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Samwad 2025: 'PM मोदी ने कहा था हम सभी मुक्केबाज हैं...', विजेंदर ने सुनाई मजेदार कहानी; निकहत ने कई राज खोले

Thu, 17 Apr 2025 05:04 PM IST
स्वप्निल शशांक स्पोर्ट्स डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ
स्पोर्ट्स डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ Published by: स्वप्निल शशांक Updated Thu, 17 Apr 2025 05:04 PM IST
सार

भारत के दो दिग्गज मुक्केबाज विजेंदर सिंह और निकहत जरीन भी लखनऊ में आयोजित अमर उजाला संवाद कार्यक्रम में पहुंचे और खेल और खिलाड़ियों को लेकर अपने विचार साझा किए। ये दोनों 'खिलाड़ियों की राह, आसान या मुश्किल' सत्र में लोगों को संबोधित करते दिखे। आइए जानते हैं दोनों ने अपने संघर्ष को लेकर क्या कहा....

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Amar Ujala Samwad 2025 Lucknow Boxers Vijender Singh and Nikhat Zareen Live Updates and Statement
अमर उजाला संवाद 2025 - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

लखनऊ में अमर उजाला संवाद 2025 कार्यक्रम जारी है। इसमें कई बड़ी हस्तियां पहुंच रही हैं। इसी कड़ी में भारत के दो दिग्गज मुक्केबाज विजेंदर सिंह और निकहत जरीन भी इस कार्यक्रम में पहुंचे। इन दोनों ने खेल और खिलाड़ियों को लेकर अपने विचार साझा किए। दोनों 'खिलाड़ियों की राह, आसान या मुश्किल' सत्र में लोगों को संबोधित किया। विजेंदर भारत के लिए मुक्केबाजी स्पर्धा में ओलंपिक पदक जीतने वाले पहले मुक्केबाज हैं। वहीं, निकहत जरीन दो बार विश्व चैंपियन रह चुकी हैं। आइए जानते हैं विजेंदर सिंह और निकहत जरीन के साथ अमर उजाला की बातचीत के प्रमुख अंशः
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सवाल: कैसा लग रहा लखनऊ में आकर?

विजेंदर: लखनऊ में हमारा स्वागत है। सुबह-सुबह जब हम पहुंचे तो एक बहुत अच्छी कहावत है कि मुस्कुराइए आप लखनऊ में हैं।

निकहत: मैं पहली बार लखनऊ आई हूं। मैंने बस लखनऊ को इंस्टाग्राम रील्स पर देखा है। लखनऊ के खाने वाला रील्स देखकर मेरा मन करता था कि मैं यहां आऊं। कल मुझे खाने का मौका मिला और मैं और इस जगह को एक्सप्लोर करना चाहती हूं।
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सवाल: छोटी उम्र से ही आपकी इस खेल में रुचि थी। ये मार-धाड़ का खेल है। कैसे आपका इस खेल में आना हुआ?

निकहत: ये लंबी कहानी है। शुरुआत में मैंने एथलेटिक्स से की थी। मैंने 100-200 मीटर स्प्रिंट में हिस्सा लिया था। मेरे पिता के साथ स्टेडियम जाती थी। वहां मैंने मुक्केबाजों को देखा था। वहां मुक्केबाज बॉक्सिंग बैग और पंचिंग बैग पर पंच कर रहे थे। फिर मैंने पिता से पूछा कि मुक्केबाजी क्या लड़के ही कर सकते लड़कियां नहीं कर सकतीं? इस पर मेरे पिता ने कहा, नहीं लड़कियां भी बॉक्सिंग कर सकती हैं, लेकिन हमारे सोसायटी को लगता है कि लड़कियां इस खेल को खेलने के लिए इतनी मजबूत नहीं हैं। मैं बचपन से ही बहुत जिद्दी रही हूं। लड़कों के साथ खेलना कूदना रहा है मेरा। मैंने अपने पापा से बोला कि मैं बॉक्सिंग करूंगी और सबको दिखाऊंगी कि लड़कियां भी बॉक्सिंग कर सकती हैं। 2009 में मैंने बॉक्सिंग शुरू की थी जब में 13 साल की थी। मुझे शुरू में बहुत मार पड़ी थी। मार तो अभी भी पड़ती है जब मैं लड़कों से फाइट करती हूं, लेकिन शुरू में इतनी मार पड़ी थी कि जब में एक प्रैक्टिस सेशन में थी, तो एक लड़के ने मुझे इतना मारा कि मेरे नाक से खून निकलने लगा। मेरी टी-शर्ट पर उसके दाग रह गए थे और मैं घर उसी हालत में गई थी। जब मेरी मां ने मुझे देखा तो रोने लग गई। उन्होंने कहा कि इसलिए मैं तुम्हें बॉक्सिंग में नहीं डाल रही थी। उन्होंने बोला तेरा चहरा खराब हो जाएगा तो शादी कौन करेगा? मैंने बोला मां टेंशन क्यों ले रही? नाम होगा तो दुल्हों की लाइन लग जाएगी।
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सवाल: आप एक सोसायटी से आती हो जहां बॉक्सिंग जैसे खेल को अलग तरीके से देखा जाता है। कभी आपको ताने नहीं मिले?

