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भारतीय हॉकी: दद्दा की परंपरा को आगे बढ़ाया बलबीर ने, पाक ने भी किया सलाम

Wed, 27 May 2020 08:04 AM IST
संजीव कुमार झा स्पोर्ट्स डेस्क, अमर उजाला
स्पोर्ट्स डेस्क, अमर उजाला Published by: संजीव कुमार झा Updated Wed, 27 May 2020 08:04 AM IST
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After Major Dhyanchand, the hockey artist who carried on his tradition was Balbir Singh Dosanjh
Balbir singh dosanjh(file photo) - फोटो : पीटीआई

मेजर ध्यानचंद के बाद हॉकी के जिस कलाकार ने उनकी परंपरा को आगे बढ़ाया वह थे बलबीर सिंह दोसांझ। यह भी एक सुखद संयोग है कि भारतीय हॉकी टीम के लिए जो चार बलबीर थे उनमें बलबीर दोसांझ ही सबसे बड़े थे। बलबीर सिंह सीनियर एक कामयाब ओलंपियन होने के साथ कामयाब हॉकी कोच और मैनेजर भी रहे।

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मैदान पर वह ध्यानचंद की तरह एकदम साफ सुथरी हॉकी खेलने में यकीन करते थे। वह भी ध्यानचंद की तरह मैदान पर अपने प्रतिद्वंद्वी को अपने कौशल से ऐसा जवाब देते थे कि वह भी उनका मुरीद हो जाता था। बलबीर सीनियर ने भी ध्यानचंद की तरह भारत को लगातार तीन ओलंपिक में हॉकी में स्वर्ण पदक दिलाए। ध्यानचंद ने तीन ओलंपिक में 12 मैचों में 39 गोल किए। वहीं बलबीर सिंह ने तीन ओलंपिक के 8 मैचों में 22 गोल किए।
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एक संयोग यह भी दोनों ही बतौर सेंटर फॉरवर्ड भारतीय टीम में खेले। दोनों ने भारत को अपना लगातार तीसरा ओलंपिक स्वर्ण पदक बतौर कप्तान दिलाया। ध्यानचंद ने बतौर कप्तान 1936 में बर्लिन ओलंपिक में 31 बरस की उम्र में भारत को तीसरी बार खिताब जितवाने में अहम रोल अदा किया वहीं बलबीर ने 1956 मेलबर्न ओलंपिक में ऐसा किया।

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  • दोनों दिग्गजों में तुलना गैर वाजिब

 कुछ लोग भारतीय हॉकी के सुनहरे दौर के साक्षी नायकों में तुलना करने की भूल करते हैं। यह वाजिब नहीं है। इस बात में बहस की कोई गुंजाइश ही नहीं है कि ध्यानचंद दुनिया में हॉकी पर्याय हैं। दुनिया में आज भी भारतीय हॉकी की चर्चा ‘ध्यानचंद’ के हॉकी देश के रूप में होती है। ध्यानचंद दुनिया में हॉकी का उसी तरह पर्याय हैं, जिस तरह क्रिकेट में डॉन ब्रैडमैन और फुटबॉल में पेले हैं।


ऐसे में अगर कोई ध्यानचंद की हॉकी की बलबीर सिंह साहब या किसी अन्य से तुलना करना तो वह गैरवाजिब ही कही जाएगी। हकीकत यह है कि ध्यानचंद आजादी से पहले भारतीय हाक़ी के दद्दा थे तो बलबीर सिंह सीनियर साहब आजाद भारत की भारतीय हॉकी के दद्दा थे।

  • दद्दा को देखकर सीखी थी हॉकी

 बलबीर सिंह सीनियर जब 12 बरस के थे 1936 के बर्लिन ओलंपिक में हॉकी फाइनल की न्यूजरील में पहली बार ध्यानचंद का खेल देखा उनके ऐसे मुरीद हो गए कि उन्हें ही अपना आदर्श के रूप में देखने लगे थे। तभी बलबीर साहब ने यह ठान लिया वे हॉकी में वे कोशिश करेंगे कि ध्यानचंद की तरह की कामयाबी हासिल करें।

  • पाक ने भी किया सलाम

दिग्गज बलबीर सिंह के निधन को पाकिस्तान हॉकी समुदाय ने भी इसे उपमहाद्वीप में खेल के बड़े नुकसान के रूप में बयां किया है। पाकिस्तान के पूर्व कप्तान समीउल्लाह ने कहा कि उनके पास गजब की लोच, गति और कौशल था। जब वह गेंद लेकर बढ़ते तो देखते ही बनता था। उनके असाधारण खेल के कारण ही भारत ने लगातार तीन ओलंपिक स्वर्ण पदक जीते थे। पाक हॉकी संघ के महासचिव आसिफ बाजवा ने शोक प्रकट करते हुए कहा कि वह दिग्गजों में से एक थे।



उन्होंने कहा कि मैंने उन्हें खेलते तो नहीं देखा लेकिन उनके बारे में सीनियरों से सुना बहुत है कि अलग ही स्ट्राइकर थे। पूर्व कप्तान हसन सरदार ने कहा कि उनके किस्से सुनकर उन्हें बड़ी प्रेरणा मिली थी। पूर्व खिलाड़ी इस्लाहुद्दीन सिद्दिकी ने कहा, वह बेहद मृदृभाषी और मिलनसार थे। हॉकी की उन्हें गहरी समझ थी। वह अपने अनुभव को साझा करने में हिचकिचाते नहीं थे। जब भारत ने 1975 विश्व कप में भारत ने पाकिस्तान को हराया तब वहीं भारतीय टीम के मैनेजर थे।   

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