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Deepa Malik: 'मैं और मेरी बेटी दिव्यांग...लोगों ने ताने दिए', संघर्ष की कहानी बताते हुए भावुक हुईं दीपा मलिक
Sun, 04 Aug 2024 06:30 PM IST
स्वप्निल शशांक
स्पोर्ट्स डेस्क, अमर उजाला, पेरिस
स्पोर्ट्स डेस्क, अमर उजाला, पेरिस
Published by: स्वप्निल शशांक
Updated Sun, 04 Aug 2024 06:30 PM IST
सार
दीपा मलिक का जन्म 1970 में हुआ था। उनके जीवन में एक महत्वपूर्ण मोड़ तब आया जब उन्हें 1999 में स्पाइनल ट्यूमर का सामना करना पड़ा, जिससे उनके शरीर के निचले हिस्से में पूरी तरह से संवेदनहीनता आ गई और उन्हें व्हीलचेयर पर निर्भर होना पड़ा।
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दीपा मलिक
- फोटो : Amar Ujala
विस्तार
देहरादून में हुए अमर उजाला संवाद में भारत को पैरालंपिक खेलों में पहला पदक दिलाने वाली दीपा मलिक भी पहुंचीं। उन्होंने जीवन से जुड़े संघर्षों और लोगों से मिले तानों के बारे में अमर उजाला से बातचीत की। दीपा ने कुछ ऐसे राज बताए जो शायद ही किसी को पता हो। उन्होंने बताया कि कैसे उन्हें ताने मिले, इसके बावजूद वह देश के लिए पदक जीतकर लाईं। दीपा एक प्रमुख भारतीय पैरालंपियन और खिलाड़ी हैं, जिन्होंने खेल जगत में अपनी अपार क्षमताओं और मेहनत से एक विशेष स्थान बनाया है। उनकी कहानी प्रेरणा और दृढ़ता की मिसाल है।
प्रारंभिक जीवन और स्वास्थ्य समस्याएं
दीपा मलिक का जन्म 1970 में हुआ था। उनके जीवन में एक महत्वपूर्ण मोड़ तब आया जब उन्हें 1999 में स्पाइनल ट्यूमर का सामना करना पड़ा, जिससे उनके शरीर के निचले हिस्से में पूरी तरह से संवेदनहीनता आ गई और उन्हें व्हीलचेयर पर निर्भर होना पड़ा। उसी समय उनके पति कर्नल विक्रम सिंह कारगिल में देश के लिए जंग लड़ रहे थे। उस दौरान ही दीपा की स्पाइनल ट्यूमर सर्जरी हुई और उनको 183 टांके लगे थे। हालांकि, इस कठिन परिस्थिति ने उन्हें हतोत्साहित नहीं किया, बल्कि उन्होंने इसे अपने आत्म-संवर्धन और खेल में उत्कृष्टता के लिए एक प्रेरणा के रूप में स्वीकार किया।
आइए उनकी कहानी उन्हीं की जुबानी जानते हैं...