निकहत: कुछ नहीं बहुत ताने मिले थे। जब मैं पड़ोसी के साथ मुक्केबाजी के लिए जाती थी। हम चार बहनें हैं। मुझसे बड़ी दोनों बहनें फीजियोथेरेपिस्ट हैं। मेरे मम्मी पापा को बोला जाता था कि आपने अपनी बेटी को बॉक्सिंग में क्यों डाला। हमारी कम्यूनिटी में बॉक्सिंग की इजाजत नहीं है। बॉक्सिंग में हमें शॉर्ट्स पहनना पड़ता है, स्लीवलेस पहनना पड़ता है जो कि सही नहीं है। आपने ऐसा क्यों किया, आपको बेटी को मुक्केबाजी में नहीं डालना चाहिए था। आपकी इस बेटी की वजह से बड़ी बेटियों को रिश्ते मिलने बंद हो जाएंगे, लेकिन मेरे पापा ने किसी की नहीं सुनी। उन्होंने मुझे पहले दिन से सपोर्ट किया है और वह मुझे हमेशा एक ही बात कहते थे कि देखना आज यह बोल रहा है कि इस बेटी की वजह से बड़ी बेटी को रिश्ते नहीं मिल रहे, लेकिन एक दिन यही बोलेंगे कि ये इस बेटी की बहनें हैं और ये उनके जीजू हैं। पापा हमेशा कहते रहे कि मेहनत करते रहो और अपने सपने को पूरा करो। भारत के लिए मेडल जीतो। देखना एक दिन अपने आप लोग आएंगे आपके साथ फोटो और सेल्फी लेने।

विजेंदर: म्हारी छोरियां छोरों से कम है के? निकहत किसी से कम नहीं है। विश्व चैंपियन है। लड़कियों को निजी जिंदगी में भी कभी नहीं आंकना चाहिए। महिला शक्ति हमसे बहुत स्ट्रॉन्ग है। उनका मान सम्मान होना चाहिए।

सवाल: कभी संघर्ष याद आता है पिता का, जब वो आपके और आपके भाई के लिए ओवरटाइम किया करते थे? 

विजेंदर: संघर्ष के दिन बिल्कुल याद आते हैं। कहते हैं न कि वो जमीन नहीं भूलनी चाहिए जहां से आप आए हैं। मेहनत अब भी बाकी है, बहुत सारी चीजें करनी हैं जिंदगी में। जिंदगी आपको बहुत सारे मौके देती हैं, आप उन सब मौकों को पकड़िए, उन्हें जाने मत दीजिए। मौकों का सही तरीके से फायदा उठाइए और उन्हें व्यर्थ मत जाने दीजिए। पीछे देखेंगे तो आगे वाली ट्रेन छूट जाएगी।

सवाल: बॉक्सिंग ही क्यों चुना? पहलवानी भी चुन सकते थे क्रिकेट भी चुन सकते थे?

