एशियन गेम्स में गोल्ड जीत सकती हैं भारत की बेटियां, जापान से चुनौती मुमकिन
पूर्व ओलंपियन और 1997-98 में महिला टीम के कोच रहे कर्नल बलबीर सिंह कुलार कहते हैं कि लंदन में भारत की लड़कियों ने यदि आयरलैंड के खिलाफ गुरुवार को उसके खिलाफ पूल मैच की धार दिखाई होती तो वह शूटआउट में हारने के बजाय जीत दर्ज कर 44 बरस पुराने इतिहास को दोहराती। साथ-साथ फाइनल में भी पहुंचती।
दक्षिण कोरिया, चीन और जापान जैसी एशियाई टीमों में भारतीय टीम अकेली ऐसी टीम रही, जो महिला विश्व कप के क्वॉर्टर फाइनल में पहुंच पाई। भारत की लड़कियों के विश्व कप के प्रदर्शन ने दिखाया कि वह अब जकार्ता एशियाई खेलों में स्वर्ण पदक पाने का दम है।
एशियाई खेलों में भारत की लड़कियों को दक्षिण कोरिया और चीन से पार पाने में कोई दिक्कत नहीं होगी हां उसे थोड़ी बहुत चुनौती बस जापान की लड़कियों से ही मिल सकती है। भारत की लड़कियों ने एशियाई टीमों में तो खुद को सर्वश्रेष्ठ साबित किया ही है उन्होंने इस महिला हॉकी विश्व कप में यह दर्शाया कि नीदरलैंड और ऑस्ट्रेलिया को छोड़ कर दुनिया की किसी भी टीम से पार पाने का दम रखती हैं।
भारतीय महिला टीम यदि सेमीफाइनल में पहुंचती तो वह तब स्पेन से पार पाने का दम रखती थी क्योंकि वह अतीत में ऐसा कर चुकी है।
वह कहते हैं, 'रानी रामपाल, वंदना कटारिया, ललरेमसियामी और नवजोत कौर जैसी फॉरवर्ड के साथ भारत के पास रक्षापंक्ति में सुनीता लाकड़ा, दीपग्रेस एक्का, गुरजीत कौर और गोलरक्षक उपकप्तान सविता पूनिया के रूप में बेहतरीन रक्षापंक्ति है। भारत की अग्रिम पंक्ति में रानी, वंदना और ललरेमसियामी को गोल के अभियान बनाने के साथ खासतौर पर शूटआउट में वन टू वन में ड्रिबल का बेहतर और चतुर उपयोग करने की दरकार है, जिससे 25 गज की रेखा से 8 सेकेंड के भीतर गोलरक्षक को छका गोल करने के मौके ज्यादा रहे।
भारतीय लड़कियों के साथ पहले हरेन्द्र सिंह और अब सोएर्ड मराइन जैसे हॉकी उस्ताद के साथ पूरे स्पोर्ट स्टाफ ने बहुत मेहनत की है। ये दोनों बतौर कोच इन भारतीय लड़कियों को यह समझाने में कामयाब रहे हैं कि फॉरवर्ड की जितनी जिम्मेदारी गोल करने की है उतनी टीम पर हमले के वक्त पीछे आकर बचाव में रक्षापंक्ति की मदद करने की भी है।
दिलीप टिर्की ने क्या कहा
भारत के पूर्व कप्तान और पूर्व सांसद दिलीप टिर्की कहते हैं कि भारतीय लड़कियां के लंदन महिला हॉकी विश्व कप के क्वॉर्टर फाइनल में हारने का यह सबसे बड़ा सबक है कि उसे शूटआउट में गोल करने के लिए वन टू वन स्थिति में 25 गज की रेखा से आठ सेकंड के भीतर गोल करने के लिए बेहतर ड्रिबल की जरूरत है।
वह कहते हैं, 'मुझे गोलरक्षक सविता पूनिया के शूटआउट के शुरू में दो बेहतर बचावों के बावजूद रानी रामपाल, मोनिका मलिक और नवजोत कौर के गोल करने के मौके चूकने का इसलिए बेहद अफसोस है कि हमारी लड़कियां इसके चलते सेमीफाइनल में स्थान बनाने और इतिहास दोहराने से चूक गईं। हमारी रक्षापंक्ति ने बेहद मुस्तैद खेल दिखाया। हमारी लड़कियों ने दिखाया कि एशिया में वे सबसे बेहतर हैं लेकिन दुनिया की शीर्ष टीमों का मुकाबला करने के लिए उन्हें उन्हें अभी और मेहनत करने की जरूरत है। एशियाई खेलों में भारत को सुनहरी कामयाबी हासिल करने में जरूर दिक्कत नहीं आनी चाहिए। हमारी लड़कियों ड्रिबल और मैदानी गोल करने पर पर वन टू वन की स्थिति में बेहतर सूझबूझ की जरूरत है। साथ ही पेनल्टी कॉर्नर पर इनडायरेक्ट गोल करने की राह भी तलाशनी होगी क्योंकि ड्रैग फ्लिकर के रूप में भारत के पास अकेली गुरजीत कौर हूं।’