मेरे लिए कुछ करने की जिद्द थोड़ी ज्यादा थी, क्योंकि मेरी उम्र ज्यादा थी। मैंने 36 साल की उम्र से खेलना शुरू किया। मेरे छाती का निचला हिस्सा लकवाग्रस्त हो चुका था। मेरे पर चुनौती थी, मल और मूत्र को कंट्रोल करने की शक्ति नहीं थी। मेरे लिए चैलेंज बड़ा था। मेरी बेटी की भी इंजरी हुई और बायां हिस्सा लकवाग्रस्त हो गया। मैंने कहा कि इस शरीर से कुछ तो करना है ताकि लोगों को बोझ नहीं लगे और इस तरह के लोगों को हिम्मत मिले। जब हमने खेलना शुरू किया तो बड़ा चैलेंज था कि कैसे होगा। साथ ही पहली महिला इन खेलों में थी तो काफी मुश्किल था। मैंने कई खेलों में हिस्सा लिया और अंत में शॉट पुट में पदक जीतकर लाई। खेल बदलने की जहां तक बात है तो मैं देखना चाहती थी कि इस शरीर के साथ मैं क्या अच्छा खेल सकती हूं। जब मेरा खेल निखर आया, जेवलिन में वर्ल्ड नंबर दो बन चुकी थी। 2012 मेरा लंदन पैरालंपिक मिस हुआ था। 2016 में जेवलिन नहीं था और शॉटपुट था। तो मैंने कोच बदला, जगह बदली, लोग बदले लेकिन पदक जीतकर ही मानी।
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यह पूछे जाने पर कि एक मां के तौर पर, एक पत्नी के तौर और एक औरत के तौर पर कौन-कौन सी चुनौतियां दिमाग में चल रही थीं? दीपा ने कहा- यही त्रासदी है अपंगता की, कि वह होने से ज्यादा लोगों के दिमाग में ज्यादा रहती है। जो माइंडसेट है अपंगता का वो उस इंसान को भी लिमिट कर देता है जो इंसान अपनी शारीरिक दुविधा से गुजर रहा होता है। बचपन में ट्यूमर आया। पांच साल से नौ साल की उम्र तक अस्पताल के अंदर बाहर करती रही। बहुत ज्यादा रिहैब हुई। मैंने अपने माता पिता को स्ट्रगल करते देखा। कुछ लोगों ने तो यहां तक कहा कि एक नन्ही बच्ची है जो पैरों से अपंग है, जिसका मल मूत्र अपने आप निकल जाता है, उस जिंदा लाश को जीवित रखकर क्या करोगे। लेकिन शुक्र है मेरे मां बाप ने मुझ पर हिम्मत नहीं हारी और मेरा इलाज कराया और मैं ठीक हो गई। इतनी ठीक हुई कि राजस्थान से बास्कटबॉल भी खेली और जो पहली महिला क्रिकेट टीम बनी, उसमें भी अपनी भागीदारी दी। हालांकि, मोटरसाइकिल से प्यार के चलते मेरा अरेंज मैरेज हुआ। मुझे ऐसे पति मिले, जिन्हें मोटरसाइकिल का बहुत शौक था। उन्होंने मुझे भी मोटरसाइकिल दी।
दीपा ने बताया- बेटी हुई तो 14 महीने में जब उसने चलना सीखा तो उसे हेड इंजरी हुई और वही हुआ जो होना था। मैंने देखा कि 20 वर्ष गुजर गए थे मेरी बीमारी में और मेरी बेटी की बीमारी में, लेकिन मानसिकता नहीं बदली थी। मेरी बेटी की भी हेड इंजरी थी और लकवा था तो लोगों ने उसे भी कोसना शुरू कर दिया। लोगों ने कहा कि यह जीवन भर का बोझ रहेगी। मुझे तब समझ आया था कि मेरी मां क्यों रोती थी। क्योंकि उसने भी यही ताने सुने थे। मैंने अपनी बेटी के इलाज में उतनी ही तत्परता दिखाई, जितना मेरे मां बाप ने मुझे ठीक करने के लिए दिखाई थी। दूसरी बेटी का जन्म हुआ तो लोगों ने फिर कहना शुरू किया कि अरे पहली बेटी अपंग है और दूसरी भी बेटी है। इसके भी पांव लंगड़ाने लगे हैं। धीरे धीरे बेटियां बड़ी हुईं। बड़ी बेटी छह साल की दूसरी बेटी तीन साल की और मेरे पति कारगिल में लड़ाई लड़ रहे थे तो मैं उस वक्त बेहद कठिन परिस्थिति में थी। तो ऐसे मेरा सफर शुरू हुआ। बहुत मेहनत की और धारना बदलना शुरू किया और मुझे लगता है कि धारना को बदलने के लिए खेलों से बड़ा कोई माध्यम नहीं है। मैं खेल से उतरी तो मुझे इसी शरीर के लिए सराहा गया और इसी के लिए पीठ थपथपाया गया। जो मेरे करीब के लोग थे जो ये कहते थे कि जीवन बर्बाद हो गया तो मैं कहना चाहूंगी कि खेलों के माध्यम से कितना बदलाव आया, देख सकते हैं। जब मैं पदक लेकर लौटी तो मेरे गांव से लगभग 40 गाड़ियां मेरे स्वागत के लिए दिल्ली एयरपोर्ट आई थी। जो गांव के सरपंच थे उन्होंने मुझे पगड़ी बांधी और मुझे गदा दिया और ये कहा- जीवन के अखाड़े में बल दिखाने के लिए हम तुमको ये देते हैं।
दीपा मलिक को क्या धक्का लगा?
