूरी कहानी कौन पूरी करेगा: पूर्व आईपीएस यशोवर्धन आजाद
यहां चार बातें स्पष्ट हो रही हैं। पहली, क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम टूटा हुआ है। दूसरा, नौकरशाही अपनी राह से भटक चुकी है। तीसरा, टूटा हुआ पुलिस तंत्र है और चौथा, सरकार अनदेखी कर रही है...
विस्तार
आईबी के पूर्व स्पेशल डायरेक्टर एवं कैबिनेट सचिवालय में सेक्रेटरी (सिक्योरिटी) के पद से रिटायर हुए और बाद में जिन्हें केंद्रीय सूचना आयुक्त के पद पर नियुक्त किया गया। आईपीएस यशोवर्धन आजाद 'विकास दुबे' को लेकर कहते हैं कि वह एक वार का हकदार नहीं था। उसका जीवित रहना जरूरी था, उससे लंबी पूछताछ कर अपराध की परतें खंगाली जाती।
नौकरशाही, पुलिस और राजनीति के गठजोड़ का पता चलता। इन तीनों की जड़ें आपस में कहां तक उलझी हैं, ये सब बातें विकास से पूछताछ करने के बाद ही बाहर आ सकती थीं। अब उसका एनकाउंटर हो गया तो 'गठजोड़' की वह कहानी भी अधूरी रह गई। सवाल है कि अब उस कहानी को पूरा कौन करेगा।
अमर उजाला डॉट कॉम के साथ एक विशेष बातचीत में यशोवर्धन आजाद बोले, जब एक आदमी कानपुर से उज्जैन पहुंचकर सरेंडर करता है, और उसके बाद वह पुलिस की पकड़ से भागने का प्रयास करे, यह कुछ अजीब सा है।
विकास दुबे, कोर्ट से सजा पाने का हकदार था। सुप्रीम कोर्ट ने एनकाउंटर के केसों की निष्पक्षता से जांच करने की बात कही है। देखिये, अब क्या होता है। बतौर आजाद, मेरा मानना है कि अगर इस मामले की जांच होती तो काफी कुछ चीजें बाहर निकल सकती थीं।
व्यवस्था के विभिन्न अंगों के बीच चल रहे गठजोड़ का पता चल सकता था। दुबे तो नब्बे से ही अपराध की दुनिया में आगे बढ़ रहा था। 2001 में उसने एक नेता की हत्या कर दी, तो यह अहसास हुआ कि उसे व्यवस्था का पूर्ण समर्थन हासिल था।
हम इसमें किसी एक पार्टी को ही क्यों शामिल करें, सभी दलों का वह चहेता बना रहा। ऐसे में उसका पकड़ा जाना बहुत जरूरी था। दुबे से पूछताछ कर बार-बार उस पर वार किए जाने थे।
इन सवालों का जवाब अब कौन देगा
यशोवर्धन आजाद ने कहा, दुबे ने कहां-कहां पर अपराध किया, जमीन हड़पी और दूसरे गैर-कानूनी कार्य किए, इन सबका तो पता है। बड़ी बात यह है कि इन सबके पीछे जो नापाक गठजोड़ रहा है, उसके बारे में अब कौन बताएगा।
क्या कोई आदमी खुद सामने आकर यह कहेगा कि हां, मैं दुबे के साथ था। मैने फलां अपराध में उसकी मदद की थी। पुलिस और राजनीति के गठजोड़ की तस्वीर का अहम पहलू तो अब छूट ही जाएगा। दुबे के एनकाउंटर ने बता दिया है कि हमारी व्यवस्था किस ओर जा रही है।
यहां चार बातें स्पष्ट हो रही हैं। पहली, क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम टूटा हुआ है। दूसरा, नौकरशाही अपनी राह से भटक चुकी है। तीसरा, टूटा हुआ पुलिस तंत्र है और चौथा, सरकार अनदेखी कर रही है।
चुनाव के दौरान अव्यवस्था फैलाने के लिए दुबे जैसे लोगों की मदद कौन लेता है। इस सवाल का जवाब सभी जानते हैं।
कठोर इच्छाशक्ति दिखाते हुए आगे बढ़ना होगा
मुख्यमंत्री के पद पर बैठे लोगों को ऐसे अपराधिक मामलों में कठोर इच्छाशक्ति दिखानी होगी। मुख्यमंत्री को सब मालूम होता है कि किस पार्टी में कितने 'विकास दुबे' हैं। केवल पुलिस तंत्र या नौकरशाही पर भरोसा कर लेना पर्याप्त नहीं है।
राजनीतिक लोगों को ऐसे अपराधियों के खिलाफ कठोर इच्छाशक्ति दिखानी होगी। जब तक यह संभव नहीं होगा, तब तक विकास दुबे जैसे लोग हमारी व्यवस्था में लंबे समय तक अपनी उपस्थिति दर्ज कराते रहेंगे।
पुलिस पर कार्रवाई कर दो, गाज गिरा दो, यह नाकाफी है। वे राजनेता कहां हैं जो पुलिस से गैर-कानूनी काम करा रहे हैं। एनकाउंटर करो और सारे राज दफन। विकास दुबे से पूछताछ होती तो हो सकता था कि एक दो नहीं, कई बड़े राजनेताओं और नौकरशाहों के नाम सामने आते।
अब एक झटके में हुए एनकाउंटर से सब खत्म कर दिया। मतलब जो व्यवस्था लंबे समय से गलत ट्रैक पर जा रही थी, उसे दोबारा से रास्ता दे दिया गया। विकास दुबे, पुलिस के एनकाउंटर में नहीं, बल्कि अदालत के आदेश से सजा पाने का हकदार था।