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Ayodhya News: रामायण के प्रसंगों से सजे दुर्लभ चित्रित वस्त्र का हुआ संरक्षण

Fri, 16 Oct 2026 12:39 AM IST
लखनऊ ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, अयोध्या
संवाद न्यूज एजेंसी, अयोध्या Updated Fri, 16 Oct 2026 12:39 AM IST
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Conservation of a rare painted textile has been carried out
संर​क्षित की गई 18वीं शताब्दी की कलाकृति।
अयोध्या। रामायण के प्रसंगों को वस्त्र पर उकेरने वाली भारतीय कलमकारी परंपरा की 18वीं शताब्दी की दुर्लभ धरोहर को नया जीवन मिला है। अंतरराष्ट्रीय रामकथा संग्रहालय एवं श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के संग्रह में शामिल करीब 17 फीट लंबी और आठ फीट चौड़ी इस कलमकारी चित्रकृति का समय के साथ काफी क्षरण हो गया था। इसकी ऐतिहासिक और कलात्मक महत्ता को देखते हुए संरक्षण बड़ी चुनौती था। विशेषज्ञों की टीम ने इसका संरक्षण कर इसे प्रदर्शनी के लिए तैयार किया है।
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अंतरराष्ट्रीय रामकथा संग्रहालय के निदेशक डॉ. संजीव कुमार सिंह के निर्देशन में इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र (आईजीएनसीए), नई दिल्ली के प्रशिक्षित वस्त्र संरक्षकों के दल ने यह काम किया। संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार की स्वायत्त संस्था आईजीएनसीए के विशेषज्ञों ने संरक्षण के निर्धारित मानकों का पालन करते हुए इसके लिए विशेष अस्थायी हौज तैयार किया। वस्त्र की स्थिति को ध्यान में रखकर संरक्षण प्रक्रिया पूरी की गई, ताकि इसके मूल स्वरूप और कलात्मक विशेषताओं को सुरक्षित रखा जा सके।
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डॉ. संजीव के अनुसार, कलमकारी वस्त्र तैयार करने की प्रक्रिया भी जटिल होती है। इसमें वस्त्र की प्रारंभिक तैयारी, रेखांकन, प्राकृतिक रंगों का निर्माण, रंगाई और धुलाई सहित कई चरण शामिल होते हैं। पारंपरिक तकनीक के अनुसार, इनकी संख्या 17 से 23 तक हो सकती है। आज भी साड़ियों, दुपट्टों और सूती सहित अन्य पारंपरिक वस्त्रों पर कलमकारी चित्रांकन की मांग है।
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18वीं शताब्दी की इस विशाल कलमकारी का संरक्षण केवल पुराने वस्त्र को सुरक्षित करना नहीं, बल्कि रामायण के चित्रात्मक आख्यान और भारतीय पारंपरिक कला की विरासत को अगली पीढ़ियों तक पहुंचाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।


रामायण के प्रसंगों को वस्त्र पर उकेरने की परंपरा
डॉ. संजीव के अनुसार, कलमकारी भारतीय हस्तशिल्प और कथा-वाचन की समृद्ध परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा है। दक्षिण भारत के आंध्र क्षेत्र में विकसित इस चित्रांकन शैली के दो प्रमुख केंद्र श्रीकालाहस्ती और मछलीपट्टनम रहे हैं। श्रीकालाहस्ती शैली में बांस की कलम और प्राकृतिक रंगों से कपड़े पर मुक्तहस्त चित्र बनाए जाते हैं, जबकि मछलीपट्टनम शैली में लकड़ी के ठप्पों से चित्रांकन किया जाता है। रामायण के प्रसंग इस कला के प्रमुख विषय रहे हैं। इनमें पुत्रकामेष्टि यज्ञ, सीता स्वयंवर, पंचवटी, सुंदरकांड, राम-रावण युद्ध और श्रीराम के राज्याभिषेक जैसे प्रसंगों को वस्त्र पर उकेरा गया है।
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