विजेंदर: बॉक्सिंग को इसलिए चुना क्योंकि मेरे दादा जी जो थे जब वो रिटायर हुए तो  वो बॉक्सिंग के ग्लव्स लेकर आए थे। वो 1972-73 में रिटायर हुए थे। तब वो बॉक्सिंग ग्लव्स लाए और तब हमें पता चला था कि बॉक्सिंग क्या होती है। तब हम गांव में प्रैक्टिस करते रहते थे। एक हाथ से ही करते रहते थे। फिर धीरे धीरे शौक जगा। भिवानी में एक बार जब घूमने गए तो वहां मैच देखा। बॉक्सिंग ने हमें चुना, हमने बॉक्सिंग को नहीं चुना। मैं दूसरे खेलों में भी गया, लेकिन वहां सफलता नहीं मिली। हॉकी भी खेला, लेकिन वहां सफलता नहीं मिली। जिम्नास्टिक भी कोशिश की, बास्केटबॉल भी ट्राई किया, लेकिन सफलता नहीं मिली, लेकिन बॉक्सिंग ने मुझे स्वीकार कर लिया और कहा कि तू इधर आ जा। तब से मैं उसी के साथ चलता गया और नहीं छोड़ा उसका साथ।

सवाल: विजेंदर ने कहा था ओलंपिक मेडल भी जितूंगा और फिल्मों में भी काम कर के दिखाऊंगा। आपने वो कर दिखाया, कैसे? सपने देखने चाहिए, क्योंकि सपने सच होते हैं, इस पर क्या कहेंगे?

विजेंदर: बिल्कुल गांव में लोअर मिडिल क्लास के लोग हैं। तो सपने देखने के पैसे नहीं लगते। तो आप लोगों को भी अगर सफल होना है तो सपने देखिए। सपनों का कोई अंत नहीं होता कोई सीमा नहीं होती। बस आपके दिमाग में वो होना चाहिए।

सवाल: निकहत आप बहुत तेज दौड़ा करती थीं। इसके पीछे भी एक कहानी है। बताइए वो क्या कहानी है?

निकहत: मैं जब छठे क्लास में थी और मेरी दीदी 10वीं कक्षा में थी तो मेरा स्कूल 3.45 पर खत्म हो जाता था, लेकिन 10वीं के लिए एक्स्ट्रा क्लेसस चलती थीं। तो उनका स्कूल साढ़े पांच बजे खत्म होता था। तो मेरे घर वाले ऑटो रिक्श अफोर्ड नहीं कर पाते थे तो मुझे उनके लिए इंतजार करना पड़ता था। इस दौरान मैं अपनी एक दोस्त के साथ पीछे मैदान में रेस लगाती थी। दोस्त एथलेटिक्स की प्रैक्टिस कर रही होती थी तो उसने मुझे एक बार रेस के लिए बुला लिया। तो मैं रेस में सबसे आगे पहुंची और मेरे दोस्त काफी पीछे रह गए। तो वहां टीचर हैरान रह गए कि कल की आई लड़की ने मेरे एक साल से प्रैक्टिस कर रहे छात्रों को पीछे छोड़ दिया। फिर उन्होंने मेरे पिता का नाम पूछा और भाग्यवश पीटी टीचर और मेरे पिता दोस्त निकले। फिर मेरे पीटी टीचर ने मेरा काफी समर्थन किया और कहा कि तुमने पहले कभी एथलेटिक्स किया है? तो मैंने कहा कि बचपन में मेरे पीछे कुत्ते भागते थे तो ऐसे भाग भाग कर मेरी रनिंग अच्छी हुई है। तो अपनी जान बचाने के लिए मैंने इतना भागा कि मेरी एथलेटिक्स अच्छी हो गई।

सवाल: आपने शुरू में इस भारवर्ग में प्रतिनिधित्व किया, जिसमें कभी हमारी लीजेंड मैरीकॉम खेलती थीं। आपको काफी संघर्ष करना पड़ा क्योंकि दोनों एक ही भार वर्ग में थे। आपने कैसे सफलता पाई?

