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अरहर के पत्ते पानी से फ्लोराइड हटाने में होंगे कारगर : शोध
Thu, 22 Oct 2026 11:23 PM IST
लखनऊ ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, अयोध्या
संवाद न्यूज एजेंसी, अयोध्या
Updated Thu, 22 Oct 2026 11:23 PM IST
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अयोध्या। पानी में घुले फ्लोराइड को हटाने के लिए अरहर के पत्तों से तैयार विशेष सामग्री कारगर हो सकती है। डॉ. राममनोहर लोहिया अवध विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने अरहर के पत्तों से आयरन युक्त जैव-अवशोषक तैयार कर पानी से फ्लोराइड हटाने की क्षमता का अध्ययन किया है। प्रयोगों में तीन ग्राम प्रति लीटर जैव-अवशोषक की मात्रा और 150 मिनट का संपर्क समय अनुकूल पाया गया।
फ्लोराइड मिट्टी और चट्टानों से घुलकर भूजल में पहुंचता है। इसकी अधिक मात्रा वाला पानी लंबे समय तक पीने से दांतों पर धब्बे पड़ने और हड्डियों से जुड़ी फ्लोरोसिस बीमारी का खतरा रहता है। शोध में अरहर के पत्तों से तैयार सामग्री में आयरन का इस्तेमाल किया गया। इसे 500 डिग्री सेल्सियस तापमान पर मफल फर्नेस में तैयार किया गया। इसके बाद पानी में मौजूद फ्लोराइड को सोखने की क्षमता का परीक्षण किया गया। जैव-अवशोषक अपनी सतह पर फ्लोराइड को पकड़ता है, जिससे उसे पानी से अलग करने में मदद मिलती है।
अध्ययन में जैव-अवशोषक की मात्रा और पानी के संपर्क में रहने की अवधि का आकलन किया गया। प्रयोगों में तीन ग्राम प्रति लीटर जैव-अवशोषक और 150 मिनट का संपर्क समय अनुकूल पाया गया। शोधकर्ताओं ने सामग्री को दोबारा तैयार कर चार चक्रों तक इस्तेमाल करने की संभावना भी परखी। यह शोध 2025 में शुरू किया गया था।
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सात शोधकर्ताओं ने किया अध्ययन
शोध में नवीन पटेल, सांतनु मलीक, सौरभ कुमार, बृजेश कुमार यादव, आकांक्षा पटेल, विनोद कुमार चौधरी और अरुण लाल श्रीवास्तव शामिल हैं। इनमें पांच शोधकर्ता अवध विश्वविद्यालय के पर्यावरण विज्ञान विभाग से संबद्ध हैं। सांतनु मलीक पोर्निमा कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग और अरुण लाल श्रीवास्तव चितकारा विश्वविद्यालय से संबद्ध हैं। शोधकर्ताओं ने फ्लोराइड हटाने की प्रक्रिया, उसकी गति और उसे प्रभावित करने वाले कारकों का अध्ययन किया।
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फ्लोराइड मिट्टी और चट्टानों से घुलकर भूजल में पहुंचता है। इसकी अधिक मात्रा वाला पानी लंबे समय तक पीने से दांतों पर धब्बे पड़ने और हड्डियों से जुड़ी फ्लोरोसिस बीमारी का खतरा रहता है। शोध में अरहर के पत्तों से तैयार सामग्री में आयरन का इस्तेमाल किया गया। इसे 500 डिग्री सेल्सियस तापमान पर मफल फर्नेस में तैयार किया गया। इसके बाद पानी में मौजूद फ्लोराइड को सोखने की क्षमता का परीक्षण किया गया। जैव-अवशोषक अपनी सतह पर फ्लोराइड को पकड़ता है, जिससे उसे पानी से अलग करने में मदद मिलती है।
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अध्ययन में जैव-अवशोषक की मात्रा और पानी के संपर्क में रहने की अवधि का आकलन किया गया। प्रयोगों में तीन ग्राम प्रति लीटर जैव-अवशोषक और 150 मिनट का संपर्क समय अनुकूल पाया गया। शोधकर्ताओं ने सामग्री को दोबारा तैयार कर चार चक्रों तक इस्तेमाल करने की संभावना भी परखी। यह शोध 2025 में शुरू किया गया था।
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सात शोधकर्ताओं ने किया अध्ययन
शोध में नवीन पटेल, सांतनु मलीक, सौरभ कुमार, बृजेश कुमार यादव, आकांक्षा पटेल, विनोद कुमार चौधरी और अरुण लाल श्रीवास्तव शामिल हैं। इनमें पांच शोधकर्ता अवध विश्वविद्यालय के पर्यावरण विज्ञान विभाग से संबद्ध हैं। सांतनु मलीक पोर्निमा कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग और अरुण लाल श्रीवास्तव चितकारा विश्वविद्यालय से संबद्ध हैं। शोधकर्ताओं ने फ्लोराइड हटाने की प्रक्रिया, उसकी गति और उसे प्रभावित करने वाले कारकों का अध्ययन किया।