दीपा ने कहा- मेरे लिए सबसे ज्यादा खुशी का पल और दुख का पल 24 घंटे के अंदर ही आया। मैंने काफी तैयारी की थी शॉट पुट के लिए। जो हमारे पैरालंपिक खेलों में रियो के लिए एक ही महिला का स्लॉट था। जब मैंने वहां पर अपना गोला फेंका तो 4.48 का डिस्टेंस मैंने फेंका जो उस वक्त वर्ल्ड रैंकिंग की नंबर 1 कनाडा की खिलाड़ी का स्कोर था जो मैंने बराबरी की थी। मुझे खुशी थी कि मैं विश्व नंबर एक के स्कोर के साथ क्वालिफाई कर रही हूं। बड़ा इंतजार था कि ऐसी खबर आएगी कि पहली भारतीय महिला पैरालंपिक में अपना कोटा सिक्योर कर चुकी है और भारत का प्रतिनिधित्व करने जाने वाली है। अगले दिन जब मैंने अखबार खोला तो कहीं इस कहानी का जिक्र नहीं था। उसमें लिखा गया था कि दीपा ने चीटिंग करके दीपा ने एक जूनियर खिलाड़ी की जगह हथिया ली है और उन पर केस हो गया है। मेरी तीन पुश्तें भारतीय सेना में रही हैं। मेरे परिवार के हर सदस्य ने स्वतंत्रता की हर लड़ाई सैनिक होकर देश के लिए लड़ी है।
दीपा ने कहा- खेल तो छोड़िए, आप पर चीटिंग का इल्जाम लगता है तो आपका पूरा करियर एक सवाल बनकर खड़ा हो जाता है। वहां कोर्ट केस चला और मैंने केस जीता। वो मेरे लिए एक मुश्किल समय था। मैं शुक्रगुजार हूं अपनी मेंटल ट्रेनर की और कोच की जो मेरे साथ खड़े रहे और गिरने नहीं दिया। घंटों लगते थे कोर्ट की सुनवाई में। मैं डम्बल लेकर जाती थी और वहीं एक्सरसाइज करती थी। मेरा पूरा जिम गाड़ी की डिक्की में मेरे साथ चलता था। मैं मेडल के लिए जब लड़ी तो वो मेरे सम्मान की लड़ाई थी। 4.48 मीटर के लिए मुझे कोर्ट में घसीटा गया, तो मैंने देश के लिए पैरालंपिक में 4.61 मीटर गोला फेंक कर पदक जीता। वो मेडल जीतने के बाद मीडिया में जब मेरा इंटरव्यू हुआ तो 2016 के बाद जो आपने हमारे मेडल्स को जो तरजीह दी, जो हमें सेलिब्रेशन दिया, जो मेडल्स की बात आपने लिखी, और मुझसे जब पूछा गया कि मेडल जीतकर कैसा लग रहा है? तो मैंने कहा- अच्छा भी लग रहा है और बुरा भी लग रहा है। जब भारत ने पैरालंपिक में 1972 में पुरुषों में अपना पहला मेडल जीत लिया था तो आजाद भारत को महिलाओं के पैरालंपिक पदक में 73 साल क्यों लग गए। आज मैं खुश हूं कि पैरालंपिक में महिलाओं की भागीदारी बढ़ गई है। 300 प्रतिशत भागीदारी बढ़ गई है। इस साल पेरिस में भी बहुत सारे पदकों के आने की उम्मीद है।
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प्रारंभिक जीवन और स्वास्थ्य समस्याएं
दीपा मलिक का जन्म 1970 में हुआ था। उनके जीवन में एक महत्वपूर्ण मोड़ तब आया जब उन्हें 1999 में स्पाइनल ट्यूमर का सामना करना पड़ा, जिससे उनके शरीर के निचले हिस्से में पूरी तरह से संवेदनहीनता आ गई और उन्हें व्हीलचेयर पर निर्भर होना पड़ा। उसी समय उनके पति कर्नल विक्रम सिंह कारगिल में देश के लिए जंग लड़ रहे थे। उस दौरान ही दीपा की स्पाइनल ट्यूमर सर्जरी हुई और उनको 183 टांके लगे थे। हालांकि, इस कठिन परिस्थिति ने उन्हें हतोत्साहित नहीं किया, बल्कि उन्होंने इसे अपने आत्म-संवर्धन और खेल में उत्कृष्टता के लिए एक प्रेरणा के रूप में स्वीकार किया।
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आइए उनकी कहानी उन्हीं की जुबानी जानते हैं...