निकहत: जितने साल मैंने बॉक्सिंग किया है, मैंने बस एक ही बात सीखी है कि अगर आप मेहनत करोगे तो सफलता आपको जरूर मिलेगी। किसी को जल्दी मिलती है तो किसी को इसके लिए थोड़ा संघर्ष करना पड़ता है। लेकिन ऊपर वाला जरूर सबको सफलता देता है, अगर आप मेहनत करोगे तो। तो जब मैंने मुक्केबाजी शुरू की थी तो उस वक्त इस बारे में इतनी जानकारी नहीं थी। तब विजेंदर सिंह ने 2008 बीजिंग ओलंपिक में कांस्य जीता था और मैरीकॉम ने 2012 लंदन ओलंपिक में कांस्य जीता था। तो मैं अखबार में इनके आर्टिकल्स पढ़ती थी और खुद के बारे में सोचा करती थी कि मुझे इनके जैसे बनना है। ये रोल मॉडल्स हैं हमारे। जब मैंने जूनियर में पदक जीतने शुरू किए, यूथ में पदक जीतने शुरू किए तो हमेशा से एक सपना था कि मुझे भी ओलंपिक में पदक जीतना है और अपने रोल मॉडल्स की तरह बनना है। जब मैं सीनियर में आई थी तो फ्लाइट वेट में खेलती हूं, तो जब मैं सीनियर में आई तो हर एथलीट का सपना होता है कि ओलंपिक खेलना है और इसमें पदक जीतना है देश के लिए तो यही सपना लेकर मैं सीनियर में आई। तो जिस कैटेगरी में मैं खेलती हूं उसमें पहले से ही तगड़ा कॉम्पिटीशन था। इसमें लीजेंड मैरीकॉम थी, जिनका इस भारवर्ग में दबदबा था। तो मुझे काफी संघर्ष करना पड़ा उस भारवर्ग में जगह बनाने के लिए। मुझे जब लगा कि मैं अपने प्राइम टाइम में हूं और ये पता चला कि ओलंपिक के लिए कोई ट्रायल नहीं हो रहा है और एथलीट को ऐसे ही चुनकर भेजा जा रहा है तो मैंने आवाज उठाई थी और इसके खिलाफ बोला था। तो वो काफी बड़ा विवाद खड़ा हो गया था तो मुझे बहुत बुरा लगा था। मैंने कभी सोचा नहीं था कि मैं अपने रोल मॉडल (मैरीकॉम) के साथ विवाद में रहूंगी। उनके (मैरीकॉम) लिए मेरे दिल में हमेशा से इज्जत थी, लेकिन जब हादसा हुआ तो मेरा दिल टूट गया था कि मेरा ओलंपिक पदक जीतने का सपना पूरा नहीं होगा, लेकिन फिर जब ट्रायल हुए मैं हारी, फिर लॉकडाउन हुआ। लॉकडाउन के बाद फिर मुझे लगा कि मेरा कभी नंबर नहीं लगेगा इस भारवर्ग में क्योंकि मेरे से दिग्गज मुक्केबाज हैं और कोई युवा प्रतिभा पर ध्यान नहीं दे रहा है, लेकिन मैंने उम्मीद नहीं खोई और कोशिश करती रही। 2022 में जब विश्व चैंपियनशिप खेलने का मौका मिला। मैं ट्रायल खेली, उसमें जीती और इस्तांबुल जाने का मौका मिला। वहां मैंने विश्व चैंपियनशिप में स्वर्ण पदक जीता। भारत से मैं अकेले फाइनल में थी और मैंने स्वर्ण पदक जीता। 14 साल बाद भारत से बाहर मुक्केबाजी विश्व चैंपियनशिप में किसी एथलीट ने स्वर्ण पदक जीता था। मुझे बहुत खुशी हुई। तब मैंने एक चीज सीखी कि मेहनत करना कभी नहीं छोड़ना चाहिए। लगे रहो, ऊपर वाला जरूर आपको कामयाबी देगा। 

सवाल: आपको राजनेता कहूं या पेशेवर मुक्केबाज? आपने मुक्केबाजी छोड़ी है या नहीं छोड़ी है या आप राजनीति में पूरी तरीके से घुस गए हो? आप आगे खेलने वाले हैं या नहीं?
विजेंदर: मैंने जब प्रधानमंत्री से मुलाकात की थी। मैंने उन्हें बताया कि हम बॉक्सिंग करते हैं तो उन्होंने मुझे कहा था कि हम सभी बॉक्सर हैं, लेकिन हम संसद में बॉक्सिंग करते हैं। तो भइया बॉक्सिंग हर जगह है, चाहे आप सीमा पर चले जाइए, चाहे आप स्कूल में चले जाइए, या कॉलेज में चले जाइए। तो संसद से बॉक्सिंग रिंग तक बॉक्सिंग ही बॉक्सिंग है। हर तरह की बॉक्सिंग बराबर है क्योंकि सब में जीतना जरूरी है। हम मुक्केबाजी की और प्रतियोगिता आयोजित करेंगे इस साल और यूएस के एक मुक्केबाज हैं उनसे भी मेरी बात हुई थी। तो प्रोफेशनल बॉक्सिंग एक बहुत बड़ा गेम होता है। मैंने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी जी से भी बात की थी कि हम लखनऊ में एक बॉक्सिंग मैच आयोजत करते हैं तो यह बहुत अच्छा होगा। इससे भारत के खेल को, उत्तर प्रदेश के खेल को बढ़ावा मिलेगा। मुख्यमंत्री ने इसमें बहुत रुचि दिखाई।

