नहीं रहे ओलंपिक में भारत की कप्तानी करने वाले महान फुटबॉलर पीके बनर्जी
- निमोनिया के कारण श्वास की बीमारी से जूझ रहे थे
- 83 वर्षीय दिग्गज फुटबॉलर ने रात 12:40 मिनट पर ली आखिरी सांस
- 65 गोल दागे 12 साल के अपने अंतरराष्ट्रीय करिअर में 84 मैचों में
- 14 साल (1972 से 1986) तक राष्ट्रीय फुटबॉल टीम के कोच रहे
- 1999 में भारतीय फुटबॉल टीम के तकनीकी निदेशक बने थे
- 16 साल की उम्र में बिहार की ओर संतोष ट्रॉफी में पदार्पण किया था
- 54 रिकॉर्ड ट्रॉफियां कोचिंग करिअर के दौरान जीती
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विस्तार
भारत के दिग्गज फुटबॉलर पद्मश्री प्रदीप कुमार बनर्जी का शुक्रवार को लंबी बीमारी के बाद निधन हो गया। वह 83 वर्ष के थे। एशियाई खेलों (1962) के स्वर्ण पदक विजेता बनर्जी भारतीय फुटबॉल के स्वर्णिम दौर के साक्षी रहे हैं।
वह पिछले कुछ समय से निमोनिया के कारण श्वास की बीमारी से जूझ रहे थे। उन्हें पार्किंसन, दिल की बीमारी और डिम्नेशिया भी था। वह दो मार्च से अस्पताल में लाइफ सपोर्ट पर थे। उन्होंने शुक्रवार दोहपर 12:40 मिनट पर आखिरी सांस ली।
बनर्जी के परिवार में उनकी बेटी पाउला और पूर्णा हैं जो नामचीन शिक्षाविद् हैं। उनके छोटे भाई प्रसून बनर्जी तृणमूल कांग्रेस से सांसद हैं। राज्यपाल जगदीप धनखड़ और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के अलावा खेल जगत से जुड़ी कई हस्तियों ने उनके निधन पर गहरा शोक जताया है। 23 जून 1936 को जलपाईगुड़ी के बाहरी इलाके स्थित मोयनागुड़ी में जन्मे बनर्जी बंटवारे के बाद जमशेदपुर आ गए। उन्होंने भारत के लिए 84 मैचों में 65 गोल दागे हैं।
रोम ओलंपिक में की थी टीम की कप्तानी:
जकार्ता एशियाई खेल 1962 में स्वर्ण पदक जीतने वाले बनर्जी ने 1960 रोम ओलंपिक में भारत की कप्तानी। यही नहीं फ्रांस के खिलाफ एक-एक से ड्रॉ रहे मैच में बराबरी का गोल किया। इससे पहले वह 1956 की मेलबर्न ओलंपिक टीम में भी थे। क्वार्टर फाइनल में ऑस्ट्रेलिया पर 4-1 से मिली जीत में उन्होंने अहम भूमिका निभाई। टीम इसमें चौथे स्थान पर रही थी।
पूर्वी रेलवे के लिए खेले:
बनर्जी अपने करिअर में सिर्फ पूर्वी रेलवे के लिए ही खेले। उन्होंने कभी भी मोहन बागान और ईस्ट बंगाल की ओर से नहीं खेला। इन दो बड़े क्लबों की ओर से न खेलने के बारे में उनका यही उत्तर होता था चकरी चारले खाबो की (अगर खेलूंगा नहीं तो खाऊंगा क्या)।
भूख पेट की ट्रेनिंग
बनर्जी की जिंदगी में संघर्ष तो शुरू से ही था लेकिन पिता की मौत के बाद उनपर जिम्मेदारियों का बोझ भी आ गया। पर उन्होंने खेल नहीं छोड़ा। वह अक्सर खाली पेट ही ट्रेनिंग करते और खेलते। इसी खेल के दम पर उन्हें 15 साल की उम्र में अपनी पहली नौकरी मिल गई। उन्हें 135 रुपये के वेतन पर भारतीय केबल कंपनी में यह नौकरी मिली। इससे उनके परिवार को काफी मदद मिली। इसके बाद 1953 में वह भारतीय रेलवे में टिकट कलेक्टर बन गए। यहां उन्हें पिछली नौकरी के मुकाबले दो रुपये ज्यादा मिलने लगे।
1955 में किया भारत के लिए पर्दापण:
इस दौरान बनर्जी अपने खेल से नेशनल चयनकर्ताओं को प्रभावित तो कर ही चुके थे। उन्होंने 1954 में आर्यन और एक साल बाद पूर्वी रेलवे जॉइन कर ली। उनकी कप्तानी में रेलवे 1958 में कलकत्ता फुटबॉल लीग चैंपियन बना। इससे पहले बनर्जी ने 1955 में ढाका में हुए टूर्नामेंट में भारत की ओर से पर्दापण कर लिया था। यही से उनका ओलंपिक में ऐतिहासिक गोल दागने का सफर शुरू हुआ।
सम्मान जो मिले
- -में नवाजे गए थे पद्मश्री पुरस्कार से। अर्जुन (1961) अवॉर्ड से भी हो चुके हैं सम्मानित
- अंतरराष्ट्रीय फुटबॉल संघ ने उन्हें 20वीं शताब्दी में भारत का सबसे महान फुटबॉलर घोषित किया था
- फीफा ने 2004 में शताब्दी ऑर्डर ऑफ मेरिट प्रदान किया था
- ओलंपिक समिति की ओर से फेयर प्ले अवॉर्ड से सम्मानित एशिया के एकमात्र फुटबॉलर