हॉकी में जो कुछ हूं, माता-पिता और रानी दीदी के भरोसे बदौलत : ललरेमसियामी
देश के पूर्वोत्तर में मिजोरम के अनजान से गांव कोलासिब से आकर मात्र 19 बरस की उम्र में भारतीय महिला हॉकी टीम के तुरुप की स्ट्राइकर बनने की ललरेमसियामी की कहानी देश की बेटियों के शिखर पर अपना परचम लहराने की प्रेरक कहानी है। ललेरमसियामी के बहुत कम उम्र में संघर्ष कर खुद के की ही नहीं भारत का दुनिया में हॉकी में नाम करने की कहानी भारतीय महिला टीम की मौजूदा कप्तान रानी रामपाल से बहुत मिलती जुलती है।
रानी के गरीब परिवार से आकर भारत की कप्तान और स्टार स्ट्राइकर की कहानी को दोहराने का दम अब टीम की सखियों में 'सियामी’ के नाम से जाने वाली ललरेमसियामी में है। कोलासिब के गरीब किसान ललथनसांगा और ललजरमावी की छह बेटियों और दो बेटों में मंझली ललरेमसियामी की प्रतिभा को संवारने में जूनियर टीम के शिविर में हॉकी उस्ताद बलजीत सिंह सैनी ने अहम भूमिका निभाई। शुएर्ड मराइन ने उन्हें सीनियर भारतीय टीम महिला हॉकी टीम में चुना और फिर वह हरेन्द्र सिंह के मार्गदर्शन में खेली। रानी ने ललरेमसियामी को हिंदी सिखा उनका हिंदी संवाद बेहतर कराया। रानी ने सियामी की पैसे से बराबर मदद की।
ललरेमसियामी 2018 में इंग्लैंड में हुए महिला विश्व कप में अपने तेज फर्राटों से गोल करने के कारण ऐसी सुर्खियों आईं। अब भुवनेश्वर में नवंबर,2019 में अमेरिका के खिलाफ ओलंपिक क्वॉलिफायर्स में ललरेमसियामी भारत के हमलों की सूत्रधार रहने वाली हैं। अब तक 56 मैच खेल कर वह भारत के लिए 17 गोल कर चुकी हैं। वह शुरू में 2016 में भारत की लड़कियों के अंडर 18 एशिया कप टीम के लिए चुनी गई।
ललरेमसियामी ने हॉकी की अब तक की कामयाब यात्रा को 'अमर उजाला’ के साथ साझा किया। वह बताती हैं, मैं मिजोरम के अनजान से गांव कोलासिब की हूं। मेरे पिता ललथनसांगा किसान थे और मेरी मां ललजरमावी खेती में उनकी मदद करती थीं। हॉकी में जो कुछ भी हूं अपनी माता-पिता और भारतीय टीम की कप्तान रानी (रामपाल) दीदी के भरोसे स्त्रर मार्गदर्शन की बदौलत ही हूं। 'दीदी लोग’ चाहे वह रानी हों, वंदना, सविता या फिर दीप ग्रेस एक्का , सभी मुझे हमेशा मैदान पर खुल कर बेखौफ और आक्रामक खेल को प्रेरित करती हैं।
इंग्लैंड में ब्रिटेन के खिलाफ उसके घर में पांच टेस्ट मैच की सीरीज से हम खुद को अमेरिका के खिलाफ ओलंपिक क्वॉलिफायर्स के लिए बेहतर तैयारी कर सकेंगी। मुझे भारत के भुवनेश्वर में अमेरिका से ओलंपिक क्वॉलिफायर्स के दोनों मैच जीत कर टोक्यो ओलंपिक के लिए क्वॉलिफाई करने का भरोसा है।
हिरोशिमा में एफआईएच सीरीज फाइनल्स के सेमीफाइनल से पहले मेरे पिता ललथनसांगा का दिल का दौरा पडने से निधन हो गया। तब रानी और सविता दीदी के साथ पूरी भारतीय टीम और चीफ कोच शुएर्ड मराइन ने मुझे ढांढ़स बढ़ाया। मैं सेमीफाइनल और फाइनल में खेली और भारत को एफआईएच सीरीज फाइनल्स जिता कर ओलंपिक क्वॉलिफायर्स में जगह बनाने में योगदान किया।’
तब मां ने डिब्बे में जोड़ पैसे मुझे देकर दिल्ली भेजा
सियामी बताती हैं, मेरी मां ललजरमवी के पास बहुत पैसे कभी नहीं रहे। फिर भी दस, 20 या 30 रुपये जो भी वह बचा पाती एक डिब्बे में रख देती थी। जब दिल्ली में नैशनल हॉकी अकैडमी (एनएचए) के लिए मेरा चयन हो गया तो तब उन्होंने जो भी रुपये उनके पास थे वह जाते हुए मेरे हाथ पर रख दिए। मेरी मां और पिता ललथनसांगा को यह तो मालूम नहीं था कि हॉकी में मेरा भविष्य क्या है, फिर भी मेरे हॉकी जुनून को देखकर दोनों ने हॉकी खेलने के लिए बराबर प्रेरित किया। मैं आज जहां भी पहुंची हूं, इसी की बदौलत पहुंची हूं।
मैं नौकरी पाने के बाद परिवार की मदद करती हूं’
वह बताती हैं, हॉकी में भारत की सीनियर हॉकी टीम की नुमाइंदगी करने के बाद मुझे आरसीएफ कपूरथला में सीनियर क्लर्क की नौकरी मिल गई है। मेरे परिवार में अब मेरी मां ललजारमवी हैं। मेरे दोनों बड़े भाई इमैनुअल ललरमंगहका और ललरिनवमा गाड़ी चलाते हैं। मेरी बड़ी बहन ललवलमावी हैं और रेबेका ललतुहरेमी और उसके बाद मैं हूं। मेरे बाद मेरी तीन और छोटी बहने हैं: ललपियांगजोवी, ललहमुनसियामी और जोरमपानी। घर में खेती की जमीन थोड़ी है। ऐसे में अब मुझे आरसीएफ में जो नौकरी मिली है उससे मैं अब परविर की मदद करती हूं।