मेरे लिए कुछ करने की जिद्द थोड़ी ज्यादा थी, क्योंकि मेरी उम्र ज्यादा थी। मैंने 36 साल की उम्र से खेलना शुरू किया। मेरे छाती का निचला हिस्सा लकवाग्रस्त हो चुका था। मेरे पर चुनौती थी, मल और मूत्र को कंट्रोल करने की शक्ति नहीं थी। मेरे लिए चैलेंज बड़ा था। मेरी बेटी की भी इंजरी हुई और बायां हिस्सा लकवाग्रस्त हो गया। मैंने कहा कि इस शरीर से कुछ तो करना है ताकि लोगों को बोझ नहीं लगे और इस तरह के लोगों को हिम्मत मिले। जब हमने खेलना शुरू किया तो बड़ा चैलेंज था कि कैसे होगा। साथ ही पहली महिला इन खेलों में थी तो काफी मुश्किल था। मैंने कई खेलों में हिस्सा लिया और अंत में शॉट पुट में पदक जीतकर लाई। खेल बदलने की जहां तक बात है तो मैं देखना चाहती थी कि इस शरीर के साथ मैं क्या अच्छा खेल सकती हूं। जब मेरा खेल निखर आया, जेवलिन में वर्ल्ड नंबर दो बन चुकी थी। 2012 मेरा लंदन पैरालंपिक मिस हुआ था। 2016 में जेवलिन नहीं था और शॉटपुट था। तो मैंने कोच बदला, जगह बदली, लोग बदले लेकिन पदक जीतकर ही मानी।
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दीपा ने बताया- बेटी हुई तो 14 महीने में जब उसने चलना सीखा तो उसे हेड इंजरी हुई और वही हुआ जो होना था। मैंने देखा कि 20 वर्ष गुजर गए थे मेरी बीमारी में और मेरी बेटी की बीमारी में, लेकिन मानसिकता नहीं बदली थी। मेरी बेटी की भी हेड इंजरी थी और लकवा था तो लोगों ने उसे भी कोसना शुरू कर दिया। लोगों ने कहा कि यह जीवन भर का बोझ रहेगी। मुझे तब समझ आया था कि मेरी मां क्यों रोती थी। क्योंकि उसने भी यही ताने सुने थे। मैंने अपनी बेटी के इलाज में उतनी ही तत्परता दिखाई, जितना मेरे मां बाप ने मुझे ठीक करने के लिए दिखाई थी। दूसरी बेटी का जन्म हुआ तो लोगों ने फिर कहना शुरू किया कि अरे पहली बेटी अपंग है और दूसरी भी बेटी है। इसके भी पांव लंगड़ाने लगे हैं। धीरे धीरे बेटियां बड़ी हुईं। बड़ी बेटी छह साल की दूसरी बेटी तीन साल की और मेरे पति कारगिल में लड़ाई लड़ रहे थे तो मैं उस वक्त बेहद कठिन परिस्थिति में थी। तो ऐसे मेरा सफर शुरू हुआ। बहुत मेहनत की और धारना बदलना शुरू किया और मुझे लगता है कि धारना को बदलने के लिए खेलों से बड़ा कोई माध्यम नहीं है। मैं खेल से उतरी तो मुझे इसी शरीर के लिए सराहा गया और इसी के लिए पीठ थपथपाया गया। जो मेरे करीब के लोग थे जो ये कहते थे कि जीवन बर्बाद हो गया तो मैं कहना चाहूंगी कि खेलों के माध्यम से कितना बदलाव आया, देख सकते हैं। जब मैं पदक लेकर लौटी तो मेरे गांव से लगभग 40 गाड़ियां मेरे स्वागत के लिए दिल्ली एयरपोर्ट आई थी। जो गांव के सरपंच थे उन्होंने मुझे पगड़ी बांधी और मुझे गदा दिया और ये कहा- जीवन के अखाड़े में बल दिखाने के लिए हम तुमको ये देते हैं।
दीपा मलिक को क्या धक्का लगा?
