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सुप्रीम कोर्ट अपडेट्स: विशेषज्ञ निकाय तय करेगा कानून की पढ़ाई कितने दिन की हो, सर्वोच्च न्यायालय की टिप्पणी
Wed, 09 Sep 2026 06:06 AM IST
नितिन गौतम
न्यूज डेस्क, अमर उजाला
न्यूज डेस्क, अमर उजाला
Published by: नितिन गौतम
Updated Wed, 09 Sep 2026 06:06 AM IST
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सुप्रीम कोर्ट
- फोटो : ANI
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कानून की पढ़ाई कितनी दिन की होनी चाहिए यह मुद्दा गंभीर है। इसके निर्धारण के लिए एक विशेषज्ञ निकाय होना चाहिए। शीर्ष कोर्ट कानून के पाठ्यक्रम व एलएलबी-एलएलएम कोर्स की अवधि की समीक्षा के लिए शिक्षा आयोग गठित करने की मांग वाली याचिका पर सुनवाई कर रही थी।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या टिप्पणी की?
सीजेआई जस्टिस सूर्यकांत की पीठ ने कहा, यह विशेषज्ञ निकायों का दौर है और कानूनी शिक्षा के लिए भी एक विशेषज्ञ निकाय होना चाहिए। इस मामले में केंद्र सरकार की महत्वपूर्ण भूमिका है और उसे इस पर कोई पहल करनी चाहिए। अधिवक्ता अश्विनी कुमार उपाध्याय की याचिका में कहा गया है कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) 2020 सभी पेशेवर और अकादमिक पाठ्यक्रमों में चार वर्षीय स्नातक पाठ्यक्रम को बढ़ावा देती है, लेकिन बार काउंसिल ऑफ इंडिया ने एलएलबी और एलएलएम के मौजूदा पाठ्यक्रम, सिलेबस और अवधि की समीक्षा के लिए उचित कदम नहीं उठाए हैं। याचिका में दावा किया गया है कि पांच वर्षीय बीए-एलएलबी और बीबीए-एलएलबी पाठ्यक्रम की अवधि पाठ्यक्रम सामग्री के अनुपात में अधिक है। इसके कारण छात्रों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ता है।
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सुप्रीम कोर्ट ने क्या टिप्पणी की?
सीजेआई जस्टिस सूर्यकांत की पीठ ने कहा, यह विशेषज्ञ निकायों का दौर है और कानूनी शिक्षा के लिए भी एक विशेषज्ञ निकाय होना चाहिए। इस मामले में केंद्र सरकार की महत्वपूर्ण भूमिका है और उसे इस पर कोई पहल करनी चाहिए। अधिवक्ता अश्विनी कुमार उपाध्याय की याचिका में कहा गया है कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) 2020 सभी पेशेवर और अकादमिक पाठ्यक्रमों में चार वर्षीय स्नातक पाठ्यक्रम को बढ़ावा देती है, लेकिन बार काउंसिल ऑफ इंडिया ने एलएलबी और एलएलएम के मौजूदा पाठ्यक्रम, सिलेबस और अवधि की समीक्षा के लिए उचित कदम नहीं उठाए हैं। याचिका में दावा किया गया है कि पांच वर्षीय बीए-एलएलबी और बीबीए-एलएलबी पाठ्यक्रम की अवधि पाठ्यक्रम सामग्री के अनुपात में अधिक है। इसके कारण छात्रों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ता है।
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'अयोग्य शिक्षक भर्ती कर पीढ़ियों को बर्बाद न करें'
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को एक अंतरिम आदेश में स्कूलों व कॉलेजों में अयोग्य शिक्षकों की नियुक्ति या समायोजन पर रोक लगा दी है। कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि ऐसी व्यवस्था से पीढ़ियों का भविष्य बर्बाद हो जाएगा। इसलिए, शिक्षा के अधिकार अधिनियम 2009, राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद अधिनियम 1993 और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग अधिनियम 1956 के तहत निर्धारित न्यूनतम योग्यता के बिना कोई भी शिक्षक नियुक्त नहीं होगा।
मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची व जस्टिस वी मोहना की पीठ ने यह आदेश असम शिक्षा (शिक्षकों की सेवाओं का प्रांतीयकरण व शैक्षणिक संस्थानों का पुनर्गठन) अधिनियम 2017 से जुड़ी जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान पारित किया। याचिका में आरोप लगाया गया था कि वेंचर शिक्षण संस्थानों के शिक्षकों और कर्मियों के प्रांतीयकरण की योजना बिना निष्पक्ष, पारदर्शी व प्रतिस्पर्धी भर्ती प्रक्रिया के अयोग्य व्यक्तियों को सरकारी सेवा में प्रवेश की अनुमति देती है, जो संविधान के अनुच्छेद 14, 16, 21ए व 254 का उल्लंघन है। इस पर मुख्य न्यायाधीश ने कहा, अयोग्य लोगों को नियुक्त क्यों कर रहे हैं? छात्रों के भविष्य से कैसे खिलवाड़ कर रहे हैं?
ट्यूटर कहकर बदली जा रही मुकदमेबाजी: याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता रंजीत कुमार ने बताया, अब इन्हें ‘ट्यूटर’ कहकर मुकदमेबाजी बदली जा रही है, जिससे शिक्षा की गुणवत्ता प्रभावित हो रही है। याचिका में उन प्रावधानों को असांविधानिक घोषित करने की मांग की गई है, जो न्यूनतम योग्यता के बिना प्रांतीयकरण की अनुमति देते हैं।
मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची व जस्टिस वी मोहना की पीठ ने यह आदेश असम शिक्षा (शिक्षकों की सेवाओं का प्रांतीयकरण व शैक्षणिक संस्थानों का पुनर्गठन) अधिनियम 2017 से जुड़ी जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान पारित किया। याचिका में आरोप लगाया गया था कि वेंचर शिक्षण संस्थानों के शिक्षकों और कर्मियों के प्रांतीयकरण की योजना बिना निष्पक्ष, पारदर्शी व प्रतिस्पर्धी भर्ती प्रक्रिया के अयोग्य व्यक्तियों को सरकारी सेवा में प्रवेश की अनुमति देती है, जो संविधान के अनुच्छेद 14, 16, 21ए व 254 का उल्लंघन है। इस पर मुख्य न्यायाधीश ने कहा, अयोग्य लोगों को नियुक्त क्यों कर रहे हैं? छात्रों के भविष्य से कैसे खिलवाड़ कर रहे हैं?
ट्यूटर कहकर बदली जा रही मुकदमेबाजी: याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता रंजीत कुमार ने बताया, अब इन्हें ‘ट्यूटर’ कहकर मुकदमेबाजी बदली जा रही है, जिससे शिक्षा की गुणवत्ता प्रभावित हो रही है। याचिका में उन प्रावधानों को असांविधानिक घोषित करने की मांग की गई है, जो न्यूनतम योग्यता के बिना प्रांतीयकरण की अनुमति देते हैं।