सवाल: पेरिस ओलंपिक के बाद से आपने एक भी बाउट नहीं लड़ी है। दर्द है समझ सकते हैं, लेकिन 2028 में क्या करके दिखाना है?
निकहत: मेरा सपना रहा है ओलंपिक में भारत के लिए पदक जीतना। 2024 पेरिस ओलंपिक में मैं ये पूरा नहीं कर पाई। ये मेरे लिए एक निराशा रहेगी। लेकिन मैं इस निराशा को कामयाबी की ओर मोड़ना चाहती हूं। मैंने तैयारी शुरू कर दी है और अभी मेरा पूरा ध्यान लॉस एंजिलिस ओलंपिक पर है। पेरिस ओलंपिक के बाद से मैंने किसी प्रतियोगिता में हिस्सा नहीं लिया है। जल्द ही मैं कॉम्पिटीशन सर्किट में उतरूंगी। मेरा पहला ध्यान तो सितंबर में होने वाले विश्व चैंपियनशिप पर है। वहां मैं अपना टाइटल डिफेंड करना चाहूंगी। फिर भारत भी एक विश्व बॉक्सिंग चैंपियनशिप की मेजबानी करने वाला है। वो दिल्ली या नोएडा में ही होगा। उत्तर प्रदेश इसको काफी सपोर्ट कर रहा है तो मैं उम्मीद कर रही हूं कि वो इसी राज्य में हो, लखनऊ में हो और लोगों को हमारे कल्चर के बारे में पता चले। इससे मुक्केबाजी को भारत में और पूरी दुनिया में बढ़ावा मिलेगा। मैं वर्ल्ड चैंपियनशिप और वर्ल्ड कप फाइनल्स में अपना टाइटल डिफेंड करके और स्वर्ण जीतकर मैं अपने देश का नाम रोशन करना चाहूंगी। 



विजेंदर ने 2008 बीजिंग ओलंपिक में जीता था कांस्य
विजेंदर को साल 2009 में राजीव गांधी खेल रत्न से नवाजा गया था। उन्होंने 2008 के बीजिंग ओलिंपिक में कांस्य पदक जीतकर इतिहास रचा था। वे इन खेलों में पदक जीतने वाले पहले भारतीय मुक्केबाज थे। 39 वर्षीय विजेंदर अभी पेशेवर सर्किट में खेल रहे हैं हालांकि उन्होंने 2022 के बाद से कोई मुकाबला नहीं लड़ा है। विजेंदर राजनीति में भी सक्रिय हैं। उन्होंने 2024 में भाजपा का दामन थामा था। इससे पहले वह कांग्रेस का हिस्सा थे। 

निकहत ने 13 की उम्र में शुरू की बॉक्सिंग
28 साल की निकहत ने महज 13 साल की उम्र में बॉक्सिंग शुरू कर दी थी, लेकिन उनके लिए यह राह आसान नहीं थी। समाज की तरफ से उन पर हिजाब पहनने का दबाव डाला गया। उनके शॉर्ट्स पहनने पर भी आपत्ति जताई गई। हालांकि, निकहत के पास उनके परिवार का समर्थन था और वह इन सब चीजों से लड़ते हुए कड़ी प्रैक्टिस पर लगी रहीं। निकहत के पिता जमील अहमद खुद पूर्व फुटबॉलर और क्रिकेटर रह चुके हैं। ऐसे में उन्होंने बेटी को खेल में करियर बनाने के लिए प्रोत्साहित किया। निकहत 2022 राष्ट्रमंडल खेलों में स्वर्ण पदक जीत चुकी हैं। वहीं, 2023 महिला विश्व बॉक्सिंग चैंपियनशिप में भी स्वर्ण पदक अपने नाम किया था। हालांकि, वह पिछले साल ओलंपिक में पदक जीतने में कामयाब नहीं हो पाई थीं।
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