दीपा ने कहा- मेरे लिए सबसे ज्यादा खुशी का पल और दुख का पल 24 घंटे के अंदर ही आया। मैंने काफी तैयारी की थी शॉट पुट के लिए। जो हमारे पैरालंपिक खेलों में रियो के लिए एक ही महिला का स्लॉट था। जब मैंने वहां पर अपना गोला फेंका तो 4.48 का डिस्टेंस मैंने फेंका जो उस वक्त वर्ल्ड रैंकिंग की नंबर 1 कनाडा की खिलाड़ी का स्कोर था जो मैंने बराबरी की थी। मुझे खुशी थी कि मैं विश्व नंबर एक के स्कोर के साथ क्वालिफाई कर रही हूं। बड़ा इंतजार था कि ऐसी खबर आएगी कि पहली भारतीय महिला पैरालंपिक में अपना कोटा सिक्योर कर चुकी है और भारत का प्रतिनिधित्व करने जाने वाली है। अगले दिन जब मैंने अखबार खोला तो कहीं इस कहानी का जिक्र नहीं था। उसमें लिखा गया था कि दीपा ने चीटिंग करके दीपा ने एक जूनियर खिलाड़ी की जगह हथिया ली है और उन पर केस हो गया है। मेरी तीन पुश्तें भारतीय सेना में रही हैं। मेरे परिवार के हर सदस्य ने स्वतंत्रता की हर लड़ाई सैनिक होकर देश के लिए लड़ी है।
दीपा ने कहा- खेल तो छोड़िए, आप पर चीटिंग का इल्जाम लगता है तो आपका पूरा करियर एक सवाल बनकर खड़ा हो जाता है। वहां कोर्ट केस चला और मैंने केस जीता। वो मेरे लिए एक मुश्किल समय था। मैं शुक्रगुजार हूं अपनी मेंटल ट्रेनर की और कोच की जो मेरे साथ खड़े रहे और गिरने नहीं दिया। घंटों लगते थे कोर्ट की सुनवाई में। मैं डम्बल लेकर जाती थी और वहीं एक्सरसाइज करती थी। मेरा पूरा जिम गाड़ी की डिक्की में मेरे साथ चलता था। मैं मेडल के लिए जब लड़ी तो वो मेरे सम्मान की लड़ाई थी। 4.48 मीटर के लिए मुझे कोर्ट में घसीटा गया, तो मैंने देश के लिए पैरालंपिक में 4.61 मीटर गोला फेंक कर पदक जीता। वो मेडल जीतने के बाद मीडिया में जब मेरा इंटरव्यू हुआ तो 2016 के बाद जो आपने हमारे मेडल्स को जो तरजीह दी, जो हमें सेलिब्रेशन दिया, जो मेडल्स की बात आपने लिखी, और मुझसे जब पूछा गया कि मेडल जीतकर कैसा लग रहा है? तो मैंने कहा- अच्छा भी लग रहा है और बुरा भी लग रहा है। जब भारत ने पैरालंपिक में 1972 में पुरुषों में अपना पहला मेडल जीत लिया था तो आजाद भारत को महिलाओं के पैरालंपिक पदक में 73 साल क्यों लग गए। आज मैं खुश हूं कि पैरालंपिक में महिलाओं की भागीदारी बढ़ गई है। 300 प्रतिशत भागीदारी बढ़ गई है। इस साल पेरिस में भी बहुत सारे पदकों के आने की उम्मीद है।