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अयोध्या का संवरे पर्यटन तो चैन से रहे हर तन-मन

Mon, 16 Jan 2017 10:07 PM IST
फैजाबाद
फैजाबाद Updated Mon, 16 Jan 2017 10:07 PM IST
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Amar ujala Focus group
फैजाबाद में सोमवार को अमर उजाला संवाद कार्यक्रम में मौजूद जिले के प्रबुद्धजन। - फोटो : अमर उजाला
जहां अयोध्या जैसी धर्मनगरी हो, सरयू जैसी पतित पावनी हो.. वहां भ्रष्ट, ठेकेदार, अविवेकी और जनता की जगह खुद का विकास करने वाला विधायक नहीं होना चाहिए। बीते पांच साल ही नहीं, आजादी के इतने दशक बाद भी सिर्फ अयोध्या में पर्यटन उद्योग संवर गया होता तो यहां हर साल आने वाले करोड़ों भक्तों से किसी को रोजगार की फिक्र नहीं रहती।
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वर्तमान स्याह सियासी परिदृश्य लोकतंत्र के लिए खतरे की घंटी है, इसके लिए कहीं न कहीं हम सब जिम्मेदार हैं। जरूरत है सवाल उठाएं तो समाधान भी ढूंढें। अपने अंदर, घर-परिवार और समाज से जेब भरने व आपराधिक प्रवृत्ति वाले प्रत्याशियों को खुलकर खारिज करें। युवाओं को प्रोत्साहित करें कि पथ प्रदर्शक की भूमिका निभाएं, सबकी जरूरतों को समझें और साकार करें। 
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यह वैचारिक ऊर्जा से भरा माहौल सोमवार को विधानसभा चुनाव के मद्देनजर अमर उजाला के फोकस ग्रुप में प्रबुद्धजनों की ओर से जनप्रतिनिधियों के चयन पर मंथन के दौरान सामने आया। अमर उजाला कार्यालय में करीब डेढ़ घंटे चले संवाद में प्रबुद्धजनों ने एक स्वर से व्यापक चुनाव सुधार की वकालत की।
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विकास के सवाल पर अयोध्या का नाम और उसकी सियासत मुद्दा बना। सवाल उठे कि आजादी के इतने साल बाद धर्मनगरी का पर्यटन संवर क्यों नहीं रहा? कइयों ने जोड़ा कि अयोध्या के साथ फैजाबाद को बसाने वाले नवाबों के विकास की ऐतिहासिकता व इबारत भी आगे बढ़े। 

विमर्श के दौरान कहा गया कि जनप्रतिनिधियों की सोच समाज के विकास के बजाय खुद के विकास की हो गई है। ऐसे में जिस पार्टी का घोषणा पत्र बेहतर हो, सबको साथ लेकर चलने वाला हो, सूबे के विकास की सोच वाला हो, उसे ही जनता को चुनना चाहिए।

लेकिन यह भी देखना होगा कि वादे हैं वादों का क्या? ऐसे चरित्र वाली पार्टी व नेता से परहेज जरूर करें। मतदान के महत्व को सभी ने सराहा, कहा कि अधिकाधिक मतदान से ही हम देश, समाज व आने वाली पीढ़ी को बेहतर भविष्य की इबारत लिख सकते हैं।

संवाद में शेरो-शायरी भी खूब छाई रही, किसी ने कहा कि जब किश्ती साबितो-साहिल थी, साहिल की तमन्ना किसको थी...तो किसी ने सुनाया कि मैं उम्मीद नाम की लाइलाज बीमारी हूं, जो मरने के बाद भी कायम रहेगी..।


आज के माहौल पर कहा गया कि दरिया में तलातुम हो तो बच सकती है कश्ती, कश्ती में तलातुम हो तो साहिल न मिलेगा। अंत में दुष्यंत कुमार की कविता छा गई कि ‘कौैन कहता है कि आसमां में सुराख नहीं हो सकता, एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारों’।
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